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Vande Mataram Debate: वंदे मातरम् में अब तक कितने हुए बदलाव, क्या है इसकी मूल स्क्रिप्ट? यहां पढ़िए

Vande Mataram Debate: आज लोकसभा में राष्ट्रगीत वंदे मातरम को लेकर चर्चा चल रही है. इसी बीच आइए जानते हैं कि अब तक राष्ट्रगीत वंदे मातरम में कितने संशोधन हुए हैं.

Vande Mataram Debate: राष्ट्रगीत वंदे मातरम एक बार फिर से राजनीतिक चर्चा का विषय बन चुका है. दरअसल आज लोकसभा में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को लेकर एक बड़ी चर्चा चल रही है. इसी बीच आइए जानते हैं की वंदे मातरम में अब तक कितने बदलाव हुए हैं और इसकी मूल स्क्रिप्ट क्या है.

1870 के दशक में लिखी गई मूल रचना 

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में वंदे मातरम की रचना की थी. उन्होंने एक ऐसा गीत बनाया था जो मातृभूमि को एक हिंदू देवी के रूप में पूजता था. 1880 में आनंदमठ उपन्यास में जब यह प्रकाशित हुआ तो यह गीत तुरंत मशहूर हो गया. हालांकि पूरी रचना में हिंदू देवियों का जिक्र था. इसी वजह से ये छंद बाद में धार्मिक आपत्ति का केंद्र बन गए.

1937 का संशोधन और बात के छंदों को हटाना 

1930 के दशक में जैसे-जैसे स्वतंत्रता संग्राम तेज हुआ यह गीत काफी ज्यादा लोकप्रिय हो चुका था. लेकिन मुस्लिम नेताओं ने उन छंदों पर आपत्ति जतानी शुरू कर दी जो सीधे हिंदू देवी देवताओं की पूजा करते थे. उन्होंने तर्क दिया कि उन पंक्तियों में भाग लेना इस्लामी मान्यताओं के लिए सही नहीं है. इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1937 में एक कदम उठाया. उसने घोषणा की कि गीत के केवल पहले दो छंद का ही राष्ट्रीय कार्यक्रम और सार्वजनिक समारोह में इस्तेमाल किया जाएगा. इनमें कोई भी धार्मिक छवि नहीं थी. यह वंदे मातरम में किया गया एकमात्र बड़ा संशोधन था.

क्यों जरूरी था यह बदलाव 

आजादी के पहले दौर में भारत सांप्रदायिक संवेदनशीलता को बढ़ता हुआ देख रहा था. इसी के साथ कांग्रेस नेता यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि खुद को कोई भी समुदाय अलग-थलग महसूस ना करें. गैर धार्मिक छंदों को बनाए रखकर गीत की भावनात्मक शक्ति को बनाए रखना था. इस संशोधन का उद्देश्य यह था कि गीत हर समुदाय स्वीकार कर पाए और वंदे मातरम एक विभाजनकारी शक्ति के बजाय एकजुट करने वाली शक्ति बनी रहे. 

1950 में संविधान सभा द्वारा मान्यता 

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने आधिकारिक तौर पर 1937 के दो छंद वाले संस्करण को भारत के राष्ट्रगीत के रूप में अपना लिया. आपको बता दें कि वंदे मातरम के इतिहास में सिर्फ एक औपचारिक बदलाव किया गया है जिसमें पहले दो छंदों को अपनाया गया. तब से अब तक कोई और बदलाव नहीं हुआ है.

क्या है मूल स्क्रिप्ट

वन्दे मातरम्। 
सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्, 
शस्यश्यामलाम् मातरम्। 
वन्दे मातरम् ।।

शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्, 
सुहासिनीम् सुमधुरभाषिणीम्, 
सुखदाम् वरदाम् मातरम्। वन्दे मातरम् ।।

कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले, 
कोटि-कोटि भुजैधृत खरकरवाले, 
के वॉले माँ तुमि अबले, 
बहुवलधारिणीं नमामि तारिणीम्, 
रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।

तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि हदि तुमि मर्म, 
त्वम् हि प्राणाः शरीरे, बाहुते तुमि माँ शक्ति, 
हृदये तुमि माँ भक्ति, तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे।
 वन्दे मातरम्।।

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी, 
कमला कमलदलविहारिणी, 
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्, 
नमामि कमलाम्, अमलाम् अतुलाम्, 
सुजलां सुफलां मातरम्। वन्दे मातरम्।।

 श्यामलाम् सरलाम् सुस्मिताम् भूषिताम्, 
धरणीम् भरणीम् मातरम्। वन्दे मातरम् ।।

ये भी पढ़ें: जन गण मन से कई साल पहले लिखा गया था वंदे मातरम, फिर क्यों नहीं बन पाया यह नेशनल एंथम?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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