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एवरेस्ट नहीं…यह प्वाइंट है अंतरिक्ष के सबसे करीब, कम ऑक्सीजन में भी कैसी है यहां के लोगों की जीवनशैली?

अगर हम आपको कहें कि दुनिया का सबसे ऊंचा प्वाइंट एवरेस्ट नहीं है तो आप सोचेंगे कि फिर क्या है? दरअसल दुनिया का सबसे ऊंचा प्वाइंट इक्वाडोर का माउंट चिम्बोराजो है. चलिए इसके बारे में विस्तार से समझें.

जब भी दुनिया के सबसे ऊंचे प्वाइंट की बात होती है तो लोगों को दिमाग में माउंट एवरेस्ट का नाम आता है. मगर विज्ञान और भूगोल के नियमों के अनुसार धरती का जो हिस्सा अंतरिक्ष और सूरज के सबसे नजदीक है, वह दक्षिण अमेरिका के इक्वाडोर में स्थित माउंट चिम्बोराजो है. पृथ्वी का आकार पूरी तरह से गोल न होकर भूमध्य रेखा के पास थोड़ा उभरा हुआ है, इसी भौगोलिक उभार के कारण चिम्बोराजो की चोटी ब्रह्मांड के सबसे करीब पहुंच जाती है. बेहद कम ऑक्सीजन और जमा देने वाली ठंड के बाद भी इस दुर्गम पहाड़ पर इंसानों की एक पूरी दुनिया सदियों से फल-फूल रही है.

एवरेस्ट से अलग कैसा है चिम्बोराजो का भूगोल?

माउंट चिम्बोराजो की चोटी समुद्र तल से 6268 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां पर सिर्फ विशालकाय और खतरनाक ग्लेशियर का कब्जा है. लेकिन इस बर्फीले साम्राज्य के ठीक नीचे, लगभग 3500 से 4200 मीटर ऊंचाई पर घास के मैदान मौजूद हैं. इसी सर्द और दुर्गम इलाके में छोटे-छोटे गांवों की शक्ल में एक पूरी आबादी बसती है. यहां मुख्य रूप से क्वेशुआ और पुरुहा आदिवासी समुदायों के कुछ हजार लोग रहते हैं. इन लोगों के पूर्वजों ने सदियों पहले इस कठोर और चुनौतीपूर्ण पहाड़ को अपना आशियाना बनाया था और आज भी वे अपनी प्राचीन परंपराओं के साथ वहां मजबूती से टिके हुए हैं.

कम ऑक्सीजन में कैसे रहते हैं लोग?

इतनी अत्यधिक ऊंचाई पर सामान्य इंसानों के लिए सांस लेना भी दूभर हो जाता है, क्योंकि हवा में ऑक्सीजन का स्तर बहुत घट जाता है. अचानक वहां जाने पर किसी भी आम शख्स को सिरदर्द और चक्कर आने की गंभीर समस्या हो सकती है. मगर चिम्बोराजो के इन गांवों में रहने वाले लोगों की शारीरिक बनावट प्रकृति का एक अद्भुद करिश्मा है. पीढ़ियों से इस ऊंचे और कठिन माहौल में रहने की वजह से इनका शरीर कम ऑक्सीजन में भी सामान्य रूप से काम करने के लिए अनुकूल हो चुका है. इन लोगों के फेफड़े और रक्त कोशिकाएं आम इंसानों की तुलना में अधिक मजबूत और क्षमतावान होती हैं.

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किस तरीके के घर में रहते हैं चिम्बोराजो के लोग?

पहाड़ की इन ढलानों पर रातें बेहद सर्द होती हैं और पारा तो अक्सर शून्य के कई डिग्री नीचे चला जाता है. इस बर्फीली ठंड और तेज हवा से बचने के लिए यहां के लोग चोजा नाम का पारंपरिक घर बनाते हैं. इन घरों की दीवारें मिट्टी की मोटी परतों से तैयार की जाती हैं और छतों पर सूखी घास का बहुत मोटा आवरण बिछाया जाता है. ये घर दिन के वक्त सूरज की धूप और गर्मी को अपने अंदर सोख लेते हैं, जिससे रात के समय घर के अंदर का तापमान काफी गर्म और आरामदायक बना रहता है. इस तरह की अनूठी निर्माण शैली उनको जीवित रखती है.

कैसे करते हैं हाड़ कंपा देने वाली ठंड का मुकाबला?

ठंड से मुकाबला करने के लिए इन लोगों का खान-पान और पहनावा भी बेहद खास होता है. यहां के लोग अपने शरीर को अंदर से गर्म रखने के लिए स्थानीय जड़ी-बूटियों से बनी चाय, आलू, चीज और एवोकाडो से तैयार सूप का नियमित सेवन करते हैं. इसके अलावा मांस भी उनके दैनिक जीवन का मुख्य हिस्सा होता है. खेती की गुंजाइश कम होने की वजह से इनका पूरा जीवन पशुपालन पर टिका हुआ है. यह इलाका लामा, अल्पाका और विकुना जैसे ऊन देने वाले जानवरों का गढ़ है, जिनकी कीमती ऊन से इनके पारंपरिक मोटे कपड़े तैयार किए जाते हैं, जो सर्दियों से सुरक्षा देते हैं.

चटक रंग के पारंपरिक परिधान और लामा

चिम्बोराजो के पुरुषों के पारंपरिक पहनावे को पोंचो कहा जाता है, जो कि एक तरह का मोटा ऊनी लबादा होता है. वहीं महिलाएं लंबी ऊनी स्कर्ट और शॉल का इस्तेमाल करती हैं. इस भूरे और सफेद बर्फीले परिदृश्य के बीच इन आदिवासियों के कपड़ों के चटक लाल, नीले और हरे रंग प्रकृति के कैनवास पर बेहद खूबसूरत लगते हैं. खड़ी पहाड़ी ढलानों और पथरीले रास्तों पर भारी सामान ढोने के लिए लामा नाम का जानवर इनका भरोसेमंद साथी बनता है. पशुओं के ऊन और उनकी मदद से ही इन लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी बिना किसी आधुनिक साधन के चलती है.

ग्लोबल वॉर्मिंग से बदल रही दुनिया की सबसे ऊंची छत

वक्त के साथ अब दुनिया की इस सबसे ऊंची छत पर भी आधुनिकता और बदलाव के साफ निशान दिखाई दे रहे हैं. ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से चिम्बोराजो के एतिहासिक ग्लेशियर तेजी से पिछल रहे हैं, जिससे भविष्य में इन पहाड़ी बस्तियों के सामने पानी का भयंकर संकट खड़ा हो सकता है. इसी बदलाव की वजह से कई युवा अब बेहतर अवसरों की तलाश में दूसरे शहरों का रुख कर रहे हैं. वहीं पहाड़ पर बचे हुए अन्य लोगों ने कम्युनिटी टूरिज्म को अपना लिया है. वे यहां आने वाले विदेशी ट्रैकर्स के लिए गाइड का काम करते हैं और हस्तशिल्प बेचकर गुजारा करते हैं.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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