India Protest History: भारत के 5 सबसे बड़े जन आंदोलन कौन से, क्या रहा था उनका रिजल्ट
India Protest History: भारत में हाल ही में कई बड़े आंदोलन देखने को मिले हैं. इसी बीच आइए जानते हैं देश के उन पांच सबसे बड़े आंदोलनों के बारे में जिन्होंने एक बड़ी छाप छोड़ी.

- भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश राज की नींव कमजोर की।
- जेपी आंदोलन ने इंदिरा सरकार चुनौती दी, गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
- चिपको आंदोलन ने व्यावसायिक पेड़ कटाई पर प्रतिबंध लगवाया।
- अन्ना और किसान आंदोलन ने सरकारों से कानून बदलवाए।
India Protest History: भारत का मौजूदा दौर कई बड़े आंदोलनों का गवाह बन चुका है. हाल ही में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की इस्तीफे को लेकर हुए प्रदर्शन के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. भारत के इतिहास को उन जन आंदोलन द्वारा आकार मिला है जो सत्ता को चुनौती देने, बदलाव की मांग करने के लिए समाज के बड़े वर्गों को साथ लाते हैं. ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष से लेकर आजाद भारत में विरोध प्रदर्शन तक इन अभियानों के परिणाम उनके आयोजकों की मांग से काफी ज्यादा रहे हैं.
आइए जानते हैं भारत के उन पांच आंदोलन के बारे में जिनके परिणामों ने स्वतंत्रता संग्राम को मजबूत करने और सरकारों को बदलने से लेकर जंगल की रक्षा, एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने और कानून निरस्त करने के लिए मजबूर किया.
भारत छोड़ो आंदोलन
1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू किया गया भारत छोड़ो आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संग्राम का आखिरी राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन बन गया. गांधी जी ने इसे करो या मरो का नारा दिया. महिलाओं, छात्रों, किसानों और मजदूरों ने इसमें भाग लिया जिससे यह ब्रिटिश शासन के लिए एक चुनौती बन गया.
ब्रिटिश सरकार ने गंभीर दमन के साथ जवाब दिया और आंदोलन के बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया. कार्रवाई के बावजूद सार्वजनिक भागीदारी के पैमाने ने यह साफ कर दिया कि ब्रिटिश शासन जारी रहना लगातार मुश्किल होता जा रहा था. इस आंदोलन में 1947 में भारत की आजादी की नींव मजबूत की.

जेपी आंदोलन या संपूर्ण क्रांति
1974-75 में जेपी, संपूर्ण क्रांति के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन बिहार और उत्तर भारत के दूसरे हिस्सों में मजबूती से उभरा. इसने छात्रों और जनता को भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और प्रतिभागियों द्वारा दोषपूर्ण सरकारी नीतियों के खिलाफ संगठित किया. यह आजाद भारत में किसी सरकार के लिए सबसे जरूरी जन चुनौतियों में से एक बन गया.
आंदोलन के बढ़ते दबाव के जवाब में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देशव्यापी आपातकाल लगा दिया. आपातकाल खत्म होने के बाद 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा. जनता पार्टी ने राजनीतिक परिवर्तन का प्रतीक बनाकर केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनाई.

चिपको आंदोलन
1973 में चिपको आंदोलन वर्तमान उत्तराखंड जो उस वक्त उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, के चमोली जिले में शुरू हुआ. सुंदरलाल बहुगुणा सहित स्थानीय ग्रामीण महिलाओं और पर्यावरणविदों ने कमर्शियल ठेकेदारों द्वारा जंगलों को काटने का विरोध किया. प्रदर्शनकारियों ने पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उन्हें गले लगा लिया या फिर उनसे चिपक गए. यहीं से इस आंदोलन को यह नाम मिला.
यह अभियान पर्यावरण जागरूकता में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश के तहत सरकार ने हिमालय क्षेत्र में कमर्शियल पेड़ों की कटाई पर 15 साल का प्रतिबंध लगा दिया. आंदोलन ने इस बात को दर्शाया कि कैसे संगठित स्थानीय कार्रवाई पर्यावरण नीति को प्रभावित कर सकती है.
अन्ना आंदोलन या इंडिया अगेंस्ट करप्शन
2011 में गांधीवादी कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में दिल्ली के रामलीला मैदान से इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन को रफ्तार मिली. यह एक शहरी, मध्यवर्गीय लामबंदी बन गई जिसमें भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए केंद्रीय स्तर पर एक मजबूत लोकपाल की स्थापना की मांग की गई है.
जनता के दबाव की वजह से सरकार को संसद में जन लोकपाल विधेयक पारित करना पड़ा. राजनीतिक रूप से आंदोलन ने सत्तारूढ़ यूपीए सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया और 2011 में सत्ता परिवर्तन में योगदान दिया. आम आदमी पार्टी भी इसी आंदोलन से उभरी.
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किसान आंदोलन
2020-21 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानून के विरोध में किसानों का आंदोलन शुरू हुआ. खास तौर से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हजारों की संख्या में किसान दिल्ली की सीमाओं पर इकट्ठा हुए और एक साल से ज्यादा समय तक अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखा.
नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि सभी तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त कर दिया जाएगा. लगातार विरोध और राजनीतिक दबाव के बाद यह फैसला लिया गया.
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