जब तक मुस्कान के साथ जेल में रहेगी छोटी बेटी, क्या तब तक फांसी भी नहीं होगी?
जेल में मासूम बच्चे के साथ रहने से किसी दोषी महिला की फांसी की सजा नहीं टलती है, कानून में राहत केवल गर्भावस्था के दौरान ही मिलती है. कानूनन 6 वर्ष तक बच्चा मां के साथ रह सकता है.

मेरठ के चर्चित सौरभ हत्याकांड में कोर्ट ने आरोपी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड यानी फांसी की सजा सुनाई है. इस फैसले के बाद मुस्कान की 10 महीने की मासूम बेटी को लेकर कानूनी व सामाजिक गलियारों में नई चर्चा छिड़ गई है. सौरभ का परिवार मुस्कान की बड़ी बेटी को तो अपनाने के लिए तैयार है, लेकिन इस छोटी बच्ची की जिम्मेदारी लेने से मना कर रहा है. ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या जेल में मां के साथ रह रही मासूम बच्ची की मौजूदगी मुस्कान की फांसी की सजा में रोड़ा बन सकती है? कानूनी प्रावधान और जेल मैन्युअल इस स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट करते हैं.
बच्ची के साथ रहने से सजा पर क्या प्रभाव?
जेल में किसी छोटे बच्चे का अपनी मां के साथ रहना सजा के क्रियान्वयन को प्रभावित नहीं करता है. कानून के मुताबिक बच्चे की मौजूदगी से किसी भी दोषी की फांसी की सजा अपने आप नहीं रुकती या टलती है. जब तक ऊपरी अदालतों में अपील की प्रक्रिया और अन्य वैधानिक कदम पूरे नहीं हो जाते, सजा पर केवल कानूनी आधारों पर ही रोक लग सकती है, न कि बच्चे की स्थिति के आधार पर.
अदालती प्रक्रिया और अपील का अधिकार
निचली अदालत द्वारा दिए गए मृत्युदंड के फैसले की तामील तब तक नहीं हो सकती जब तक कि संबंधित राज्य का उच्च न्यायालय उस पर अपनी सहमति या मुहर न लगा दे. इसके अलावा दोषी मुस्कान के पास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का पूरा अधिकार है. यदि सभी ऊपरी अदालतें भी इस सजा को बरकरार रखती हैं, तब जाकर फांसी देने का रास्ता साफ होता है.
यह भी पढ़ें: SSR और SIR में क्या अंतर है, जानें नागरिकों पर क्या पड़ेगा असर?

जेल में बच्चों के रहने का समय
कारागार नियमावली के तहत महिला कैदियों को अपने छोटे बच्चों को साथ रखने की विशेष छूट दी जाती है. नियम के अनुसार कोई भी महिला कैदी अपने बच्चे को उसके जन्म से लेकर अधिकतम छह साल की उम्र होने तक जेल परिसर में अपने साथ रख सकती है. मुस्कान की 10 महीने की बेटी भी इसी व्यवस्था के तहत अपनी मां के साथ मेरठ जिला जेल में रह रही है.
कानून में फांसी टलने की मुख्य वजह
भारतीय कानून में फांसी रोकने या उसे टालने का प्रावधान बच्चों की उपस्थिति पर नहीं, बल्कि गर्भावस्था के आधार पर तय है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 456 (पुराने CrPC की धारा 416) में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि फांसी की सजा पाई महिला गर्भवती पाई जाती है, तो उच्च न्यायालय उसकी फांसी पर तत्काल रोक लगा सकता है या सजा को उम्रकैद में बदल सकता है.
सजा तय होने पर बच्ची का भविष्य
यदि सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी हो जाती हैं और सजा पर अमल का समय आता है, तो बच्ची का भविष्य कानूनी तंत्र द्वारा तय किया जाएगा. ऐसी परिस्थिति में बाल कल्याण समिति और अदालत मिलकर यह फैसला करते हैं कि बच्ची को किसी रिश्तेदार, अनाथालय या किसी पंजीकृत एडॉप्शन सेंटर के सुपुर्द किया जाए, ताकि उसकी परवरिश में कोई बाधा न आए.
जेल में मासूमों का पालन-पोषण
जेल में रह रहे निर्दोष बच्चों का ध्यान पूरी तरह से जेल प्रशासन द्वारा रखा जाता है. प्रशासन की यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी होती है कि वे जेल की कठोरता का असर बच्चे के स्वास्थ्य और मन पर न पड़ने दें. बच्चों को हर दिन संतुलित और पौष्टिक आहार दिया जाता है, जिससे उनकी शारीरिक वृद्धि सही तरीके से हो सके और वे किसी बीमारी या कुपोषण का शिकार न हों.

बच्चों की शिक्षा और विकास का ध्यान
जेल के भीतर बच्चों के मानसिक और शैक्षणिक विकास के लिए भी विशेष इंतजाम किए जाते हैं. बच्चों की उम्र के हिसाब से उन्हें उपयुक्त कक्षाओं में पढ़ाने की व्यवस्था की जाती है. यदि कैदियों के बच्चों की संख्या अधिक होती है, तो जेल के अंदर ही शिक्षकों को बुलाकर पढ़ाई कराई जाती है. इसके अतिरिक्त बच्चों के खेलने-कूदने और मनोरंजन के लिए भी जेल परिसर में सुरक्षित स्थान और साधन उपलब्ध कराए जाते हैं.
यह भी पढ़ें: खैबर पख्तूनख्वा क्यों है इतना संवेदनशील, अफगानिस्तान से क्या है कनेक्शन?






















