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अब इन अलग-अलग तरीकों से अंतिम संस्कार कर रहे हैं लोग... कारण है पर्यावरण को बचाना

आमतौर पर जब किसी का अंतिम संस्कार किया जाता है तो अलग-अलग रिवाजों के मुताबिक या तो शव को जलाया जाता है या दफनाया जाता है. इसके अलावा भी अंतिम संस्कार के आजकल कुछ नए तरीके अपनाए जा रहे है.

पर्यावरण के प्रति विश्व जागरूकता बढ़ रही है. लोग अंतिम संस्कार के तरीकों में परिवर्तन कर रहे हैं. मृत शरीरों को जलाने या दफनाने के बजाय उन्हें अलग-अलग तरीकों से डिकंपोज किया जा रहा है. अंतिम संस्कार के ये तरीके ग्रीनहाउस गैस एमिशन को ध्यान में रखकर अपनाए जा रहे हैं. इसमें से एक एक्वामेशन है, जिसमें पोटैशियम हाइड्रोऑक्साइड जैसे एल्कलाई योगिक में शव को रखकर उसे गर्म किया जाता है. यहां हम आपको ऐसे ही 8 तरीकों के बारे में बताने जा रहे हैं.

टेरामेशन

पार्थिव देह को मिट्टी बनाने की प्रक्रिया को टेरामेशन कहते हैं. इसमें देह को बक्से में रखा जाता है. शरीर में लगे पेसमेकर जैसे बाहरी इक्विपमेंट्स निकाल दिए जाते हैं. लकड़ी के चिप्स और दूसरे जैव पदार्थों की उपस्थिति में गर्म हवा अपघटन की क्रिया को तेज कर देती है. मात्र 30 दिनों के भीतर हड्डियों से लेकर दांत  तक भी मिट्टी में मिल जाते हैं. इसमें एक घन मीटर मिट्टी प्राप्त होती है.

क्रायोमेशन

ग्रीक शब्द क्रिए का लैटिन भाषा में अपभ्रंश क्रायो होता है, जिसका अर्थ है बहुत ज्यादा ठंडा. क्रायोमेशन में डेड बॉडी को फ्रीज किया जाता है. इस प्रक्रिया में शरीर को - 192°C तक ठंडा किया जाता है. इसके लिए लिक्विड नाइट्रोजन का उपयोग होता है. इससे शरीर के बेहद छोटे-छोटे टुकड़े हो जाते हैं. ये पाउडर जैसे दिखने लगते हैं. मैगनेट की मदद से शरीर पर मौजूद मेटल ऑब्जेक्ट्स जैसे- पेसमेकर, आर्टिफिशियल लिंब को हटाया जाता है. इसके बाद सिर्फ पाउडर ही बचता है, जिसे परिवार को सौंप दिया जाता है. इसका खर्च करीब एक करोड़ 64 लाख होता है.

प्लास्टिनेशन

प्लास्टिनेशन में मेडिकल पर्पस या पब्लिक डिस्प्ले के लिए शरीर के अंगों, टिश्यू या पूरे शरीर को ही प्रीजर्व किया जाता है. 1977 में जर्मन एनाटोमिस्ट गुंथर वॉन हेगेंस ने अंतिम संस्कार का ये तरीका ढूंढा था. प्लास्टिनेशन में सबसे पहले शरीर को सड़ाने वाले बैक्टेरिया को मारने के लिए फॉर्मेल्डिहाइड - बेस्ड सॉल्यूशन लगाया जाता है. इसके बाद शरीर पर मौजूद पानी को हटाने के लिए एसीटोन के मिश्रण में मृत शरीर को डुबाया जाता है. फिर बॉडी को लिक्विड पॉलिमर जैसे- सिलिकॉन से भरे कंटेनर में डाला जाता है. आखिर में बॉडी पर लगे पॉलिमर को सख्त करने के लिए शरीर को गर्माहट दी जाती है या धूप में रख दिया जाता है.

स्काई बरियल

तिब्बत का बौद्ध समुदाय स्काई बरियल या झाटोर अंतिम संस्कार क्रिया का पालन हजारों सालों से करते आ रहे हैं. इस क्रिया में पहले शव को शमशान ले जाया जाता है. ये शमशान एक ऊंचाई वाले इलाके में होता है. वहां पर लामा (बौद्ध भिक्षु) धूप बत्ती जलाकर शव का पूजन करते हैं. फिर बॉडी को डिकंपोज होने के लिए छोड़ दिया जाता है. इस दौरान पक्षी शव के मास को खा लेते हैं. पारसी समुदाय में भी शवों को पक्षियों को खिलाने कि परंपरा है. वो शव को जोरास्ट्रियन में ले जाकर रख देते है. जहां पक्षी उन्हें अपना भोजन मान लेते हैं.

बॉडी फार्म

बॉडी फार्म या ह्यूमन टैपोनॉमी की क्रिया में शव को प्राकृतिक दर से डिकंपोज होने के लिए छोड़ा जाता है. इसे अक्सर फॉरेंसिक साइंटिस्ट इस्तेमाल किया करते हैं. जिससे उन्हें रिसर्च में मदद मिलती है और उन्हें मर्डर केस को समझने के लिए जरूरी जानकारी मिलती है. ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका और नीदरलैंड में 10 ह्यूमन बॉडी फॉर्म हैं.

रीफ बॉल

दरअसल, रीफ समुद्री जीवों के घर को कहते हैं. रीफ बॉल तरीके में शव की राख में सीमेंट मिलाकर एक बॉल तैयार की जाती है, जिसे पानी में डाला जाता है. मरीन लाइफ को बचाने के लिए आर्टिफिशियल रीफ का ये तरीका निकाला गया है. सीमेंट और शव की राख से बनी इस बॉल में कई होल होते हैं, जिनसे मच्छलियां आसानी से आ-जा सकती हैं. बॉल के पानी में जिस जगह डाला जाता है, उसकी जानकारी परिवार वालों को दे दी जाती है.

स्पेस बरियल

स्पेस बरियल विधि में शव के अवशेषों को अंतरिक्ष में भेजा जाता है. आमतौर पर इस विधि में दाह संस्कार के बाद बनी राख को एक कलश में रखकर स्पेस में छोड़ा जाता है. थोड़ी दूरी तक जाने के बाद ये राख ग्रेविटी और हवा की वजह से वापस पृथ्वी पर ही बरस जाती है.

बरियल एट सी

बरियल एट सी विधि में शव का अंतिम संस्कार समुद्र में किया जाता है. इसमें शरीर को ताबूत में रखकर समुद्र में डाल दिया जाता है. इसके लिए मरीन टाइम मैनेजमेंट ऑर्गेनाइजेशन से लाइसेंस लेना होता है. इसके लिए डेथ सर्टिफिकेट और मृतक को संक्रमण से मुक्त दिखाने वाला डॉक्टर का सर्टिफिकेट दिखाना होता है. इसके अलावा मृतक के कपड़े बायोडिग्रेडेबल जैसे- वुल या कॉटन के होने चाहिए.

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