Crude Oil Extraction From Sea: समंदर के अंदर से कैसे निकाला जाता है क्रूड ऑयल? पूरा प्रोसेस जान लेंगे तो हिल जाएंगे
Crude Oil Extraction From Sea: गहरे समंदर के नीचे से कच्चा तेल निकालना इंजीनियरिंग और तकनीक का एक अद्भुत मेल है. यह पूरी प्रक्रिया सीस्मिक सर्वे से शुरू होती है.

Crude Oil Extraction From Sea: क्या आपने कभी सोचा है कि जिस पेट्रोल-डीजल से आपकी गाड़ी चलती है, वह हजारों फीट गहरे समंदर के नीचे से आप तक कैसे पहुंचता है? इंसान जहां बिना सुरक्षा उपकरणों के जा भी नहीं सकता, वहां भारी-भरकम मशीनें दिन-रात काम कर कर धरती के इस कीमती खजाने को बाहर निकालती हैं. यह सिर्फ खुदाई नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग का एक ऐसा करिश्मा है जिसमें जोखिम और रोमांच का बेजोड़ संगम देखने को मिलता है.
लहरों के नीचे कैसे होती है तेल की तलाश?
समंदर के नीचे तेल निकालना सीधे तौर पर गड्ढा खोदने जैसा नहीं है. इसकी शुरुआत होती है एक जटिल वैज्ञानिक जांच से, जिसे सीस्मिक सर्वे कहा जाता है. इस प्रक्रिया में जहाजों के जरिए समुद्री सतह पर विशेष ध्वनि तरंगें (Sound Waves) छोड़ी जाती हैं. ये तरंगें जब समंदर की गहराई में मौजूद चट्टानों की परतों से टकराकर वापस आती हैं, तो उनके इको का अध्ययन किया जाता है. इससे विशेषज्ञों को यह समझ आता है कि किन परतों के बीच हाइड्रोकार्बन यानी कच्चा तेल दबा हो सकता है.
लोहे के टापू यानी ड्रिलिंग रिग्स की तैयारी
एक बार जब तेल के भंडार की लोकेशन पक्की हो जाती है, तो वहां ड्रिलिंग रिग भेजा जाता है. यह रिग असल में लोहे का एक विशालकाय तैरता हुआ टापू होता है. यह इतना मजबूत होता है कि समंदर की ऊंची लहरों और तूफानों के बीच भी अपनी जगह पर स्थिर रहता है. गहराई के आधार पर इन रिग्स को या तो समंदर के तल पर फिक्स किया जाता है या फिर इन्हें विशेष लंगर और मशीनों के जरिए पानी पर तैराते हुए एक ही जगह टिकाए रखा जाता है.
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हजारों फीट नीचे समंदर में छेद करने की कला
अब असली काम शुरू होता है ड्रिलिंग का. हीरे जैसी मजबूत धातु से बने ड्रिल बिट्स पाइपों के सहारे समुद्री तल की कठोर चट्टानों को चीरते हुए नीचे जाते हैं. जैसे-जैसे ड्रिलिंग पाइप गहराई में पहुंचती है, वैसे-वैसे दबाव बढ़ता जाता है. इस दौरान स्टील की केसिंग का इस्तेमाल किया जाता है ताकि खुदाई वाला हिस्सा धंस न जाए. यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक कि पाइप सीधे उस भंडार (Reservoir) तक न पहुंच जाए जहां तेल और गैस जमा हैं.
ब्लोआउट प्रिवेंटर यानि सुरक्षा का महाकवच
ड्रिलिंग के दौरान सबसे बड़ा खतरा ब्लोआउट का होता है. जब पाइप तेल के भंडार तक पहुंचती है, तो नीचे से भारी दबाव के साथ गैस और तेल ऊपर की ओर भागते हैं. अगर इसे कंट्रोल न किया जाए, तो प्लेटफॉर्म पर भयानक विस्फोट हो सकता है. इसे रोकने के लिए 'ब्लोआउट प्रिवेंटर' (BOP) नाम की एक भारी मशीन लगाई जाती है. यह एक सुरक्षा वाल्व की तरह काम करती है जो किसी भी आपात स्थिति में पाइप को तुरंत सील कर देती है और दबाव को काबू में रखती है.
कैसे बाहर लाया जाता है कच्चा तेल?
जब तेल और गैस सुरक्षित तरीके से पाइप के जरिए ऊपर आने लगते हैं, तो इन्हें अलग करने का काम शुरू होता है. अक्सर तेल के साथ गैस और पानी भी मिले होते हैं. प्लेटफॉर्म पर लगी बड़ी मशीनों की मदद से गैस को अलग कर लिया जाता है, जिसे पाइपलाइनों के जरिए किनारे तक भेजा जाता है. वहीं, जो गाढ़ा काला सोना यानी कच्चा तेल मिलता है, उसे बड़े-बड़े जहाजों (टैंकरों) में भरा जाता है.
मशीनों और रोबोट्स का होता है खास रोल
समंदर की अत्यधिक गहराई में जहां इंसान नहीं पहुंच सकते, वहां 'रिमोट ऑपरेटेड व्हीकल्स' (ROV) काम आते हैं. ये छोटे रोबोटिक जहाज होते हैं जिन्हें ऊपर बैठकर ऑपरेटर कंट्रोल करते हैं. ये रोबोट समंदर के तल पर पाइपलाइन बिछाने, रिपेयरिंग करने और मशीनों की जांच करने का काम करते हैं. इसके साथ ही 'सबसी पंप्स' का इस्तेमाल किया जाता है ताकि तेल को खींचकर ऊपर तक लाने में आसानी हो.
भारत में कहां निकाला जाता है तेल?
भारत के लिए भी ऑफशोर ड्रिलिंग बहुत महत्वपूर्ण है. अरब सागर में स्थित 'मुंबई हाई' इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. यहां समंदर के बीचों-बीच स्थित रिग्स से देश की तेल और गैस की जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा पूरा होता है. यह तकनीक न केवल हमें ऊर्जा के क्षेत्र में मजबूत बनाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे आधुनिक विज्ञान ने कुदरत की गहराइयों तक अपनी पहुंच बना ली है.
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