अंधविश्वास से कब मिलेगी आजादी ?
पुणे के धनाड्य बाबा...उमेश तागुंदे का ये वीडियो जब से सामने आया है....जेहन में ये सवाल उठना लाजिमी है- क्या बाबा के दरबार में आस्था और परंरपरा के नाम पर अधिश्वास का खुला खेल खेला जा रहा है...वो खेल जिसने बाबा के दरवार में आने वाले हर भक्त को पाखंड का गुलाम बना दिया है....और अगर ऐसा है...तो फिर अंधविश्वस के इस खेल से कब मिलेगी आजादी...सोचिए...बाबा के पैरों की गंदिगी से सने जिस पानी को आप शायद छूएं भी ना....उसी पानी को...यहां भक्त श्रद्धा का प्रतीक मानकर पी रहे हैं.....क्यों? क्योंकि वो पानी...बाबा के चरणों को छूकर आया है....यही वो जगह है...जहां हमारा सवाल शुरू होता है....क्या इंसान की महानता...
उसके पैरों में होती है? या उसके विचारों में? क्या गुरु की पहचान...उनके चरणों से होती है? या उनकी शिक्षा से? और अगर शिक्षा महान है...तो फिर चरणों का पानी पीना...क्यों जरूरी है? ये सवाल हम किसी भक्त की श्रद्धा का मजाक उड़ाने के लिए नहीं पूछ रहे। ये सवाल इसलिए पूछ रहे हैं...क्योंकि समाज तभी आगे बढ़ता है...जब वो अपनी मान्यताओं से भी सवाल करता है। क्या श्रद्धा के नाम पर सब कुछ स्वीकार कर लेना चाहिए? किसी के पैर धोना...किसी की निजी श्रद्धा हो सकती है। किसी के चरणों का सम्मान...किसी की निजी भावना हो सकती है। लेकिन जब ऐसी तस्वीरें...सार्वजनिक होती हैं...जब उन्हें सोशल मीडिया पर दिखाया जाता है...जब दूसरे लोग उन्हें देखकर...उसी रास्ते पर चलने लगते हैं...तो सवाल समाज का बन जाता है। क्योंकि अंधविश्वास...एक दिन में नहीं फैलता। वो धीरे-धीरे फैलता है...पहले एक आदमी करता है...फिर दूसरा उसे देखकर करता है...
फिर तीसरा उसे परंपरा कह देता है...और कुछ वक्त बाद...लोग भूल जाते हैं...कि इसकी शुरुआत आखिर हुई कहां से थी। इसलिए सवाल जरूरी है। बहस जरूरी है। तर्क जरूरी है।
क्योंकि...जहां सवाल जिंदा रहते हैं...वहां पाखंड ज्यादा देर जिंदा नहीं रह सकता।
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