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Norway Oil: तेल बेचकर अरबों डॉलर कमाता है यह देश, जानें खुद क्यों नहीं करता इस्तेमाल?

Norway Oil: दुनिया में एक देश ऐसा भी है जो तेल और गैस का काफी बड़ा एक्सपोर्टर है मगर खुद इन दोनों चीजों का इस्तेमाल नहीं करता. आइए जानते हैं कौन सा है वह देश.

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  • नॉर्वे हाइड्रोपावर पर अत्यधिक निर्भर, 98% बिजली यहीं से आती है।
  • इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने में अग्रणी, 80-90% गाड़ियां इलेक्ट्रिक।
  • पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली, सार्वजनिक परिवहन और साइकिल को बढ़ावा।
  • तेल राजस्व को सॉवरेन वेल्थ फंड में जमा करता है नॉर्वे।

Norway Oil: मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव की वजह से दुनिया भर में तेल और गैस आपूर्ति को लेकर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. लेकिन एक देश ऐसा भी है जो दुनिया का सबसे बड़ा तेल और गैस एक्सपोर्टर है मगर खुद तेल और गैस का इस्तेमाल नहीं करता. नॉर्वे दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस एक्सपोर्ट करने वाले देशों में से एक है और हर साल दुनिया भर के बाजारों में फॉसिल फ्यूल बेचकर अरबों डॉलर कमाता है. यह देश अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरत के लिए तेल और कोयले का काफी कम इस्तेमाल करता है. आइए जानते हैं क्या है इसकी वजह.

नॉर्वे कैसे बनाता है बिजली? 

नॉर्वे के घरेलू तौर पर फॉसिल फ्यूल का काफी कम इस्तेमाल करने की सबसे बड़ी वजह यह है कि वह हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर पर काफी ज्यादा निर्भर है. देश की लगभग 98% बिजली हाइड्रोपावर से बनती है. नॉर्वे की भौगोलिक बनावट उसे एक बड़ा प्राकृतिक फायदा देती है. यह देश पहाड़ों, नदियों, झरनों और ग्लेशियरों से भरा हुआ है. इससे वह लंबे समय तक कम लागत पर भी भारी मात्रा में साफ सुथरी बिजली बना पाता है. 

क्योंकि रिन्यूएबल हाइड्रोपावर पहले से ही बिजली की लगभग सभी जरूर पूरी कर देती है इस वजह से नॉर्वे को देश के अंदर तेल या फिर कोयला जलाने की काफी कम जरूरत पड़ती है.

काफी ज्यादा इलेक्ट्रिक गाड़ियां 

नॉर्वे को इलेक्ट्रिक गाड़ियों को अपनाने के मामले में भी दुनिया के अग्रणी देश में से एक माना जाता है. देश में बिकने वाली 80% से 90% से ज्यादा गाड़ियां इलेक्ट्रिक होती है. नॉर्वे के सरकार ने खरीदारों को बड़े टैक्स में छूट, सस्ते टोल, मुफ्त पार्किंग के फायदे और दूसरे प्रोत्साहन देकर इलेक्ट्रिक गाड़ियों को जोर शोर से बढ़ावा दिया है. 

पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली 

नॉर्वे के नागरिकों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी काफी ज्यादा है. पूरे देश में सार्वजनिक परिवहन, साइकिल चलाने और पैदल चलने को जोर-शोर से बढ़ावा दिया जाता है. नॉर्वे के कई शहर को टिकाऊ शहरी नियोजन के सिद्धांतों के आधार पर डिजाइन किया गया है. साइकिल चलाने के लिए खास इंफ्रास्ट्रक्चर, असरदार सार्वजनिक परिवहन प्रणाली और पर्यावरण अनुकूल शहरी नीति ने नार्वे को एक बड़ा तेल उत्पादक होने के बावजूद घरेलू फॉसिल फ्यूल के इस्तेमाल में कटौती करने में मदद की है. 

तेल से होने वाली कमाई का क्या? 

तेल से होने वाली कमाई को तुरंत खर्च कर देने वाले कई संसाधन  समृद्ध देशों के उलट नॉर्वे एक काफी अलग रणनीति अपनाता है. सरकार अपने तेल से होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा गवर्नमेंट पेंशन फंड ग्लोबल में जमा करती है. इसे दुनिया का सबसे बड़ा सॉवरेन वेल्थ फंड माना जाता है. 

यह फंड आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने और लंबे समय तक वित्तीय स्थिरता को मजबूत करने के लिए बनाया गया है. ऐसा इसलिए ताकि जब भविष्य में दुनिया भर में तेल की मांग कम हो जाए तब भी देश की आर्थिक स्थिति मजबूत बनी रहे.

यह भी पढ़ेंः होर्मुज स्ट्रेट के 'भंवर' में फंसे ये ड्राई फ्रूट्स, जानें भारत में कितनी बढ़ी किल्लत?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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