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बिना खाए-पिए कितने दिन जिंदा रह सकता है इंसान, जानें कब हो जाती है मौत?

मानव शरीर की अपनी एक निश्चित और सीमित आंतरिक क्षमता होती है, जिसके बल पर वह खाना-पानी न मिलने पर भी कुछ समय तक जीवन को बनाए रखने का प्रयास करता है. आइए जानें कब इंसान की मौत हो जाती है.

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  • जीवित रहने की अवधि शारीरिक बनावट, मौसम पर निर्भर करती है.

कुदरत ने इंसान के जिस्म की बनावट को बेहद पेचीदा और मजबूत बनाया है. जब कभी कोई इंसान किसी हादसे या मजबूरी के चलते ऐसी स्थिति में फंस जाता है जहां भोजन और पानी की एक बूंद भी मयस्सर नहीं होती, तब हमारा शरीर जीवित रहने के लिए अंदरूनी स्तर पर एक जंग शुरू कर देता है. लेकिन इस सहनशक्ति की भी अपनी एक आखिरी सीमा होती है, जिसके पार जाते ही मौत निश्चित हो जाती है. वैज्ञानिक और मेडिकल रिसर्च के आंकड़ों के जरिए यह समझना बेहद दिलचस्प है कि बिना अन्न और जल के हमारा शरीर आखिर कितने दिनों तक अपने भीतर जीवन की लौ को जलाए रख सकता है. चलिए जानें.

पानी के बिना घुटने टेक देता है इंसान का शरीर

इंसान के जिंदा रहने के लिए भोजन से कहीं ज्यादा जरूरी पानी होता है. मेडिकल साइंस के मुताबिक, सामान्य परिस्थितियों में एक स्वस्थ इंसान पानी के बिना केवल 3 से 5 दिन तक ही जीवित रह सकता है. पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन होते ही हमारे शरीर के भीतर मौजूद खून गाढ़ा होने लगता है और कोशिकाओं में ऑक्सीजन की सप्लाई रुकने लगती है. पानी के बिना महज 3 दिन बीतते ही शरीर के मुख्य अंग, खास तौर पर इंसान का मस्तिष्क, तेजी से काम करना बंद कर देता है, जिससे इंसान अचेत होने लगता है.

चंद दिनों में थम जाती हैं सांसें

जब शरीर को लगातार कई दिनों तक पानी नहीं मिलता, तो अंदरूनी तंत्र पूरी तरह चरमरा जाता है. किडनी खून को साफ करना बंद कर देती है, जिससे शरीर में जहरीले तत्व बढ़ने लगते हैं. पानी की भयंकर कमी के चलते शरीर के तमाम जरूरी अंग एक के बाद एक काम करना बंद कर देते हैं, जिसे मेडिकल साइंस की भाषा में 'मल्टीपल ऑर्गन फेलियर' कहा जाता है. इस हालत में पहुंचने के बाद इंसान का बचना नामुमकिन हो जाता है और 3 से 5 दिन के भीतर ही तड़प-तड़प कर व्यक्ति की मौत हो जाती है.

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पानी मिलता रहे तो लंबे समय तक चल सकती है जिंदगी

अगर किसी इंसान को खाना न मिले लेकिन पर्याप्त मात्रा में पीने का साफ पानी मिलता रहे, तो उसका शरीर सिर्फ ऊर्जा के अभाव में काफी लंबा वक्त गुजार सकता है. ऐसी स्थिति में एक आम इंसान लगभग 1 से 2 महीने यानी करीब 30 से 60 दिनों तक बिना भोजन के भी जिंदा रह सकता है. भोजन के अभाव में शरीर को जिंदा रखने के लिए हमारा सिस्टम पेट में जमा पुरानी चर्बी और ऊर्जा के अन्य स्रोतों का इस्तेमाल करने लगता है, जिससे बाहरी खाने के बिना भी दिल की धड़कनें चलती रहती हैं.

चर्बी और मांसपेशियों को गलाकर ऊर्जा बनाता है सिस्टम

भोजन न मिलने पर शरीर के काम करने का तरीका पूरी तरह बदल जाता है. बाहरी ईंधन न मिलने के कारण सबसे पहले शरीर में मौजूद ग्लूकोज खत्म होता है. इसके बाद हमारा सिस्टम खुद को बचाने के लिए पहले शरीर में जमा फैट यानी चर्बी को पिघलाना शुरू करता है. जब फैट भी पूरी तरह खत्म हो जाता है, तो शरीर अपनी ही मांसपेशियों के प्रोटीन को गलाकर जरूरी ऊर्जा बनाने लगता है. इस प्रक्रिया के कारण इंसान का पूरा शरीर अंदर से बेहद कमजोर और कंकाल जैसा होने लगता है.

वजन घटने के साथ रुक जाती है दिल की धड़कन

भुखमरी के इस आखिरी दौर में जब शरीर का कुल वजन घटकर अपने मूल वजन से लगभग 18 से 20 प्रतिशत तक कम हो जाता है, तब मौत का खतरा सिर पर मंडराने लगता है. इस कदर वजन गिरने से शरीर के भीतर भयंकर कुपोषण फैल जाता है और अंदरूनी अंगों की ताकत पूरी तरह खत्म हो जाती है. मांसपेशियों के गलने के कारण दिल की दीवारें बेहद कमजोर हो जाती हैं और अंत में अचानक हृदय गति रुकने (हार्ट फेलियर) से इंसान की तड़पकर मौत हो जाती है.

मौसम और शारीरिक बनावट पर टिका है आखिरी समय

भूख और प्यास से लड़ने की यह समय-सीमा हर इंसान के लिए बिल्कुल एक जैसी नहीं होती, बल्कि यह कई मुख्य कारकों पर निर्भर करती है. जिन लोगों के शरीर का वजन थोड़ा ज्यादा होता है या जिनमें फैट की मात्रा अधिक होती है, वे बहुत दुबले लोगों की तुलना में ज्यादा दिनों तक भूखे रह सकते हैं. इसके अलावा बच्चों और बुजुर्गों की सहनशक्ति वयस्कों और महिलाओं के मुकाबले बहुत कम होती है. अत्यधिक गर्मी का मौसम होने पर पसीने के जरिए शरीर का पानी जल्दी सूख जाता है, जिससे मौत और जल्दी हो सकती है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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