क्या सच में स्पेस स्टेशन पर मिनटों में हो सकता है कैंसर का इलाज, इस देश ने बना ली वैक्सीन?
Space Station Cancer Research: स्पेस स्टेशन पर हुई रिसर्च से कैंसर की दवा का नया रूप तैयार हुआ है. अब घंटों की ड्रिप की जगह मिनटों में इंजेक्शन संभव हो गया है. आइए विस्तार से जानें.

कल्पना कीजिए, कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज, जिसमें घंटों अस्पताल में बैठना पड़ता था, अब सिर्फ कुछ मिनटों में हो जाए. यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में हुई एक असली वैज्ञानिक सफलता है. अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन ISS पर किए गए एक खास प्रयोग ने ऐसी दवा का रास्ता खोल दिया है, जिसने कैंसर के इलाज को आसान, तेज और मरीजों के लिए कम तकलीफदेह बना दिया है. सवाल यही है क्या यह इलाज सच में गेमचेंजर साबित होगा? आइए समझ लेते हैं.
स्पेस स्टेशन पर क्या बड़ी खोज हुई?
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यानी ISS पर की गई वैज्ञानिक रिसर्च ने कैंसर इलाज के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है. नासा और अमेरिकी दवा कंपनी मर्क की संयुक्त टीम ने स्पेस में प्रोटीन क्रिस्टल ग्रोथ पर गहन अध्ययन किया. इस रिसर्च का मकसद कैंसर की एक प्रमुख दवा को ज्यादा असरदार और मरीजों के लिए आसान बनाना था. वैज्ञानिकों ने पाया कि माइक्रोग्रेविटी यानी बेहद कम गुरुत्वाकर्षण वाले माहौल में दवा से जुड़े प्रोटीन कहीं बेहतर गुणवत्ता के क्रिस्टल बनाते हैं.
कौन सी दवा है और क्यों है खास?
यह नया इलाज मर्क की मशहूर इम्यूनोथेरेपी दवा पेम्ब्रोलिजुमाब का बदला हुआ रूप है. यह दवा शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत कर कैंसर कोशिकाओं पर हमला करने में मदद करती है. इसका इस्तेमाल मेलानोमा, फेफड़ों के कैंसर और कुछ अन्य प्रकार के कैंसर में पहले से किया जा रहा है. सितंबर 2025 में अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इसके नए सबक्यूटेनियस इंजेक्शन को मंजूरी दी है, जो इसे इलाज के तरीके में बड़ा बदलाव बनाता है.
पहले इलाज कैसे होता था?
अब तक इस दवा को मरीज की नस में इन्फ्यूजन यानी ड्रिप के जरिए दिया जाता था. इसके लिए मरीज को अस्पताल या क्लिनिक में लंबा समय बिताना पड़ता था. शुरुआत में यह प्रक्रिया करीब दो घंटे चलती थी, जिसे बाद में घटाकर लगभग 30 मिनट किया गया था. फिर भी, हर बार अस्पताल जाना, इंतजार करना और खर्च उठाना मरीजों के लिए चुनौती बना रहता था.
अब क्या बदला है नए तरीके में?
नई तकनीक के तहत दवा को त्वचा के नीचे सबक्यूटेनियस इंजेक्शन के रूप में दिया जा सकता है. इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ 1 से 2 मिनट लगते हैं और इसे हर तीन हफ्ते में एक बार लगाया जाता है. इससे मरीजों का समय बचता है, अस्पताल का खर्च कम होता है और इलाज का अनुभव कहीं ज्यादा सहज बन जाता है. डॉक्टरों का मानना है कि इससे मरीजों की जीवन गुणवत्ता में भी साफ सुधार आएगा.
स्पेस रिसर्च ने कैसे आसान बनाया इलाज?
धरती पर गुरुत्वाकर्षण की वजह से प्रोटीन क्रिस्टल बनाते समय कई दिक्कतें आती हैं. क्रिस्टल छोटे, टेढ़े या असमान बन जाते हैं, जिससे दवा की संरचना को पूरी तरह समझना मुश्किल होता है. लेकिन अंतरिक्ष में माइक्रोग्रेविटी के कारण क्रिस्टल बड़े, एकसमान और ज्यादा शुद्ध बनते हैं. इससे वैज्ञानिकों को दवा के अणुओं की सही बनावट समझने में मदद मिली और वे इसे इंजेक्शन के रूप में देने लायक बना पाए.
कब से चल रही थी यह रिसर्च?
मर्क कंपनी साल 2014 से ISS पर ऐसे प्रयोग कर रही है. उन्होंने मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के क्रिस्टल स्पेस में उगाकर यह समझा कि दवा के कणों का सबसे बेहतर आकार और संरचना क्या हो सकती है. यह पूरा काम ISS नेशनल लैबोरेटरी के सहयोग से हुआ, जहां नासा निजी कंपनियों और शोधकर्ताओं को रिसर्च के लिए मंच देता है.
आम लोगों के लिए क्यों है यह बड़ी खबर?
नासा का कहना है कि अंतरिक्ष में की गई रिसर्च का मकसद सिर्फ अंतरिक्ष यात्रियों की सेहत नहीं, बल्कि धरती पर रहने वाले लोगों की जिंदगी बेहतर बनाना भी है. यह नया इंजेक्शन इसका जीता-जागता उदाहरण है. कैंसर मरीजों के लिए यह इलाज उम्मीद की नई किरण है और भविष्य में स्पेस रिसर्च से और भी कई नई दवाएं सामने आ सकती हैं.
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Source: IOCL























