Green Cracker Guidelines: नॉर्मल पटाखों से कितने अलग होते हैं ग्रीन पटाखे, क्या इनमें धुआं नहीं होता?
Green Cracker Guidelines: ग्रीन पटाखे सीएसआईआर-नीरी द्वारा विकसित ईको-फ्रेंडली पटाखे हैं. इनके लिए सुप्रीम कोर्ट ने कड़े नियम तय किए हैं. आइए जानें कि क्या इनसे बिल्कुल धुआं नहीं निकलता है.

Green Cracker Guidelines: दिवाली के मौसम में आतिशबाजी का उत्साह और वायु प्रदूषण की चिंता हमेशा एक साथ सामने आती है. बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में 7 और 8 नवंबर 2026 को ग्रीन पटाखे जलाने की सशर्त मंजूरी दी है, जिसके लिए सुबह 6 से 7 बजे और रात को 8 से 10 बजे तक की समय सीमा तय की गई है. इस बीच बहुत से लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर ग्रीन पटाखे सामान्य आतिशबाजी से कितने अलग हैं, क्या इनसे बिल्कुल भी धुआं नहीं निकलता और इनका हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर कैसा असर पड़ता है.
क्या हैं ग्रीन पटाखे और इन्हें किसने बनाया है?
ग्रीन पटाखे असल में पर्यावरण के अनुकूल तैयार किए गए ऐसे खास पटाखे हैं, जिन्हें वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद की राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान यानी CSIR-NEERI द्वारा विशेष शोध के बाद तैयार किया गया है. पारंपरिक आतिशबाजी के मुकाबले इनकी बनावट और निर्माण तकनीक में बड़ा बदलाव किया गया है. इनमें इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की मात्रा बहुत कम होती है, इनका शेल साइज छोटा रखा जाता है और इनमें राख रहित पदार्थों का उपयोग किया जाता है. इसके अतिरिक्त, इनमें ऐसे विशेष तत्व मिलाए जाते हैं जो जलने के दौरान निकलने वाली धूल और कणों को हवा में उड़ने से रोकते हैं.
सामान्य पटाखों से ये कितने अलग?
पारंपरिक या सामान्य पटाखों को रंग-बिरंगी रोशनी और तेज आवाज देने के लिए उनमें कई तरह के विषैले और भारी रसायनों का मिश्रण किया जाता है. इनमें मुख्य रूप से सल्फर, ऑक्सीडाइजर, स्टेबलाइजर और रिड्यूसिंग एजेंट शामिल होते हैं. पटाखों को अलग-अलग रंग देने के लिए एंटीमोनी सल्फाइड, बेरियम नाइट्रेट, लिथियम, तांबा, एल्युमिनियम, सीसा और स्ट्रांशियम जैसे भारी धातुओं के यौगिक मिलाए जाते हैं. जब ये सामान्य पटाखे जलते हैं, तो इनसे हवा में अत्यधिक जहरीली गैसें और हानिकारक तत्व घुल जाते हैं, जो वायुमंडल को गंभीर रूप से प्रदूषित कर देते हैं.
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ग्रीन पटाखों की अनोखी तकनीक और कम खतरनाक उत्सर्जन
दूसरी तरफ, ग्रीन पटाखों के निर्माण में सीसा, बेरियम और एल्युमिनियम जैसी विषैली धातुओं के खतरनाक यौगिकों का प्रयोग बिल्कुल नहीं किया जाता या बेहद कम किया जाता है. इनकी जगह इनमें जियोलाइट और आयरन ऑक्साइड जैसे मल्टी-फंक्शनल पदार्थों को मिलाया जाता है. ये विशेष रासायनिक तत्व जलने के दौरान हानिकारक गैसों जैसे सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को नियंत्रित करते हैं. इस तकनीक के कारण ग्रीन पटाखे जलने पर सामान्य पटाखों की तुलना में बहुत कम धुआं और बेहद कम नुकसानदेह गैसे उत्सर्जित करते हैं.
क्या ग्रीन पटाखे पूरी तरह से प्रदूषण-मुक्त हैं?
अक्सर लोगों के मन में यह गलतफहमी रहती है कि ग्रीन पटाखों से बिल्कुल भी प्रदूषण या धुआं नहीं निकलता, जबकि ऐसा नहीं है. वैज्ञानिक संस्था CSIR-NEERI के आंकड़ों के अनुसार, ग्रीन पटाखे पूरी तरह प्रदूषण-रहित नहीं होते हैं, बल्कि ये सामान्य आतिशबाजी के मुकाबले लगभग 30 प्रतिशत तक कम वायु प्रदूषण फैलाते हैं. यानी इनके जलने से भी हवा में धुआं और हानिकारक तत्व तो निकलते ही हैं, लेकिन उनकी मात्रा और तीव्रता सामान्य पटाखों की तुलना में काफी कम होती है, जिससे पर्यावरण पर पड़ने वाला बुरा प्रभाव कुछ हद तक घट जाता है.
पार्टिकुलेट मैटर (PM) और सांस पर इसका प्रभाव
पटाखों के जलने से उत्पन्न होने वाला मुख्य प्रदूषण पार्टिकुलेट मैटर यानी हवा में तैरने वाले अति सूक्ष्म कणों के रूप में होता है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन धूलकणों को उनके आकार के आधार पर चार मुख्य श्रेणियों- PM10, PM2.5, PM1 और अल्ट्रा-फाइन पार्टिकुलेट मैटर में विभाजित किया जाता है. कण का आकार जितना ज्यादा छोटा होता है, वह इंसान के श्वसन तंत्र के रास्ते फेफड़ों और रक्तप्रवाह में उतनी ही गहराई तक प्रवेश कर जाता है. यही सूक्ष्म कण सांस की बीमारियों, अस्थमा और कई अन्य गंभीर शारीरिक समस्याओं का मुख्य कारण बनते हैं.

सर्दियों का मौसम, कोहरा और AQI का बिगड़ता स्तर
त्योहारों का समय अक्सर सर्दियों की शुरुआत के साथ आता है, जब वातावरण में प्राकृतिक रूप से नमी और कोहरा मौजूद रहता है. जब पटाखों से निकलने वाला धुआं इस ठंडी हवा और कोहरे के साथ मिलता है, तो वह धुंध यानी स्मॉग का रूप ले लेता है. इस कारण पटाखों का जहरीला धुआं हवा में ऊपर उठने के बजाय जमीन के करीब लंबे समय तक स्थिर बना रहता है. दिल्ली-एनसीआर जैसे बड़े महानगरों में, जहां AQI पहले से ही चिंताजनक स्तर पर रहता है, यह स्थिति फेफड़ों और दिल के मरीजों के लिए बेहद जानलेवा साबित होती है.
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