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Astronauts Sleep: अंतरिक्ष में कैसे सोते हैं अंतरिक्ष यात्री, जानें पृथ्वी से कैसे होता है यह अलग?

Astronauts Sleep: अक्सर ही लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में कैसे सोते हैं. आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

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  • अंतरिक्ष यात्री माइक्रोग्रॉविटी में सोने के लिए खुद को बांधते हैं।
  • अंतरिक्ष यात्री छोटे निजी कमरों में स्लीपिंग बैग का इस्तेमाल करते हैं।
  • अंतरिक्ष में सोने पर शरीर पर दबाव नहीं पड़ता, तकिये की ज़रूरत नहीं।
  • अंतरिक्ष यात्री स्टेशन के शोर से बचने के लिए ईयरप्लग का उपयोग करते हैं।

Astronauts Sleep: अंतरिक्ष में सोना पृथ्वी पर सोने से बिल्कुल अलग होता है.  ऐसा इसलिए क्योंकि अंतरिक्ष यात्री ऐसे माहौल में रहते हैं जहां गुरुत्वाकर्षण लगभग शून्य होता है. इसे माइक्रोग्रैविटी भी कहा जाता है. पृथ्वी के उलट जहां लोग बिस्तर पर तकिया और कंबल ओढ़ कर सोते हैं अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों को सोते समय खुद को सुरक्षित बांध कर रखना पड़ता है. ऐसा इसलिए ताकि वे स्टेशन के अंदर बेकाबू होकर इधर-उधर ना तैरते फिरें.

अंतरिक्ष यात्रियों के कमरे 

अंतरिक्ष स्टेशन पर मौजूद हर अंतरिक्ष यात्री को सोने के लिए एक छोटा सा निजी कमरा दिया जाता है. इसे क्रू क्वार्टर्स कहा जाता है. ये कमरे काफी छोटे होते हैं. इनका आकार लगभग एक टेलीफोन बूथ या फिर घर के किसी बड़े फ्रिज जितना होता है. इन कमरों के अंदर अंतरिक्ष यात्रियों के पास एक स्लीपिंग बैग, एक लैपटॉप, पढ़ने के लिए लाइट, निजी सामान और कुछ और चीज़े होती हैं. इन सभी चीजों को दीवारों से सुरक्षित रूप से चिपकाकर रखा जाता है.

स्लीपिंग बैग का इस्तेमाल 

क्योंकि अंतरिक्ष में कोई भी गुरुत्वाकर्षण नहीं होता इस वजह से अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी की तरह सीधे बिस्तर पर लेटकर नहीं सो सकते. इसके बजाए वे खास तौर पर डिजाइन किए गए स्लीपिंग बैग के अंदर जीप लगाकर खुद को बंद कर लेते हैं. ये स्लीपिंग बैग पट्टियों या फिर इलास्टिक बंजी कॉर्ड की मदद से दीवारों या फिर छतों से जुड़े होते हैं. अंतरिक्ष में ऊपर और नीचे जैसी दिशाओं का कोई मतलब नहीं रह जाता. इस वजह से तकनीकी रूप से अंतरिक्ष यात्री किसी भी स्थिति में सो सकते हैं. 

अंतरिक्ष में तकियों की कोई जरूरत नहीं 

पृथ्वी और अंतरिक्ष में सोने के बीच एक बड़ा फर्क यह है कि अंतरिक्ष में शरीर पर किसी भी तरह का दबाव नहीं पड़ता. क्योंकि अंतरिक्ष यात्री माइक्रोग्रैविटी में आजादी से तैरते रहते हैं इस वजह से उनकी पीठ, गर्दन या फिर जोड़ों पर कोई भी दबाव नहीं पड़ता. यही वजह है कि उन्हें पृथ्वी पर इस्तेमाल होने वाले गद्दों या फिर तकियों की कोई जरूरत नहीं पड़ती.

स्पेस स्टेशन के अंदर का शोर 

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन वेंटीलेशन सिस्टम, कंप्यूटर, पंप और वैज्ञानिक उपकरणों की लगातार होने वाली भिनभिनाहट से भरा रहता है. इस लगातार होने वाले शोर को रोकने के लिए अंतरिक्ष यात्री अक्सर सोते समय ईयरप्लग पहनते हैं. इसके अलावा रात के समय स्टेशन की मुख्य लाइट और कैमरे इस तरह से सेट किए जाते हैं ताकि गोपनीयता बनी रहे.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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