भारत में कितने तरह के होते हैं पेट्रोलियम पदार्थ, उनका कहां-कहां और कितना होता है इस्तेमाल?
भारत में पेट्रोलियम पदार्थों का इस्तेमाल केवल ईंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की औद्योगिक और बुनियादी ढांचागत मजबूती का आधार है. आइए जानें कि भारत में कितने तरह के पेट्रोलियम पदार्थ होते हैं.

- कच्चे तेल से एलपीजी, पेट्रोल, डीजल बनते हैं.
- डीजल अर्थव्यवस्था का इंजन, माल ढुलाई में अहम है.
- एटीएफ, नैफ्था, बिटुमेन, कोक के विविध उपयोग.
- भारत 80% तेल आयात करता है, विकल्प तलाश रहा है.
क्या आप जानते हैं कि जिस कच्चे तेल को विदेशों से मंगवाया जाता है, वह सिर्फ आपकी गाड़ी की टंकी तक ही सीमित नहीं है? पेट्रोलियम पदार्थ असल में आधुनिक सभ्यता की रीढ़ हैं. सुबह रसोई में जलने वाली गैस से लेकर, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां और यहां तक कि आपके हाथों में मौजूद प्लास्टिक, सब कुछ इसी काले सोने की देन है. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है, जहां रोजाना लाखों बैरल तेल को रिफाइनरियों में अलग-अलग उत्पादों में बदला जाता है ताकि देश की रफ्तार बनी रहे.
पेट्रोलियम का वर्गीकरण और रिफाइनिंग की प्रक्रिया
कच्चा तेल जब जमीन या समंदर के नीचे से निकाला जाता है, तो वह सीधे इस्तेमाल के लायक नहीं होता है. भारत की विशाल रिफाइनरियों में इसे ऊंचे तापमान पर गर्म किया जाता है, जिसे 'फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन' कहते हैं. इस प्रक्रिया में तेल के अलग-अलग हिस्से अपने उबलने के तापमान के आधार पर अलग हो जाते हैं. सबसे हल्के हिस्से जैसे एलपीजी गैस के रूप में ऊपर मिलते हैं, जबकि सबसे भारी हिस्से जैसे डामर या बिटुमेन नीचे बैठ जाते हैं. भारत में इस प्रक्रिया से दर्जन भर से ज्यादा पेट्रोलियम उत्पाद तैयार किए जाते हैं.
डीजल भारतीय अर्थव्यवस्था का असली इंजन
भारत में सबसे ज्यादा खपत होने वाला पेट्रोलियम पदार्थ हाई स्पीड डीजल (HSD) है. 2025-26 के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, इसकी खपत 85,985 हजार मीट्रिक टन के करीब है. यह केवल ट्रकों और बसों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय रेलवे के इंजनों, कृषि क्षेत्र में ट्रैक्टरों और सिंचाई पंपों के लिए भी अनिवार्य है. औद्योगिक सेक्टर में बिजली कटौती के दौरान बड़े जनरेटर चलाने के लिए भी डीजल ही मुख्य सहारा है. यही कारण है कि डीजल के दाम बढ़ते ही माल ढुलाई महंगी हो जाती है और महंगाई बढ़ जाती है.
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पेट्रोल और एलपीजी
मोटर स्पिरिट यानी पेट्रोल (MS) भारत में दूसरा सबसे लोकप्रिय ईंधन है. कारों और दोपहिया वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण इसकी खपत 38,807 हजार मीट्रिक टन तक पहुंच गई है. वहीं, रसोई की जान एलपीजी (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) की खपत भी 30,855 हजार मीट्रिक टन के आसपास है. भारत सरकार की उज्ज्वला जैसी योजनाओं ने एलपीजी को ग्रामीण इलाकों के घर-घर तक पहुंचा दिया है. प्रोपेन और ब्यूटेन के मिश्रण वाली यह गैस न केवल खाना पकाने बल्कि अब ऑटो-एलपीजी के रूप में वाहनों में भी इस्तेमाल हो रही है.

एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) और नैफ्था
अब हवाई जहाजों को उड़ाने के लिए साधारण तेल तो काम नहीं आता है, इसके लिए बेहद शुद्ध एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) का इस्तेमाल होता है. पर्यटन और बिजनेस ट्रिप्स बढ़ने के साथ भारत में इसकी मांग 8,355 हजार मीट्रिक टन तक पहुंच गई है. दूसरी तरफ, नैफ्था एक ऐसा हल्का तरल है जो सीधे ईंधन के रूप में कम, लेकिन पेट्रोकेमिकल उद्योगों में ज्यादा इस्तेमाल होता है. प्लास्टिक, खाद और सिंथेटिक कपड़े बनाने के लिए नैफ्था एक बुनियादी कच्चा माल है.
बिटुमेन और पेट्रो-कोक
जब तेल शोधन की प्रक्रिया पूरी होती है, तो अंत में जो गाढ़ा और काला पदार्थ बचता है, उसे बिटुमेन या डामर कहते हैं. भारत जैसे विकासशील देश में जहां सड़कों का जाल बिछ रहा है, वहां बिटुमेन की खपत 7,798 हजार मीट्रिक टन है. इसके अलावा पेट्रोलियम कोक एक ठोस ईंधन है, जिसका उपयोग सीमेंट कारखानों और बिजली संयंत्रों में कोयले के विकल्प के रूप में किया जाता है. इसकी उच्च तापीय क्षमता इसे भारी उद्योगों के लिए पसंदीदा बनाती है.
ल्युब्रिकेंट्स और मिट्टी का तेल
मशीनों के पुर्जे आपस में घिसकर खराब न हों, इसके लिए लुब्रिकेंट्स और ग्रीस का इस्तेमाल होता है. ऑटोमोबाइल से लेकर बड़ी फैक्ट्रियों तक, घर्षण कम करने के लिए सालाना 4,471 हजार मीट्रिक टन स्नेहक की खपत होती है. वहीं, मिट्टी के तेल (केरोसिन) का इस्तेमाल अब काफी कम हो गया है. पहले यह रोशनी और खाना पकाने का मुख्य जरिया था, लेकिन अब इसका उपयोग केवल दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों या कुछ विशेष औद्योगिक कार्यों तक सीमित रह गया है, जिसकी खपत घटकर मात्र 416 हजार मीट्रिक टन रह गई है.
भारत की निर्भरता
भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल सऊदी अरब, इराक और रूस जैसे देशों से आयात करता है. वर्तमान में राजस्थान, गुजरात और मुंबई हाई हमारे प्रमुख घरेलू उत्पादक क्षेत्र हैं, लेकिन बढ़ती खपत को देखते हुए यह पर्याप्त नहीं है. यही कारण है कि भारत अब एथेनॉल ब्लेंडिंग और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) पर जोर दे रहा है, ताकि पेट्रोलियम पदार्थों पर विदेशी निर्भरता को कम किया जा सके. 5.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन की खपत वाला भारत अब ऊर्जा सुरक्षा के लिए नए विकल्पों की तलाश में है.
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Source: IOCL



























