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मैं इस वतन को अपना कैसे कहूं, हमारी हैसियत कुत्ते-बिल्ली...अंबेडकर ने किससे कही थी ये बात, इतिहास में दर्ज है किस्सा 

डॉ. अंबेडकर से जुड़ा यह किस्सा तब का है, जब महात्मा गांधी से उनकी पहली मुलाकात हुई थी. अगस्त, 1931 में बंबई में दोनों पहली बार मिले थे. खुद गांधी ने पत्र लिखकर बाबा साहेब से मिलने का आग्रह किया था.

Bhimrao Ambedkar Jayanti 2025: भारत के संविधान निर्माता और देश के पहले कानून मंत्री डॉ. भीमराव अंबेडकर का आज 135वां जन्मदिन है. दलितों और शोषितों को उनका अधिकार दिलाने वाले बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर की जयंती आज पूरा देश मना रहा है. ऐसे में हम आपको बाबा साहेब से जुड़ा वह किस्सा सुनाने जा रहा है, जब अंबेडकर ने इस वतन को ही अपना मानने से इनकार कर दिया था. उन्होंने कहा था कि यहां हमारी हैसियत कुत्ते-बिल्लियों से ज्यादा नहीं है, तो ऐसे में इस वतन को मैं अपना कैसे कहूं? 

डॉ. अंबेडकर से जुड़ा यह किस्सा तब का है, जब महात्मा गांधी से उनकी पहली मुलाकात हुई थी. दोनों की पहली मुलाकात अगस्त, 1931 में बंबई में हुई थी. खुद गांधी ने पत्र लिखकर बाबा साहेब अंबेडकर से मिलने का आग्रह किया था. कहा जाता है कि महात्मा गांधी और अंबेडकर के बीच यह मुलाकात बहुत अच्छी नहीं थी और इस दौरान अंबडेकर काफी नाराज दिखे थे. 

गांधी से क्यों गुस्सा हो गए थे अंबेडकर?

इतिहासकारों का कहना है कि पहली मुलाकात के दौरान महात्मा गांधी ने अंबेडकर की प्रशंसा की थी. गांधी ने अंबेडकर से कहा कि उन्होंने सामाजिक सुधार के लिए बहुत कुछ किया है. साथ ही उन्होंने समाज से भेदभाव मिटाने के लिए कांग्रेस के प्रयासों का भी उल्लेख किया.  हालांकि, अंबेडकर ने इसका जवाब काफी बेरुखी से दिया. उन्होंने कहा, सभी बूढ़े-बुजुर्ग बीते जमाने की बातों पर अधिक बल देते हैं और आप भी पुराने विचारों से चिपके हुए हैं. उन्होंने गांधी के सामने कांग्रेस पर अछूतों के प्रति उसकी सहानुभूति को औपचारिकता भर होने का आरोप लगाया और अछूतों के नाम पर आवंटित होने वाली निधियों के भी दुरुपयोग का आरोप कांग्रेस पर लगाया. इतिहासकारों का कहना है कि अंबेडकर ने यह सब बातें महात्मा गांधी के सामने कहीं. 

हमारा कोई वतन नहीं...

इस मुलाकात के दौरान अंबेडकर देश की नीतियों से इतना नाराज दिखे कि उन्होंने इस वतन को भी अपना मानने से इनकार कर दिया. इतिहासकारों का कहना है कि अंबेडकर ने गांधी से बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा था, गांधी जी, हमारा कोई वतन नहीं है. इस पर गांधी ने कहा, मैं जानता हूं कि आप कृत्रिमता से दूर एक सच्चे इंसान हैं. इस पर अंबेडकर ने फिर जवाब दिया कि मैं इस वतन को अपना कैसे कहूं और इस धर्म को अपना धर्म कैसे कह दूं. उन्होंने आगे कहा था कि वह वतन जहां हम लोगों की हैसियत कुत्ते-बिल्लियों से अधिक नहीं, हमें पीने को पानी भी मयस्सर नहीं है, उस वतन को मैं अपना वतन कैसे कह दूं. 

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प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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