अंतरिक्ष में इंसान रो भी नहीं सकता, आंखों से बाहर क्यों नहीं आते आंसू?
Crying In Space: अंतरिक्ष में आंसू आंख से बहते नहीं हैं. आईए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह और साइंस.

- पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण आंसू गिराता, अंतरिक्ष में वे चिपकते।
- सूक्ष्मगुरुत्वाकर्षण सतही तनाव से आंसू आंखों पर जमाव बनाते।
- यह जमाव दृष्टि बाधा बन महत्वपूर्ण कार्य मुश्किल करता।
- स्पेसवाक के दौरान आँखों में तरल जमाव खतरा।
Crying In Space: पृथ्वी पर, रोना इंसानी शरीर के सबसे आसान कामों में से एक लगता है. आंखों से आंसू निकलते हैं और ग्रेविटी की वजह से वह अपने आप गालों पर लुढ़कते हुए नीचे गिर जाते हैं. लेकिन अंतरिक्ष में यही प्रक्रिया काफी अलग तरह से काम करती है. इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन जैसे स्पेसक्राफ्ट में माइक्रो ग्रेविटी वाले माहौल में आंसू बस नीचे नहीं गिरते. इसके बजाय वे आंख से चिपके रहते हैं और धीरे-धीरे पानी की एक तैरती हुई और फैलती हुई बूंद या गोला बना सकते हैं. इसकी वजह एस्ट्रोनॉट्स का आंसू ना बना पाना नहीं बल्कि फिजिक्स है. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह.
माइक्रो ग्रेविटी में आंसुओं के साथ क्या होता है?
पृथ्वी पर यह प्रक्रिया सीधी साधी है. टियर डक्ट्स लिक्विड बनती है और ग्रेविटी उस लिक्विड को चेहरे पर नीचे की तरफ खींचती है. लेकिन माइक्रो ग्रेविटी में नीचे की तरफ कोई ऐसी ताकत नहीं होती जो आंसुओं को गालों पर नीचे की तरफ बहने में मदद कर सके.
जैसे ही आंसू निकलते हैं सर्फेस टेंशन उनकी हरकत को कंट्रोल करने लगता है. पानी के मॉलिक्यूल कुदरती तौर पर एक दूसरे को अपनी तरफ खींचते हैं. इस खूबी को कोहेजन कहते हैं. वे एडहेजन के जरिए सतहों के साथ भी इंटरेक्ट करते हैं. यह सभी फोर्स मिलकर लिक्विड को आंख से चिपकाए रखते हैं ना कि उसे नीचे गिरने देते हैं. पतली धार बनाने के बजाय आंसू आंख के चारों तरफ एक गोल बूंद या फिर गोलाकार परत बना सकते हैं.
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पानी गोला क्यों बनाता है?
सर्फेस टेंशन की वजह से लिक्विड अपनी सतह के एरिया को कम करने की कोशिश करता है. माइक्रोग्रेविटी में जहां ग्रेविटी लिक्विड के आकार को ज्यादा नहीं बदलती, पानी गोल आकार लेने लगता है. इस वजह से एस्ट्रोनॉट स्पेसक्राफ्ट के आसपास पानी की बूंद को तैरता हुआ देख सकते हैं. यही बात आंसूओं पर भी लागू होती है. जैसे-जैसे और लिक्विड बनता है बूंद बड़ी हो सकती है और त्वचा से चिपके हुए चेहरे पर फैल सकती है.
कनाडा के एस्ट्रोनॉट क्रिस हैडफील्ड ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर इस घटना का काफी अच्छा डेमोंसट्रेशन किया था. एक्सपेरिमेंट के दौरान उन्होंने सीधे अपनी आंख में पानी डाला. गाल पर नीचे बहने के बजाय पानी ने उनकी आंखों के ऊपर एक पारदर्शी परत बना दी. जैसे-जैसे और पानी डाला गया वह गोला फैलता गया और उनके चेहरे पर आगे बढ़ता गया और आखिर में दूसरी आंख तक पहुंच गया.
इससे यह साफ तौर पर देखने को मिला कि माइक्रोग्रेविटी में आम लिक्विड कैसे अलग तरह से व्यवहार कर सकता है.

क्या इससे एस्ट्रोनॉट अंधे हो सकते हैं?
इसका जवाब है हां. आंखों के आसपास काफी ज्यादा तरल पदार्थ जमा होने से अंतरिक्ष यात्रियों की नजर में रुकावट आ सकती है. पलके झपकाने से यह समस्या हमेशा हल नहीं होती. ऐसा इसलिए क्योंकि इससे तरल पदार्थ बहने के बजाय और फैल सकता है.
यह जरूरी कामों के दौरान काफी परेशानी भी पैदा कर सकता है. अंतरिक्ष यान के अंदर, अंतरिक्ष यात्री अतिरिक्त तरल पदार्थ को हटाने के लिए कपड़े, या फिर सोखने वाली चीज का इस्तेमाल कर सकते हैं. हालांकि स्पेस वॉक के दौरान स्थिति और मुश्किल हो जाती है. स्पेस सूट पहने हुए अंतरिक्ष यात्री आसानी से अपने हाथों से चेहरा नहीं पोंछ सकते. हेलमेट और सूट एक बंद माहौल बनाते हैं जिसमें अतिरिक्त तरल पदार्थ को संभालना काफी मुश्किल होता है.

स्पेस वॉक के दौरान गंभीर खतरा
स्पेस वॉक या फिर एक्स्ट्रा व्हीक्युलर एक्टिविटी के लिए अंतरिक्ष यात्रियों को दबाव वाले स्पेस सूट पहनकर अंतरिक्ष यान के बाहर काम करना पड़ता है. रास्ता खोजने, उपकरण संभालने और बातचीत करने के लिए उनकी नजर का सही होना काफी जरूरी है. अगर आंखों पर आंसू या फिर कोई और तरल पदार्थ जमा हो जाए तो उस रुकावट को हटाना मुश्किल हो सकता है. इस वजह से अंतरिक्ष यात्रियों के पास सूट के अंदर तरल पदार्थ और दूसरी समस्या को संभालने के लिए खास तरीके और उपकरण होते हैं.
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