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चांद पर जिसने भी प्लॉट खरीदा है, क्या वह वहां मकान बनवा सकता है, साइंस के हिसाब से यह कितना पॉसिबल?

आज के वक्त चांद पर पहुंचा जा सकता है. लेकिन क्या चांद पर जमीन खरीदने वाले लोग चांद पर मकान भी बनवा सकते हैं? जानिए क्या सच में चांद पर मकान बनाना संभव है?

क्या आपने भी चांद पर जमीन खरीदी है या खरीदने का प्लान बना रहे हैं? आज चांद पर पहुंचना संभव है. लेकिन सवाल ये है कि चांद पर पहुंचना तो संभव है, लेकिन क्या चांद पर घर बनाना भी इतना ही आसान है क्या?  आज हम आपको बताएंगे कि जो भी लोग चांद पर जमीन खरीदने का दावा करते हैं या जमीन खरीदना का सपना देखते हैं. क्या वो लोग चांद पर घर भी बना पाएंगे। 

चांद पर जमीन

आपने खबरों में कई बार पढ़ा होगा कि कई लोग चांद पर जमीन खरीदने का दावा करते हैं. लेकिन क्या सच में चांद पर जमीन खरीदना इतना आसान है क्या?  1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी के मुताबिक चांद पर जमीन के ऊपर किसी एक देश का एकाधिकार नहीं है. इस पर करीब 110 देशों ने हस्ताक्षर किए हुए हैं. वहीं धरती से बाहर का ब्रह्मांड पूरी मानव जाति का है और इसके लिए किसी ग्रह-उपग्रह आदि पर जमीन का मालिकाना हक ऐसे ही किसी को नहीं दिया जा सकता है. हालांकि सालों से लूना सोसायटी इंटरनेशनल और इंटरनेशनल लूनर लैंड्स रजिस्ट्री के जरिए चांद के ऊपर जमीन को बेच रही हैं. लेकिन इसको सरकारी मान्यता नहीं है. दूसरी बात ये भी है कि चांद पर जब किसी का अधिकार नहीं है, तो जमीन बेच कौन सकता है?

चांद पर घर बनाने का सपना

अभी तक चांद पर किसी भी एजेंसी ने घर नहीं बनाया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक अभी भी चांद पर जीवन को लेकर तलाश जारी है. वहीं चांद की स्थिति को लेकर वहां पर घर बनाने की बात कहना मुश्किल है. हालांकि अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने चांद पर 2040 तक घर बनाने का लक्ष्य रखा है. नासा अपनी इस योजना पर थ्रीडी प्रिंटर को चंद्रमा पर भेज कर साकार करेगा. रिपोर्ट के मुताबिक प्रिंटर चंद्रमा की ऊपरी परत पर ही मौजूद क्रेटर की सतह पर चट्टानों और खनिजों के टुकड़ों से कंक्रीट बनाने का काम करेगा. हालांकि अभी नासा इस पर सिर्फ रिसर्च कर रहा है. 

चांद पर जीवन

वैज्ञानिक लगातार चांद पर जीवन की तलाश कर रहे हैं. अभी भी चांद पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री बिना स्पेस शूट के चांद पर नहीं जाते हैं. क्योंकि चांद का वातावरण इंसानों के मुताबिक नहीं है. इसलिए चांद पर मकान बनाने के साथ जीवन की संभावना भी तलाशना जरूरी है. 

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गिरिजांश गोपालन को मीडिया इंडस्ट्री में चार साल से ज्यादा का अनुभव है. फिलहाल वह डिजिटल में सक्रिय हैं, लेकिन इनके पास प्रिंट मीडिया में भी काम करने का तजुर्बा है. दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद गिरिजांश ने नवभारत टाइम्स अखबार से पत्रकारिता की शुरुआत की. उन्हें घूमना बेहद पसंद है. पहाड़ों पर चढ़ना, कैंपिंग-हाइकिंग करना और नई जगहों को एक्सप्लोर करना उनकी हॉबी में शुमार है। यही कारण है कि वह तीन साल से पहाड़ों में ज्यादा वक्त बिता रहे हैं. अपने अनुभव और दुनियाभर की खूबसूरत जगहों को अपने लेखन-फोटो के जरिए सोशल मीडिया के रास्ते लोगों तक पहुंचाते हैं.
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