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इतने सालों से लगातार कैसे ट्रेवल कर रहा वॉयेजर 1, कहां से मिल रही इसे पावर?

Voyager 1: वॉयेजर 1 कई सालों से लगातार अंतरिक्ष में ट्रेवल कर रहा है. आइए जानते हैं कि आखिर इस ऊर्जा कहां से मिल रही है.

Voyager 1: नासा का वॉयेजर 1 स्पेसक्राफ्ट 1977 में लांच होने के बाद से लगभग 5 दशकों से लगातार अंतरिक्ष में यात्रा कर रहा है. पृथ्वी से अरबों किलोमीटर दूर होने के बावजूद यह स्पेसक्राफ्ट वैज्ञानिकों को लगातार जरूरी वैज्ञानिक डेटा भेज रहा है. दिलचस्प बात यह है कि वॉयेजर 1 को आगे बढ़ते रहने के लिए किसी इंजन या फिर पारंपरिक ईंधन की जरूरत नहीं होती. दरअसल इसके अंदर लगे सिस्टम को बिजली एक न्यूक्लियर पावर्ड जनरेटर से मिलती है. आइए जानते हैं कि आखिर वॉयेजर 1 इतने सालों तक कैसे यात्रा करता रहता है और इसे बिजली कहां से मिलती है? 

वॉयेजर 1 को बिजली एक न्यूक्लियर बैटरी से मिलती है 

वॉयेजर 1 बिजली बनाने के लिए रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर का इस्तेमाल करता है. यह काफी हद तक न्यूक्लियर बैटरी की तरह काम करता है और ईंधन के तौर पर प्लूटोनियम 238 का इस्तेमाल करता है. जैसे-जैसे प्लूटोनियम 238 में प्राकृतिक रूप से रेडियोधर्मी क्षय होता है यह गर्मी पैदा करता है. रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर के अंदर लगे थर्मोकपल इस गर्मी को बिजली की ऊर्जा में बदलते हैं. यह बिजली वॉयेजर 1 के वैज्ञानिक उपकरण, कंप्यूटर, हीटर और संचार उपकरणों को चलाती है.

हालांकि आरटीजी से मिलने वाली बिजली धीरे-धीरे कम होती जाती है. प्लूटोनियम 238 की हॉफ लाइफ लगभग 87.7 साल है. इसका मतलब है कि समय के साथ इसकी ऊर्जा पैदा करने की क्षमता कम हो जाती है. 


इतने सालों से लगातार कैसे ट्रेवल कर रहा वॉयेजर 1, कहां से मिल रही इसे पावर?

गैर जरूरी सिस्टम को बंद करना 

क्योंकि वॉयेजर 1 हर साल कम बिजली पैदा कर रहा है इस वजह से नासा को इसकी सीमित बिजली सप्लाई को सावधानी से मैनेज करना पड़ रहा है.  इंजीनियरों ने जरूरी वैज्ञानिक उपकरणों और संचार के लिए पर्याप्त बिजली बचाने के लिए धीरे-धीरे गैर जरूरी सिस्टम और हीटर को बंद कर दिए हैं.

इस रणनीति की वजह से स्पेसक्राफ्ट उम्मीद से कहीं ज्यादा समय तक काम करता रहता है. वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि वॉयेजर 1 में 2030 के दशक तक कम से कम एक वैज्ञानिक उपकरण चलाने के लिए पर्याप्त बिजली बची रहेगी. 

 वॉयेजर 1 बिना इंजन के कैसे चलता है? 

दिलचस्प बात यह है कि वॉयेजर 1 को आगे बढ़ते रहने के लिए अपने आरटीजी की जरूरत नहीं होती. इसकी बिजली का इस्तेमाल स्पेसक्राफ्ट के उपकरण को चलाने के लिए होता है ना कि अंतरिक्ष में आगे बढ़ाने के लिए. 

इसी के साथ अपने मिशन की शुरुआती दौर में वॉयेजर 1 ने अपनी रफ्तार को बढ़ाने और अपना रास्ता बदलने के लिए बड़े ग्रह, खासकर बृहस्पति और शनि के गुरूत्वाकर्षण क्षेत्र का इस्तेमाल किया था. इस तकनीक को ग्रेविटी एसिस्ट या फिर ग्रेविटेशनल स्लिंगशॉट कहा जाता है. यह बूस्ट मिलने के बाद वॉयेजर 1 अंतरिक्ष में आगे बढ़ता रहा क्योंकि इसे धीमा करने के लिए वहां लगभग कोई भी वायुमंडलीय रूकावट या फिर घर्षण नहीं है. 

इंटरस्टेलर स्पेस में वॉयेजर 1

वॉयेजर 1 ने पृथ्वी से 25 अरब किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा की है और अभी इंटरस्टेलर स्पेस से गुजर रहा है. इंटरस्टेलर स्पेस तारों के बीच के इलाके को कहा जाता है. इतनी ज्यादा दूरी की वजह से स्पेसक्राफ्ट से संपर्क करने में काफी ज्यादा समय लगता है. रेडियो सिग्नल प्रकाश की रफ्तार से चलते हैं लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें पृथ्वी से वॉयेजर 1 तक पहुंचने में 23 घंटे से ज्यादा का समय लगता है. 

नवंबर 2026 में वॉयेजर 1 क्या पृथ्वी से लगभग एक लाइट डे की दूरी पर पहुंचने की उम्मीद है. यह लगभग 25.9 अरब किलोमीटर है. उस समय सिग्नल को स्पेसक्राफ्ट तक पहुंचने में लगभग 24 घंटे लगेंगे. इसका मतलब है कि वैज्ञानिकों को जवाब के लिए और 24 घंटे इंतजार करना होगा.


इतने सालों से लगातार कैसे ट्रेवल कर रहा वॉयेजर 1, कहां से मिल रही इसे पावर?

पृथ्वी का संदेश 

वॉयेजर 1 वैज्ञानिक उपकरणों से कहीं ज्यादा प्रतीकात्मक चीज ले जा रहा है. वह है गोल्डन रिकॉर्ड. यह 12 इंच की सोने की परत चढ़ी तांबे की डिस्क है. इसे भविष्य में कभी भी स्पेसक्राफ्ट से मिलने वाली किसी भी बाहरी सभ्यता तक पृथ्वी के बारे में जानकारी पहुंचाने के लिए बनाया गया है. इस रिकॉर्ड में 115 तस्वीर, पक्षियों और व्हेल जैसी प्राकृतिक आवाज और मोजार्ट और बाख जैसे संगीतकारों का संगीत शामिल है. इसमें 55 भाषाओं में अभिवादन भी शामिल है. गोल्डन रिकॉर्ड का भारत से भी संबंध है. इसमें हिंदी, बंगाली, गुजराती, मराठी, कन्नड़ और उर्दू जैसी भाषाओं में अभिवादन शामिल हैं.

यह भी पढ़ेंः मुस्लिम नाटो में सबसे ज्यादा ताकतवर कौन, उसके पास कितनी ताकत?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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