Election Laws: क्या चुनावी नतीजों के खिलाफ की जा सकती है अपील, किन देशों में है यह कानून?
Election Laws: भारत में मतदान प्रक्रिया को लेकर काफी बड़े विवाद चल रहे हैं. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या चुनाव के नतीजों के खिलाफ कोई अपील की जा सकती है.

- भारत में चुनावी नतीजों को कानूनी चुनौती देने के प्रावधान हैं।
- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951, 45 दिन में हाईकोर्ट में याचिका।
- अन्य देशों में भी चुनाव नतीजों को चुनौती के नियम।
- धोखाधड़ी, नामांकन, मतगणना त्रुटि मुख्य चुनौती के आधार।
Election Laws: भारत में इस वक्त चुनावों को लेकर बड़ा विवाद चल रहा है. चुनाव आयोग द्वारा कराए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के तहत ड्राफ्ट स्टेज में देश की वोटर लिस्ट से करीब 13.36 करोड़ नाम हटाए जाने का आरोप है. सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि देश में वोट चोरी को लेकर भी एक बड़ा विवाद चल रहा है.
इसी बीच एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या चुनावी नतीजों के खिलाफ अपील की जा सकती है और किन देशों में इसे लेकर कानून है. इसी बीच आइए जानते हैं इन सवालों के जवाब क्या हैं.
क्या है इसे लेकर कानून?
वोटों की गिनती और नतीजों की घोषणा के बाद भी चुनाव परिणाम कानूनी जांच के दायरे से बाहर नहीं होते. लगभग सभी बड़े लोकतांत्रिक देशों में कुछ इस तरह के कानून हैं जिनके जरिए उम्मीदवार, मतदाता या फिर दूसरे पात्र पक्ष चुनाव नतीजों को चुनौती दे सकते हैं. ऐसी चुनौतियां आमतौर पर चुनाव याचिका के जरिए से या फिर विशेष ट्रिब्यूनल और अदालतों में कानूनी कार्रवाई के जरिए से दी जाती हैं.
चुनाव याचिका, चुनाव की वैधता को चुनौती देने का एक औपचारिक कानूनी तरीका है. इसके जरिए कोई भी पात्र व्यक्ति कानून द्वारा तय की गई अथॉरिटी के सामने अपने आरोप रख सकता है. देश की व्यवस्था के आधार पर यह अथॉरिटी कोई अदालत, ट्रिब्यूनल या फिर चुनाव संस्था हो सकती है. इसमें समय सीमा काफी ज्यादा जरूरी होती है क्योंकि चुनौती देने का अधिकार कानून द्वारा तय किए गए एक तय समय तक ही होता है.

भारत में कानून
भारत में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 चुनाव नतीजे को चुनौती देने का कानूनी ढांचा देता है. कोई भी पात्र उम्मीदवार या फिर मतदाता नतीजे की घोषणा के 45 दिनों के अंदर हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दायर कर सकता है. कोई भी पक्ष हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है जिससे चुनाव विवाद की समीक्षा के लिए एक और न्यायिक रास्ता मिल जाता है.
ऑस्ट्रेलिया में कानून
ऑस्ट्रेलिया में चुनाव विवाद के लिए एक खास कोर्ट ऑफ डिस्प्यूटेड रिटर्न्स है. इन याचिकाओं में चुनावी अनियमितता, धोखाधड़ी या फिर किसी उम्मीदवार की पात्रता से जुड़े मुद्दे उठाए जा सकते हैं. याचिका दायर करने की समय सीमा काफी ज्यादा सख्त है. याचिका नतीजों की घोषणा के 40 दिनों के अंदर जमा करनी होती है.
नाइजीरिया में कानून
नाइजीरिया में चुनाव विवाद को चुनाव ट्रिब्यूनल और अपील न्यायलय द्वारा सुलझाया जाता है. नतीजों की घोषणा के 21 दिनों के अंदर याचिका दायर करनी होती है. ट्रिब्यूनल को 180 दिनों के अंदर अपना फैसला सुनाना होता है. नाइजीरिया की चुनाव विवाद निपटान व्यवस्था में अपील न्यायलय भी शामिल है.

इंडोनेशिया में कानून
इंडोनेशिया में प्रशासनिक विवादों को चुनाव के आखिरी फैसलों से जुड़े बड़े विवादों से अलग रखा जाता है. प्रशासनिक विवाद सबसे पहले चुनाव निगरानी निकाय के पास ले जाए जाते हैं. आखिरी फैसलों और वोटों के अंतर से जुड़े बड़े विवादों का फैसला संवैधानिक न्यायालय द्वारा किया जाता है.
मेक्सिको में कानून
मेक्सिको में एक खास संवैधानिक न्यायालय है जिसे संघीय चुनावी न्यायाधिकरण कहा जाता है. यह चुनावी विवादों और परिणामों की समीक्षा करता है और चुनाव से जुड़ी कानूनी शिकायतों और अपीलों पर आखिरी फैसला सुनाता है.
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चुनाव को चुनौती देने के आधार
किसी चुनाव परिणाम को सिर्फ इस वजह से नहीं बदला जा सकता कि कोई उम्मीदवार या पार्टी उस पर आपत्ति जताती है. चुनौती देने वाली याचिका कानूनी आधारों पर आधारित होनी चाहिए. जैसे गलत तरीके अपनाना या फिर चुनावी धोखाधड़ी, जिसमें रिश्वत देना, मतदाताओं को दागना धमकाना या फिर मतदान प्रक्रिया में छेड़कर करना शामिल है.
एक और आधार नामांकन को गलत तरीके से स्वीकार करना या फिर खारिज करना हो सकता है. जैसे किसी अयोग्य उम्मीदवार को स्वीकार कर लेना या फिर किसी योग्य उम्मीदवार को खारिज कर देना. शपथ पत्र में संपत्ति, आपराधिक रिकॉर्ड या फिर योग्यताओं के बारे में गलत जानकारी देने को भी चुनौती दी जा सकती है. वोटों की गिनती में हुई गलतियों को भी चुनौती दी जा सकती है अगर वह चुनाव के नतीजे पर असर डालती हों. प्रशासनिक नियमों का पालन न करना भी शिकायत का एक बड़ा हिस्सा हो सकता है.
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