कितने दिन में घिस जाते हैं ट्रेन के पहिये, कितने का आता है एक जोड़ा?
जानें पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों के पहियों की लाइफ और उनके घिसने की पूरी वजह, कितने लाख रुपये में आता है व्हील्स का एक जोड़ा और कैसे होती है इनकी समय-समय पर मेंटेनेंस

भारतीय रेलवे को देश की लाइफलाइन कहा जाता है, जिसमें हर दिन करोड़ों यात्री सफर करते हैं. इस विशाल रेल नेटवर्क को सुरक्षित और सुचारू रूप से चलाने में ट्रेन के पहियों की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका होती है. पटरी पर दौड़ती ट्रेन का पहिया सिर्फ लोहे का एक गोल टुकड़ा नहीं होता, बल्कि इसे खास स्टील मिश्रधातु से तैयार किया जाता है, ताकि यह भारी वजन और तेज रफ्तार के घर्षण को आसानी से सह सके.
रेलवे के सुरक्षित सफर के बीच अक्सर लोगों के मन में यह उत्सुकता रहती है कि दिन-रात पटरियों पर दौड़ने वाले ये पहिये आखिर कितने दिनों में घिस जाते हैं और इनकी कीमत कितनी होती है. विश्वसनीय सरकारी और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रेन के पहियों की लाइफ और उनकी कीमत का गणित बेहद दिलचस्प है.
कितने दिन या किलोमीटर में घिस जाते हैं पहिये?
ट्रेन के पहियों की उम्र को दिनों या महीनों के बजाय उनके द्वारा तय की गई दूरी किलोमीटर से नापा जाता है. सामान्य तौर पर एक पैसेंजर ट्रेन के पहियों की लाइफ 4 से 6 साल तक की होती है. इस समय के दौरान ये पहिये करीब 12 लाख से 15 लाख किलोमीटर तक का सफर तय कर लेते हैं, जिसके बाद इन्हें बदलने की जरूरत पड़ती है.
हालांकि, कुछ आधुनिक और उच्च गुणवत्ता वाले पहिये इससे ज्यादा सफर भी तय कर लेते हैं. पहियों के घिसने की रफ्तार इस बात पर भी निर्भर करती है कि पटरी पर कितना ट्रैफिक है, ट्रेन की रफ्तार कितनी है, उस पर कितना वजन लदा है और वह रास्ता कितना घुमावदार है.
कैसे होती है पहियों की देखरेख और सर्विसिंग?
सुरक्षा को सर्वोपरि रखने के लिए भारतीय रेलवे नियमित रूप से इन पहियों की जांच और रखरखाव करता है. रेलवे के नियमों के मुताबिक, हर 2 लाख से 3 लाख किलोमीटर की दौड़ के बाद ट्रेन के पहियों की सर्विसिंग की जाती है. इस दौरान पहियों के आकार, उनकी मोटाई और घर्षण के स्तर को मापा जाता है. हर तीन महीने में पहियों का डाइमेंशन टेस्ट होता है.
यदि पहियों में मामूली घिसावट या असंतुलन होता है, तो उन्हें पूरी तरह बदलने के बजाय री-प्रोफाइलिंग तकनीक के जरिए खराद मशीन पर चढ़ाकर दोबारा गोल और चमकदार बना दिया जाता है, जिससे उनकी उम्र बढ़ जाती है. लेकिन अगर पहिये में कोई क्रैक या कड़ापन आ जाए, तो उसे तुरंत रिप्लेस कर दिया जाता है.
कितने का आता है ट्रेन का एक पहिया और एक जोड़ा?
रेलवे से जुड़े आंकड़ों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय रेलवे में इस्तेमाल होने वाले एक फुल-साइज पैसेंजर व्हील की कीमत लगभग 70 हजार से लेकर 80 हजार रुपये तक होती है. यह कीमत मुख्य रूप से इम्पोर्टेड यानी विदेशों से मंगाए जाने वाले पहियों की होती है, जिन्हें भारत लाने के बाद रेलवे के लोकोमोटिव या कोच फैक्ट्रियों में असेंबल किया जाता है.
इस हिसाब से यदि ट्रेन के पहियों के एक जोड़े की बात करें, तो पहियों के एक जोड़े की कीमत लगभग 1.40 लाख से 2 लाख रुपये बैठती है. हालांकि, अगर पूरे व्हीलसेट की कुल कीमत देखी जाए, तो वह लगभग 2 लाख से 4 लाख रुपये तक पहुंच जाती है.
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एक पूरे कोच के पहियों पर कितना आता है खर्च?
ट्रेन के डिब्बों में पहियों की संख्या के हिसाब से कुल खर्च का आंकड़ा काफी बड़ा हो जाता है. भारतीय रेलवे के एक सामान्य पैसेंजर कोच के नीचे कुल दो बोगियां लगी होती हैं और हर बोगी में 4 पहिये होते हैं. इस तरह ट्रेन के सिर्फ एक डिब्बे में कुल 8 पहिये फिट किए जाते हैं.
यदि एक पहिये की औसतन कीमत 70,000 रुपये मानी जाए, तो सिर्फ एक कोच के पहियों पर रेलवे का करीब 5.60 लाख रुपये का खर्च आता है. इस गणित के हिसाब से 18 से 22 डिब्बों वाली एक पूरी एक्सप्रेस ट्रेन के केवल पहियों की कुल कीमत ही करोड़ों रुपये में पहुंच जाती है, जिसमें इंजन के बड़े और भारी पहियों की कीमत अलग से जुड़ती है.
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