Delhi Liquor Policy Case: जस्टिस स्वर्णकांता ने शराब नीति मामले से खुद को किया अलग, जानें इंडियन ज्यूडिशरी में कब-कब हुआ ऐसा?
Delhi Liquor Policy Case: हाल ही में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने नई दिल्ली शराब नीति मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है. आइए जानते हैं कि इतिहास में ऐसा पहले कब-कब हो चुका है.

- जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने शराब नीति मामले से खुद को अलग किया।
- AAP नेताओं की टिप्पणियों के बाद अवमानना की कार्यवाही शुरू हुई।
- न्यायाधीश हितों के टकराव या निष्पक्षता पर संदेह होने पर हटते हैं।
- पूर्व में अयोध्या, भीमा कोरेगांव और बंगाल हिंसा में जजों ने सुनवाई छोड़ी।
Delhi Liquor Policy Case: जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा नई दिल्ली शराब नीति मामले से जुड़े मामलों की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है. यह कदम तब उठाया गया है जब अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज और दुर्गेश पाठक सहित आम आदमी पार्टी के कई नेताओं द्वारा कथित तौर पर उनके खिलाफ की गई टिप्पणियों को लेकर अवमानना की कार्यवाही शुरू की गई थी. जस्टिस शर्मा ने टिप्पणी की कि इन नेताओं का आचरण आपराधिक अवमानना के दायरे में आता है और अवमानना के नोटिस पहले ही जारी किए जा चुके हैं इस वजह से अब इस मामले की सुनवाई किसी दूसरी बेंच द्वारा की जानी चाहिए. इसी बीच आइए जानते हैं इंडियन ज्यूडिशरी में ऐसा पहले कब हो चुका है.
क्यों हटते हैं न्यायाधीश सुनवाई से?
यह एक ऐसी स्थिति को समझाता है जिसमें कोई न्यायाधीश किसी मामले की सुनवाई से इस वजह से हट जाते हैं क्योंकि हितों का संभावित टकराव, पहले का कोई जुड़ाव, व्यक्तिगत संबंध या फिर कोई भी ऐसी स्थिति मौजूद होती है जिससे उनकी निष्पक्षता पर संदेह पैदा हो सकता है.
भारत में ऐसा कोई औपचारिक लिखित कानून या फिर नियम नहीं है जो खुद को अलग करने की प्रक्रिया को सख्ती से कंट्रोल करता हो. इसके बजाय यह प्रथा मुख्य रूप से न्यायिक नैतिकता, संवैधानिक नैतिकता और न्यायाधीश के व्यक्तित्व विवेक द्वारा तय होती है.
पहले भी हो चुका है ऐसा
इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2019 में केंद्रीय जांच ब्यूरो के अंतरिम निदेशक एम नागेश्वर राव की नियुक्ति को लेकर हुए विवाद के दौरान सामने आया था. सर्वोच्च न्यायालय के कई न्यायाधीशों ने इस मामले से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था. जस्टिस रंजन गोगोई ने खुद को इस वजह से अलग कर लिया था क्योंकि वे नए सीबीआई निदेशक के चयन के लिए गठित समिति का हिस्सा थे. इसी तरह जस्टिस ए.के. सीकरी ने भी खुद को अलग कर लिया था क्योंकि वे उस पैनल का हिस्सा थे जिसने पूर्व सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को उनके पद से हटाया था. जस्टिस एन.वी. रमना ने भी इस मामले से खुद को अलग कर लिया था क्योंकि नागेश्वर राव उनके गृह राज्य से ताल्लुक रखते थे और उन्होंने नागेश्वर राव से जुड़े एक पारिवारिक समारोह में शिरकत की थी.
अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान भी हुआ था ऐसा
2019 में ऐतिहासिक अयोध्या विवाद की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस यू.यू.ललित ने संविधान पीठ से खुद को अलग कर लिया था. यह फैसला तब आया था जब वकीलों ने बताया कि सालों पहले 1997 में वह बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले से जुड़े एक आपराधिक केस में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के वकील के तौर पर पेश हुए थे.
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भीमा कोरेगांव और बिलकिस बानो मामला
विवादित भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में भी 2019 और 2020 के बीच कई बार जजों ने खुद को सुनवाई से अलग किया. जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस एन.वी. रमना समेत कई जजों ने इस मामले में आरोपी एक्टिविस्टों द्वारा अलग-अलग चरणों में दायर याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था.
ठीक इसी तरह 2022 में जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने बिलकिस बानो मामले में दोषियों की रिहाई से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था.
पश्चिम बंगाल हिंसा का मामला
2021 में पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा से जुड़े मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर जजों ने खुद को सुनवाई से अलग किया. जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया.
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