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कौन थे ओपेनहाइमर, जिन पर बनी है ऑस्कर में धमाल मचाने वाली फिल्म ओपनहाइमर! जिसे मिले एक साथ 7 ऑस्कर

Robert Oppenheimer: 2024 के ऑस्कर अवार्ड में ओपेनहाइमर ने कुल सात अवार्ड अपने नाम किए. आखिर कौन थे यह ओपेनहाइमर जिनके ऊपर फिल्म बनी तो खूब सारे ऑस्कर अवार्ड बटोर ले गई.

Robert Oppenheimer: कल यानी 10 मार्च को अमेरिका के लॉस एंजेलिस में 96वें एकेडमी अवार्ड्स की घोषणा हुई है. एकेडमी अवार्ड जिन्हें ऑस्कर अवार्ड्स भी कहा जाता है. 2024 के एकेडमी अवार्ड्स में क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ओपेनहाइमर की खूब धूम रही. ओपेनहाइमर फिल्म के लिए किलियन मर्फी को बेस्ट एक्टर के अवार्ड से नवाजा गया. तो वहीं आयरन मैन वाले रॉबर्ट डाउनी जूनियर को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का खिताब मिला. इसके साथ ही क्रिस्टोफर नोलन को भी बेस्ट डायरेक्टर का अवार्ड मिला. बता दें रॉबर्ट डाउनी जूनियर और क्रिस्टोफर नोलन का यह पहला ऑस्कर अवार्ड है. 2024 के ऑस्कर अवार्ड में ओपेनहाइमर ने कुल सात अवार्ड अपने नाम किए. आखिर कौन थे यह ओपेनहाइमर जिनके ऊपर यह ओपेनहाइमर जिनके ऊपर फिल्म बनी तो खूब सारे ऑस्कर अवार्ड बटोर ले गई. चलिए जानते हैं ओपेनहाइमर की कहानी. 

कौन थे रॉबर्ट ओपेनहाइमर?

रॉबर्ट ओपेनहाइमर के बारे में अगर सबसे कम शब्दों में परिचय देना हो. तो यही कहेंगे कि यही वह साइंटिस्ट थे जिन्होंने परमाणु बम बनाया था. अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में 22 अप्रैल 1904 को एक यहूदी परिवार में रॉबर्ट ओपेनहाइमर का जन्म हुआ था. इनके पिता कपड़ा व्यवसायी थे. इनकी मां एक चित्रकार थीं. रॉबर्ट ओपेनहाइमर के दादा साल 1888 में जर्मनी छोड़कर अमेरिका चले आए थे. उनके दादा ने एक टेक्सटाइल कंपनी में नौकरी करना शुरू किया और देखते ही देखते वह काफी अमीर हो गए. इसके बाद उनका परिवार न्यूयॉर्क से मैनहैटन शिफ्ट हो गया. बता दें  रॉबर्ट ओपेनहाइमर के छोटे भाई फ्रैंक भी फिजिक्स के साइंटिस्ट थे. 

रॉबर्ट ओपेनहाइमर पढ़ाई में बहुत तेज थे. उन्होंने साल 1922 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से केमिस्ट्री में बीए की डिग्री ली. इसके बाद 1925 में वह कैवेंडिश लैबोरेट्री में पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी चले गए. इसके 1 साल बाद  रॉबर्ट ओपेनहाइमर जर्मनी जाकर गौटिंगेन यूनिवर्सिटी में थियोरेटिकल फिजिक्स में नोबेल प्राप्त मैक्स बोर्न के साथ पढ़ने चले गए. इसके बाद 1927 में  रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने फिजिक्स में पीएचडी की और वह वापस अमेरिका लौट आए. इसके बाद उन्होंने टीचिंग में में अपना करियर बनाने का सोचा. और बर्कले और कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी में  एडजंक्ट प्रोफेसर के तौर पर शामिल हो गए. वहां उन्होंने क्वांटम मैकेनिक्स और थियोरेटिकल फिजिक्स पढ़ना शुरू किया. 1940 में उन्होंने शादी की और पारिवारिक जीवन बताना शुरू कर दिया.

मैनहैटन प्रोजेक्ट में हुए शामिल

मैनहैटन प्रोजेक्ट वह प्रोजेक्ट है जिसके तहत अमेरिका ने परमाणु बम विकसित किया था. इस प्रोजेक्ट में लगभग 20 के करीब नोबेल पुरुष्कार विजेता वैज्ञानिक काम कर रहे थे. 1942 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट को लीड करने का जिम्मा रॉबर्ट ओपेनहाइमर को दिया गया. उन्हें लॉस एलामोस में एक नई प्रयोगशाला का डायरेक्टर बनाया गया. जहां रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने फिजिक्स के जाने-माने वैज्ञानिकों को इकट्ठा कर इस पर काम शुरू कर दिया.

इसके बाद दो परमाणु बम बनाए गए. जिसमें एक यूरेनियम और एक प्लूटोनियम बम था. यह वही बम थे जो आगे चलकर जापान के नागासाकी और हिरोशिमा पर फेंके गए थे. इनका नाम लिटिल बॉय और फैट मैन रखा गया था. 6 अगस्त 1945 को जापान पर इन दोनों परमाणु बम के हमले में करीब 2 लाख लोगों की मृत्यु हुई थी. 18 फरवरी 1967 को 62 साल की उम्र में गले के कैंसर के चलते रॉबर्ट ओपेनहाइमर की मृत्यु हो गई थी. 

गीता के इस श्लोक का क्या जिक्र

रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने 1930 के करीब ही संस्कृत भाषा सीख ली थी. इसके बाद उन्होंने गीता और कालिदास की मेघदूत भी पढ़ी थी. साल 1945 में जब परमाणु परीक्षण का धमाका हुआ था. उसके बारे में  रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने साल 1960 में एक इंटरव्यू में गीता के उस श्लोक का ज़िक्र किया जो उन्हें उस दौरान धमाके के समय याद आया था. उन्होंने गीता के 11वें अध्याय के 32वें श्लोक, 'मैं अब काल हूं जो लोकों  का नाश करता हूं.' श्लोक यह है 'काल: अस्मि लोकक्षयकृत्प्रविद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त:।।' जिसका अर्थ 'मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूं.' इसका श्लोक का जिक्र किया था. 

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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