Barkatullah Bhopali: तो जवाहरलाल नेहरू नहीं थे भारत के पहले पीएम? इस शख्सियत ने बनाई थी देश में पहली सरकार
Barkatullah Bhopali: मौलाना बरकतुल्लाह खान भोपाली जवाहरलाल नेहरू से भी पहले भारत की पहली सरकार के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. आइए जानते हैं उनके बारे में और जानकारी.

- मौलाना बरकतुल्लाह 1915 में निर्वासित भारत सरकार के प्रधानमंत्री बने।
- उन्होंने प्रधानमंत्री के तौर पर ब्रिटिश विरोधी अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाया।
- गदर पार्टी के सह-संस्थापक रहे, ब्रिटिश विरोधी पत्रिका प्रकाशित की।
Barkatullah Bhopali: जब लोग भारत के पहले प्रधानमंत्री के बारे में बात करते हैं तो स्वाभाविक रूप से जवाहरलाल नेहरू का नाम दिमाग में आता है. हालांकि 1947 में भारत को आजादी मिलने से कई साल पहले एक क्रांतिकारी नेता विदेश में बनी भारत की पहली सरकार के प्रधानमंत्री के तौर पर काम कर चुके थे. वे नेता मौलाना बरकतुल्लाह खान भोपाली थे. वे एक स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने अपना जीवन ब्रिटिश शासन से भारत की आजादी दिलाने के लिए समर्पित कर दिया था.
भारत की पहली सरकार का गठन
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कोशिश की. इस कोशिश के तहत 1 दिसंबर 1915 को अफगानिस्तान के काबुल में भारत की अंतरिम सरकार बनाई गई. इस सरकार में राजा महेंद्र प्रताप को राष्ट्रपति नियुक्त किया गया और मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली प्रधानमंत्री बने. उनके साथ मौलाना अबैदुल्लाह सिंधी ने गृहमंत्री के तौर पर काम किया.
अंतरराष्ट्रीय समर्थन पाने का मिशन
निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री के तौर पर मौलाना बरकतुल्लाह ने जर्मनी, तुर्की और रूस जैसे देशों से राजनीतिक और सैन्य समर्थन पाने के लिए काफी ज्यादा प्रयास किया. इसका मकसद भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ एक वैश्विक गठबंधन बनाना था.
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कई भाषाओं के जानकार विद्वान
7 जुलाई 1854 को भोपाल में जन्मे मौलाना बरकतुल्लाह अपनी असाधारण भाषाई क्षमता के लिए जाने जाते थे. वे अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच और जापानी सहित 7 से ज्यादा भाषाओं में माहिर थे. अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता की वजह से उन्हें जापान में उर्दू के प्रोफेसर का पद मिला. यहां उन्होंने अपनी लेखनी और भाषाओं के जरिए औपनिवेशिक विरोधी विचारों का प्रसार जारी रखा.
गदर आंदोलन में योगदान
मौलाना बरकतुल्लाह 1913 में सैन फ्रांसिस्को में गदर पार्टी के गठन के पीछे मुख्य हस्तियों में से एक थे. लाला हरदयाल और सोहन सिंह भकना जैसे क्रांतिकारी नेताओं के साथ काम करते हुए उन्होंने भारत की आजादी के लिए समर्पित एक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन खड़ा करने में मदद की. जापान में रहते हुए उन्होंने द इस्लामिक फ्रेटरनिटी नाम का एक अखबार निकाला जिसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद की कड़ी आलोचना की गई थी. उनकी लेखनी इतनी प्रभावशाली हो गई कि अंत में ब्रिटिश दबाव की वजह से उन्हें देश छोड़ना पड़ा.
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