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भारत में विदेशी चंदे का कानून कब बना, अब तक कितनी बार बदला?

FCRA Amendment Bill: भारत में विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम से जुड़े संशोधन को लेकर चर्चा चल रही है. इसी बीच आइए जानते हैं क्या है इसका इतिहास.

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  • FCRA 1976 में विदेशी प्रभाव रोकने हेतु लागू हुआ था।
  • 1984, 2010 में बदलाव, पंजीकरण अवधि पाँच वर्ष हुई।
  • 2020 में सख्त नियम; प्रशासनिक खर्च घटाया, उप-अनुदान रोका।
  • विदेशी चंदा एसबीआई खाते में, पदाधिकारियों के लिए आधार अनिवार्य।

FCRA Amendment Bill: सरकार और विपक्ष दोनों ही संसद के मॉनसून सत्र के आखिरी हफ्ते में एक बड़े टकराव की तैयारी कर रहे हैं. अमित शाह से मिलने के बाद मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने कहा कि विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम से जुड़ा संशोधन बिल बुधवार 12 अगस्त को संसद में पेश किया जा सकता है. इन हालात में यह समझना जरूरी है कि भारत का विदेशी योगदान मूल रूप से कब बना था. आइए जानते हैं कि इसे क्यों लाया गया था और समय के साथ इसके प्रावधानों में क्या बदलाव आए हैं.

FCRA पहली बार 1976 में लागू हुआ था 

पहला विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम 1976 में इंदिरा गांधी सरकार के समय आपातकाल के दौरान लागू हुआ था. उस समय सरकार को चिंता थी कि विदेशी ताकतें भारत की राजनीतिक व्यवस्था, चुनावों और नागरिक समाज को प्रभावित करने के लिए आर्थिक मदद का इस्तेमाल कर सकती हैं.

इसलिए इस कानून को मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा के उपाय के तौर पर बनाया गया था. इसने विदेशी योगदान पाने वाले कई तरह के लोगों और संगठनों पर पाबंदियां लगाईं. इनमें चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार, पत्रकार, संपादक, प्रकाशक, जज, सांसद और सरकारी कर्मचारी शामिल थे. इसका मूल सिद्धांत यह था कि विदेशी पैसे को भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों को प्रभावित करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए. 

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1984 के संशोधन से क्या बदला? 

1984 में FCRA के नियमों को और भी कड़ा किया गया. खासकर विदेशी फंड पाने वाले संगठनों के मामले में. एनजीओ और दूसरे संगठन के लिए विदेशी योगदान पाने से पहले गृह मंत्रालय के पास रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी कर दिया गया. बिना रजिस्ट्रेशन वाले संगठन किसी खास विदेशी योगदान को पाने के लिए सरकार से पहले से मंजूरी ले सकते थे. इसमें एक औपचारिक व्यवस्था बनी जिसके जरिए सरकार विदेशों से पैसा पाने वाले संगठनों पर नजर रख सकती थी.

2010 में नया FCRA क्यों लाया गया? 

एक बड़ा बदलाव 2010 में आया जब मनमोहन सिंह की सरकार ने 1976 के कानून को रद्द कर दिया. इसके बाद उसकी जगह विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 लागू किया गया. नए कानून में कई बड़े बदलाव किए गए. सबसे बड़े बदलावों में से एक यह था कि FCRA रजिस्ट्रेशन, जिसे पहले स्थायी माना जाता था, अब 5 सालों के लिए मान्य हो गया. इस समय के बाद संगठनों को अपना रजिस्ट्रेशन रिन्यू करवाना जरूरी हो गया. 

कानून ने सट्टेबाजी वाले कारोबार और कुछ खास तरह के निवेश के लिए विदेशी चांदी के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी. उस समय संगठन अपने विदेशी चंदे का ज्यादा से ज्यादा 50% हिस्सा ही प्रशासनिक खर्चों पर खर्च कर सकते थे.


भारत में विदेशी चंदे का कानून कब बना, अब तक कितनी बार बदला?

2016 और 2018 में क्या हुआ? 

विदेशी स्रोत की परिभाषा से जुड़े संशोधनों के जरिए और भी बदलाव किए गए. 2016 में फाइनेंस बिल के जरिए परिभाषा बदली गई. बदले हुए नियम के तहत 50% से कम विदेशी हिस्सेदारी वाली कुछ भारतीय कंपनियों को FCRA के मकसद से विदेशी स्रोत नहीं माना गया. 

2018 में इस बदलाव को 1976 से लागू माना गया. इस कदम के बड़े राजनीतिक असर हुए क्योंकि इसने पिछले सालों में राजनीतिक दलों को मिले विदेशी कॉर्पोरेट चंदे की वैधता को प्रभावित किया. साथ ही राजनीतिक दलों से जुड़े चल रहे कानूनी मामलों में भी राहत दी. 

2020 का संशोधन 

बीते कुछ सालों में FCRA को सबसे ज्यादा सख्त 2020 में किया गया. सांसद ने कई ऐसी पाबंदियां लगाई जिनमें एनजीओ के विदेशी चंदा पाने और इस्तेमाल करने के तरीके में काफी बदलाव आया.

सबसे बड़े बदलावों में से एक था प्रशासनिक खर्च की सीमा को 50% से घटाकर 20% करना. इसका मतलब था कि संगठन विदेशी फंड का काफी छोटा हिस्सा ही  सैलरी, ऑफिस का किराया और प्रशासन जैसे खर्चों के लिए इस्तेमाल कर सकते थे. 

संशोधन में विदेशी चंदे को आगे किसी और को देने पर भी रोक लगा दी गई. विदेशी फंड पाने वाले संगठन अब उन फंड को किसी दूसरे संगठन को ट्रांसफर नहीं कर सकते थे. अब इसमें भले ही दूसरे संगठन के पास खुद FCRA रजिस्ट्रेशन हो. 


भारत में विदेशी चंदे का कानून कब बना, अब तक कितनी बार बदला?

एसबीआई अकाउंट का नियम क्यों लाया गया? 

2020 के बदलावों ने विदेशी चंदा पाने की प्रक्रिया को भी सेंट्रलाइज कर दिया. संगठनों के लिए जरूरी हो गया कि वे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की नई दिल्ली मेन ब्रांच में मौजूद खास FCRA अकाउंट के जरिए ही विदेशी फंड प्राप्त करें. 

इसका मकसद भारत में आने वाले विदेशी पैसे की निगरानी के लिए एक ज्यादा सेंट्रलाइज्ड सिस्टम बनाना था. इसके बाद संगठन लागू FCRA नियमों के तहत मंजूर कामों के लिए इन खास अकाउंट्स का इस्तेमाल कर सकते थे. 

एक और अहम प्रावधान पहचान की पुष्टि से जुड़ा था. संगठनों के मुख्य पदाधिकारियों, निर्देशकों और ट्रस्टियों के लिए आधार अनिवार्य कर दिया गया. इसी के साथ विदेशी नागरिक पहचान के लिए अपने पासपोर्ट का इस्तेमाल कर सकते थे.

यह भी पढ़ेंः भारत में कौन विदेशी चंदा ले सकता है, कौन नहीं? जानें नियम

स्पर्श गोयल एबीपी लाइव के साथ कंटेंट राइटर के तौर पर जुड़े हुए हैं. वह जनरल नॉलेज बीट की जिम्मेदारी संभालते हैं. कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में उन्हें चार साल का अनुभव है. एबीपी से पहले वह डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद में करीब दो साल तक काम कर चुके हैं. उन्होंने नमस्कार भारत से अपने करियर की शुरुआत की थी. .

वह अलग-अलग विषयों पर रिसर्च करके पाठकों के लिए जानकारी को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण अंदाज में पेश करते हैं. उन्होंने न्यूज राइटिंग के साथ-साथ स्क्रीनराइटिंग में भी अपनी पकड़ मजबूत की.

उन्होंने मां शाकुम्भरी यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है. इसके साथ उन्होंने एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलिविजन से स्क्रीनप्ले का डिप्लोमा भी हासिल किया है.

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