क्या इंस्टाग्राम के सामने नहीं टिक पा रहीं किताबें? NBT चीफ ने बता दिया दोनों में बड़ा अंतर
इंडियन आर्मी से लेकर Ministry of Defence, Home Affairs, राजभवन और संयुक्त राष्ट्र मिशनों तक सेवा दे चुके श्री युवराज मलिक, जो वर्तमान में नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) इंडिया के डायरेक्टर हैं,

आज के दौर में यह सवाल लगभग हर घर, हर स्कूल और हर पैरेंट के मन में है. क्या किताबों का समय अब खत्म हो रहा है, क्या इंस्टाग्राम, फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के सामने किताबें कमजोर पड़ती जा रही हैं और क्या नई पीढ़ी पढ़ना नहीं चाहती, या फिर पढ़ने का तरीका बदल गया है. इन्हीं सवालों के बीच एक खास मंच पर एक ऐसी शख्सियत ने अपनी बात रखी, जिनका सफर सिर्फ प्रशासन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश-निर्माण और ज्ञान के विस्तार से भी जुड़ा रहा है.
इंडियन आर्मी से लेकर Ministry of Defence, Home Affairs, राजभवन और संयुक्त राष्ट्र मिशनों तक सेवा दे चुके श्री युवराज मलिक, जो वर्तमान में नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) इंडिया के डायरेक्टर हैं, उन्होंने किताबों और डिजिटल दुनिया के फर्क को बहुत सरल और गहरे शब्दों में समझाया. उनके लिए किताबें सिर्फ पढ़ने का साधन नहीं हैं, बल्कि नेशन बिल्डिंग का एक मजबूत टूल हैं. NEP 2020 के बाद NBT ने सिर्फ 30 दिनों में बाइलिंगुअल किताबें लॉन्च कीं और आज वही संस्था वर्ल्ड बुक फेयर 2026 जैसे बड़े आयोजन की तैयारी कर रही है. तो आइए जानते हैं कि क्या इंस्टाग्राम के सामने किताबें नहीं टिक पा रहीं.
नई पीढ़ी की सच्चाई क्या है?
आज की पीढ़ी को लेकर अक्सर कहा जाता है कि उनमें धैर्य नहीं है. उन्हें हर जानकारी एक क्लिक में चाहिए. वे लंबे समय तक एक जगह बैठकर पढ़ नहीं पाते. लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है. युवराज मलिक कहते हैं कि हर पीढ़ी की अपनी ताकत और अपनी कमजोरी होती है. हमारी पीढ़ी में भी कमियां थीं, और आज की पीढ़ी में भी हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि आज का सबसे बड़ा संकट ध्यान की कमी (Attention Span) है. आज हम किसी भी कंटेंट को बहुत देर तक समझ नहीं पाते. तुरंत आगे बढ़ जाते हैं.
डिजिटल दुनिया इतनी तेज है कि सोचने, विश्लेषण करने और खुद से सवाल पूछने का समय ही नहीं देती है. उन्होंने एक बेहद अहम बात कही किआज AI हमारे दिमाग के साथ खेल रहा है. जो हमें अच्छा लगता है, वही कंटेंट बार-बार हमें दिखाया जाता है. इससे हम विविध सोच (Diversity of Thought) से दूर हो जाते हैं हम वही देखते हैं, वही सुनते हैं, जो हमें पहले से पसंद है. किताबें इसके ठीक उलट काम करती हैं. वे हमें नई सोच, नए विचार और नए नजरिए से रूबरू कराती हैं.
NBT चीफ ने बता दिया दोनों में बड़ा अंतर
युवराज मलिक का मानना है कि अब समय आ गया है कि हम फिर से स्कूलों और संस्थानों में रीडिंग पीरियड को वापस लाएं. जैसे पहले लाइब्रेरी पीरियड होता था, वैसा माहौल फिर बने. उन्होंने अखबार पढ़ने की आदत पर भी जोर दिया. कुछ स्कूलों में न्यूज़पेपर रीडिंग को जरूरी किया गया है, जो एक बेहद सकारात्मक कदम है. अखबार पढ़ने से सोचने की क्षमता बढ़ती है, जबकि डिजिटल कंटेंट सिर्फ स्क्रॉल करवाता है. प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए अभियान बुक्स नॉट बुके का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि हम फूलों की जगह किताबें गिफ्ट करें. जहां भी जाएं, किताबें बांटें, किताबें साझा करें. उन्होंने एक बेहद खूबसूरत बात कही कि आज 80 इंच की स्क्रीन स्टेटस सिंबल बन गई है, लेकिन आने वाले समय में ड्रॉइंग रूम में सजी अच्छी किताबें असली स्टेटस सिंबल होनी चाहिए.
क्या इंस्टाग्राम के सामने नहीं टिक पा रहीं किताबें?
जब कोई टीनेजर कहता है कि किताबें बोरिंग हैं और इंस्टाग्राम ज्यादा इंटरेस्टिंग है, तो इसका जवाब बहुत सरल है. अगर आपने इंस्टाग्राम पर स्क्रॉल करते हुए जो देखा, उससे कहें कि वो दस पन्नों की तरह रिव्यू करके बताएं तो शायद वो नहीं कर पाएगा. लेकिन किताब पढ़ने वाला व्यक्ति उस कंटेंट को समझता है, याद रखता है और उस पर सोच पाता है. यही असली ताकत है. उन्होंने युवाओं से कहा जब आप मोबाइल उठाते हैं और किताब उठाते हैं, दोनों के बाद अपनी फीलिंग्स को खुद तुलना करके देखिए. एक तरफ होगा थोड़ी देर का मजा और अंदर से खालीपन, दूसरी तरफ होगा संतोष, समझ और आत्म-शक्ति (Empowerment).जिस दिन आप यह फर्क महसूस करने लगेंगे, उसी दिन किताबों की ओर लौट आएंगे.
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