छोटा सा देश फिर भी कभी नहीं बना गुलाम, क्या खास है नेपाल में?
जानिए क्यों ताकतवर अंग्रेज और क्रूर मुगल भी कभी नहीं झुका सके नेपाल को, आखिर क्या है इस छोटे से पहाड़ी देश का वो राज जो इसे बनाता है सबसे खास.

दुनिया के ज्यादातर देशों पर कभी न कभी किसी बाहरी ताकत ने कब्जा जरूर किया, चाहे वह अंग्रेज हों, फ्रांसीसी हों या कोई और देश. भारत खुद करीब 200 साल तक अंग्रेजों का गुलाम रहा. लेकिन हमारे पड़ोसी देश नेपाल का इतिहास इस मामले में बिल्कुल अलग है. छोटा सा हिमालयी देश होने के बावजूद नेपाल कभी किसी विदेशी ताकत का गुलाम नहीं बना. आखिर इसके पीछे क्या वजहें हैं, आइए जानते हैं.
पहाड़ों ने बचाया नेपाल को
नेपाल की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक बनावट रही है. यह देश चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और घने जंगलों से घिरा हुआ है. हिमालय की गोद में बसा यह इलाका इतना दुर्गम है कि यहां बड़ी सेनाएं आसानी से नहीं घुस पातीं. सामान और हथियार लेकर पहाड़ी रास्तों से चढ़ाई करना किसी भी विदेशी सेना के लिए बेहद मुश्किल काम था. यही वजह है कि जो ताकतें मैदानी इलाकों में आसानी से जीत हासिल कर लेती थीं, नेपाल के सामने उनकी रणनीति काम नहीं आई.
गोरखा सैनिकों की बहादुरी
नेपाल की सेना, खासकर गोरखा सैनिक, अपनी बहादुरी और लड़ाकू क्षमता के लिए दुनियाभर में मशहूर रहे हैं. जब अंग्रेजों ने भारत पर राज करने के दौरान नेपाल पर आक्रमण करने की कोशिश कीं, तो उन्हें कड़ा प्रतिरोध झेलना पड़ा. सीमा को लेकर विवाद बढ़ता गया और आखिरकार 1814 में अंग्रेजों और नेपाल के बीच युद्ध छिड़ गया, जिसे एंग्लो-नेपाल युद्ध कहा जाता है. यह लड़ाई करीब दो साल तक चली. गोरखा सैनिकों ने अपने पारंपरिक हथियार खुकरी के दम पर अंग्रेजों की आधुनिक सेना को भी कड़ी टक्कर दी.
सुगौली की संधि
लंबी लड़ाई के बाद साल 1816 में अंग्रेजों और नेपाल के बीच सुगौली की संधि हुई. इस संधि के तहत नेपाल को अपने कुछ हिस्से अंग्रेजों को देने पड़े, जिनमें आज का कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र भी शामिल था. लेकिन बड़ी बात यह रही कि इस समझौते में अंग्रेजों ने नेपाल पर सीधा शासन करने या उसे अपना उपनिवेश बनाने की बात नहीं मानी. नेपाल ने युद्ध में नुकसान तो उठाया, लेकिन अपनी संप्रभुता यानी आजाद हैसियत को बचाए रखा.
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कूटनीति में भी माहिर रहे नेपाल के शासक
नेपाल के तत्कालीन शासकों ने भी अंग्रेजों की चालों को अच्छी तरह समझा और सीधे टकराव की बजाय कूटनीति का सहारा लिया. सुगौली संधि के बाद नेपाल ने अंग्रेजों के साथ दोस्ताना संबंध बनाए और उन्हें गोरखा सैनिकों की भर्ती के लिए भी सहयोग दिया. यही गोरखा रेजिमेंट आगे चलकर ब्रिटिश सेना का अहम हिस्सा बनी. इस तरह के व्यावहारिक फैसलों ने नेपाल को आगे किसी बड़े सैन्य टकराव से बचाए रखा.
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