क्या केंद्र का फैसला पलट सकता है कोई भी राज्य, जानें क्या हैं नियम?
अनुच्छेद 256 के तहत राज्यों के लिए केंद्र के कानूनों को लागू करना अनिवार्य है. हालांकि, समवर्ती सूची के विषयों पर राज्य अपने नियम बना सकते हैं, लेकिन टकराव होने पर केंद्रीय कानून ही मान्य होगा.

देश में इन दिनों वंदे मातरम को लेकर सियासी बहस छिड़ी हुई है. कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने हाल ही में एक आदेश जारी करते हुए कहा है कि राज्य के सामान्य सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सिर्फ शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाएंगे. हालांकि जिन कार्यक्रमों में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे लोग शामिल होंगे, वहां पूरे छह अंतरे गाए जाएंगे.
यह आदेश केंद्र सरकार के उस निर्देश के बाद आया है जिसमें वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने के मौके पर सभी सरकारी कार्यक्रमों में पूरा गीत यानी सभी छह छंद गाना अनिवार्य किया गया था. इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर क्या कोई राज्य सरकार केंद्र के किसी फैसले को पलट सकती है, और इसे लेकर संविधान में क्या नियम बने हैं.
केंद्र और राज्य के बीच शक्तियां कैसे बंटी हैं?
भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बंटवारा तीन सूचियों में किया गया है- संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची. संघ सूची में रक्षा, विदेश नीति, नागरिकता, रेलवे जैसे विषय आते हैं, जिन पर सिर्फ संसद यानी केंद्र सरकार ही कानून बना सकती है.
राज्य सूची में पुलिस, कृषि, स्वास्थ्य जैसे विषय आते हैं, जिन पर सिर्फ राज्य सरकार कानून बना सकती है. वहीं समवर्ती सूची में शिक्षा, विवाह, दिवालियापन जैसे विषय आते हैं, जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं. संविधान के अनुच्छेद 254 के मुताबिक अगर समवर्ती सूची के किसी विषय पर केंद्र और राज्य के कानून में टकराव होता है, तो केंद्र का कानून ही मान्य होगा.
क्या राज्य सीधे केंद्र का कानून नकार सकता है?
संवैधानिक जानकारों के मुताबिक कोई भी राज्य सरकार संघ सूची में आने वाले किसी कानून को सीधे तौर पर खारिज नहीं कर सकती. भारत एक संघीय व्यवस्था वाला देश है, जहां संविधान सबसे ऊपर है और केंद्र द्वारा बनाया गया कानून पूरे देश को मानना होता है. अगर कोई राज्य सिर्फ बयान या विधानसभा में प्रस्ताव पास करके किसी केंद्रीय कानून को न मानने की बात कहता है तो इसका कोई सीधा कानूनी असर नहीं पड़ता. ऐसा प्रस्ताव सिर्फ राजनीतिक विरोध जताने का एक तरीका माना जाता है.
राज्यों के पास क्या-क्या विकल्प होते हैं?
हालांकि इसका यह मतलब नहीं की राज्यों के पास कोई रास्ता ही नहीं बचता. अगर किसी राज्य को लगता है कि केंद्र का कोई कानून संविधान के खिलाफ है या उसके मूल ढाचें का उल्लंघन करता है, तो वो राज्य सुप्रीम कोर्ट के पास जा सकता है. संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत राज्य सीधे सुप्रीम कोर्ट में केंद्र के खिलाफ मुकादमा दायर कर सकते हैं. इसके अलावा राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पास करके अपनी असहमति दर्ज करा सकते हैं, केंद्र सरकार से बातचीत कर सकते हैं, या फिर प्रशासनिक स्तर पर कानून को लागू करने में देरी कर सकते हैं.
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कोर्ट का फैसला होता है आखिरी
अगर केंद्र और राज्य के बीच किसी कानून को लेकर विवाद गहराता है, तो आखिरी फैसला सुप्रीम कोर्ट ही करता है. कोर्ट यह तय करता है कि संबंधित विषय किस सूची में आता है और क्या केंद्र का कानून संविधान के दायरे में है या नहीं. अगर कोर्ट कानून को सही ठहराता है, तो सभी राज्यों को उसे मानना अनिवार्य होता है, चाहे वो राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार क्यों न हो.
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