कैसे होता है ट्रांसजेंडर बच्चे का जन्म, जानें इसके पीछे का साइंस?
Transgender Child: अक्सर ही लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर ट्रांसजेंडर बच्चा कैसे पैदा होता है. जानें क्या है इसके पीछे का विज्ञान और इस बारे में पूरी जानकारी.

- ट्रांसजेंडर पहचान क्रोमोसोम, हार्मोन असंतुलन से भिन्न है।
- इंटरसेक्स बदलाव लिंग विकास में भिन्नताएं दर्शाते हैं।
- लैंगिक पहचान जटिल जैविक, विकासात्मक कारकों से बनती है।
Transgender Child: बच्चों के जन्म और विकास में क्रोमोसोम, जीन, हार्मोन और भ्रूण के विकास का एक जटिल मेल होता है. हालांकि क्रोमोसोम जैविक लिंग के कई पहलुओं को तय करने में मदद करते हैं, लेकिन ट्रांसजेंडर होना इंटरसेक्स होने से अलग है और इसे किसी एक क्रोमोसोम की गड़बड़ी या फिर हार्मोन के असंतुलन से नहीं समझाया जा सकता.
आमतौर पर इंसानी प्रजनन में मां अंडे के जरिए X क्रोमोसोम देती है और पिता के स्पर्म में या तो X या Y क्रोमोजोम होता है. आइए जानते हैं कि ट्रांसजेंडर बच्चे का जन्म कैसे होता है इसके पीछे क्या विज्ञान है. जानें इस बारे में पूरी जानकारी.
क्रोमोसोम का बुनियादी विज्ञान
अगर X वाला स्पर्म अंडे को फर्टिलाइज करता है तो बनने वाला क्रोमोसोम पैटर्न आमतौर पर XX होता है. अगर Y वाला स्पर्म अंडे को फर्टिलाइज करता है तो आम पैटर्न XY होता है.
हालांकि क्रोमोसोम जैविक लिंग विकास का सिर्फ एक हिस्सा हैं. जीन, हार्मोन और हार्मोन के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया भी प्रजनन अंगों और दूसरी शारीरिक विशेषताओं के विकास पर असर डालती हैं.

इंटरसेक्स बदलावों का कारण क्या है ?
कुछ बच्चे क्रोमोसोम, हार्मोन, प्रजनन अंगों या जननांगों की बनावट में ऐसे बदलावों के साथ पैदा होते हैं जो पुरुष या फिर महिला शरीर की आम परिभाषाओं में फिट नहीं बैठते. इंटरसेक्स बदलाव कहा जाता है.
क्रोमोसोम पैटर्न कभी-कभी आम XX या XY कांबिनेशन से अलग हो सकते हैं. उदाहरण के लिए XYY, XXY और XO. जैसे क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम आमतौर पर XXY क्रोमोसोम पैटर्न से जुड़ा होता है और शारीरिक व प्रजनन विकास पर असर डाल सकता है. यह बदलाव ट्रांसजेंडर होने जैसे नहीं हैं. हो सकता है कि कोई इंटरसेक्स व्यक्ति खुद को ट्रांसजेंडर माने या फिर ना माने.
क्या हार्मोन के असंतुलन से बच्चा ट्रांसजेंडर हो सकता है?
भ्रूण के विकास में खासकर प्रजनन अंगों और दूसरी लैंगिक विशेषताओं के विकास में हार्मोन बड़ी भूमिका निभाते हैं. हार्मोन बनने या फिर हार्मोन के प्रति शरीर के प्रतिक्रिया में बदलाव लिंग विकास में कुछ अंतर पैदा कर सकते हैं.
हालांकि मौजूदा वैज्ञानिक समझ इस बात का समर्थन नहीं करती कि गर्भावस्था के दौरान मां का हार्मोन असंतुलन बच्चों के ट्रांसजेंडर होने का कोई सीधा या फिर पुख्ता कारण है.
जेंडर आईडेंटिटी जैविक और विकासात्मक वजहों के जटिल मेल पर विकसित होती है. इसी के साथ शोधकर्ता जेनेटिक्स, जन्म पूर्व विकास, हार्मोन और मस्तिष्क के विकास की संभावित भूमिकाओं पर लगातार स्टडी कर रहे हैं.
जेंडर डिस्फोरिया क्या है?
ट्रांसजेंडर व्यक्ति की जेंडर आईडेंटिटी उस लिंग से अलग होती है जो उन्हें जन्म के साथ दिया गया था. जनरल डिस्फोरिया एक अलग मेडिकल शब्द है जो उस गंभीर परेशानी को बताता है जो इस बेमेलपन की वजह से हो सकती है. ट्रांसजेंडर होना और जेंडर डिस्फोरिया महसूस करना बिल्कुल एक ही बात नहीं है. हर ट्रांसजेंडर व्यक्ति को जेंडर डिस्फोरिया नहीं होता है.

यह अंतर क्यों जरूरी है?
बायोलॉजिकल सेक्स डेवलपमेंट, इंटरसेक्स वेरिएशन और जेंडर आइडेंटिटी के बीच अंतर समझना जरूरी है. क्रोमोसोमल या फिर हार्मोनल बदलाव सेक्स डेवलपमेंट में अंतर की वजह बन सकते हैं लेकिन ऐसा कोई एक क्रोमोसोम, जीन या प्रेगनेंसी से जुड़ी हार्मोनल घटना नहीं है जो यह बता सके की कोई व्यक्ति ट्रांसजेंडर क्यों है.
वैज्ञानिक अभी भी इस बात की जांच कर रहे हैं कि बायोलॉजिकल और डेवलपमेंट से जुड़े कारक जेंडर आईडेंटिटी में कैसे भूमिका निभाते हैं. जो बात साफ है वह यह है कि इंसानी सेक्स डेवलपमेंट और जेंडर आईडेंटिटी में मुश्किल प्रक्रियाएं शामिल होती हैं, जिन्हें किसी एक साधारण बायोलॉजिकल कारण से नहीं समझा जा सकता.
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जेंडर आइडेंटिटी के बारे में विज्ञान क्या कहता है?
जेंडर आइडेंटिटी सिर्फ जन्म के समय बच्चे के शारीरिक रूप-रंग से तय नहीं होती है. विकास के दौरान शरीर और दिमाग में कई जटिल बायोलॉजिकल प्रक्रियाएं होती हैं. इनमें जीन, हार्मोन और न्यूरल डेवलपमेंट शामिल होते हैं. रिसर्च करने वालों ने कुछ बायोलॉजिकल कारकों और जेंडर आईडेंटिटी के बीच संबंध का पता लगाया है लेकिन ऐसी कोई एक वजह नहीं है जिससे यह पता चल सके कि कोई बच्चा बड़ा होकर ट्रांसजेंडर बनेगा या फिर नहीं.
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