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Cockroach Janta Party: कॉकरोच जनता पार्टी को क्यों नहीं मिलेगा 'Cockroach' चुनाव चिह्न, जान लें चुनाव आयोग का नियम?

Cockroach Janta Party: सोशल मीडिया पर वायरल हो रही 'कॉकरोच जनता पार्टी' को चुनाव मैदान में उतरने के लिए कड़े कानूनी नियमों से गुजरना होगा. आइए जानें कि इसे क्यों कॉकरोच का सिंबल नहीं मिल पाएगा.

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  • कॉकरोच जनता पार्टी ने सोशल मीडिया पर बनाई धूम, बीजेपी को पीछे छोड़ा.
  • चुनाव लड़ने हेतु पार्टी को चुनाव आयोग में कराना होगा पंजीकरण.
  • जीव-जंतुओं को चुनाव चिन्ह न देने का आयोग का कड़ा नियम.
  • पार्टी को मोबाइल फोन चिन्ह मिलने की संभावना भी कम.

Cockroach Janta Party: डिजिटल दौर में सोशल मीडिया पर कब क्या वायरल हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है. सिर्फ पांच दिन पहले इंटरनेट पर बनी एक अनोखी राजनीतिक पार्टी इन दिनों हर तरफ सुर्खियां बटोर रही है. इंस्टाग्राम पर दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी को पछाड़ने वाली इस वर्चुअल पार्टी ने राजनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है. हालांकि, इंटरनेट की लोकप्रियता और असल चुनाव के मैदान में जमीन-आसमान का अंतर होता है. अगर यह पार्टी भविष्य में देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहे, तो इसे चुनाव आयोग के बेहद कड़े और पेचीदा नियमों का सामना करना पड़ेगा और इनको कॉकरोच का चुनाव चिन्ह न मिलने की वजह भी बताते हैं.

इंटरनेट पर छाई नई नवेली पार्टी

अभिजीत दिपके नाम के एक व्यक्ति ने अमेरिका के बोस्टन शहर में बैठकर सोशल मीडिया पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) की शुरुआत की है. अपने खास सरकार-विरोधी और बेहद मजाकिया अंदाज के कारण यह पार्टी इंटरनेट पर आग की तरह फैल गई. आलम यह है कि इंस्टाग्राम पर इसने भारतीय जनता पार्टी तक को पीछे छोड़ दिया है. यहां तक कि तृणमूल कांग्रेस के दो सांसदों ने भी सोशल मीडिया के स्तर पर इसमें अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है. हालांकि, इस भारी लोकप्रियता के बीच भारत में इसके आधिकारिक 'एक्स' अकाउंट पर रोक लगा दी गई थी, लेकिन इन्होंने फिर से अपना नया हैंडल बना लिया.

चुनाव आयोग का पहला पड़ाव और रजिस्ट्रेशन का नियम

अगर यह पार्टी केवल सोशल मीडिया से बाहर निकलकर सचमुच देश के किसी कोने से चुनाव लड़ना चाहती है, तो इसके लिए एक लंबी कानूनी प्रक्रिया है. भारत में किसी भी नए दल को चुनाव लड़ने से पहले भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के पास खुद को पंजीकृत कराना अनिवार्य होता है. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत राजनीतिक दल के रूप में रजिस्ट्रेशन की यह कानूनी प्रक्रिया पूरी होती है. इस अनिवार्य पंजीकरण के बिना कोई भी संगठन चुनाव आयोग से अपने लिए किसी भी तरह के अधिकार या चुनाव चिह्न का दावा नहीं कर सकता है.

यह भी पढ़ें: Cockroach Is Back: 200 दिन की जिंदगी में 400 बच्चे पैदा करता है एक कॉकरोच, जानें क्यों कहलाता है 'अमर जीव'?

सुरक्षित और फ्री चुनाव चिह्नों के बीच का बड़ा अंतर

भारत में चुनाव चिह्न बांटने का पूरा जिम्मा सिर्फ और सिर्फ चुनाव आयोग के पास होता है. देश में सिंबल मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बंटे होते हैं, जिसमें पहला 'आरक्षित प्रतीक' है जो मान्यता प्राप्त बड़ी पार्टियों के पास सुरक्षित रहता है, जैसे कमल या झाड़ू. दूसरी श्रेणी 'मुफ्त प्रतीक' यानी फ्री सिंबल्स की होती है, जो नई पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों को मिलते हैं. इस फ्री लिस्ट में ताला-चाबी, एयर कंडीशनर, लैपटॉप, शतरंज बोर्ड, सीसीटीवी कैमरा और नेल कटर जैसी सौ से अधिक रोजमर्रा की चीजों को शामिल किया गया है. 

क्यों नहीं मिलेगा कॉकरोच चुनाव चिन्ह?

रजिस्टर्ड होने के बाद कोई भी दल अपनी पसंद के तीन नए प्रतीकों का सुझाव चुनाव आयोग के सामने रख सकता है. मगर, वर्ष 1968 के चुनाव चिह्न आदेश के तहत एक बेहद स्पष्ट और कड़ा नियम लागू है कि कोई भी नया सिंबल किसी पक्षी या जीव-जंतु जैसा नहीं होना चाहिए. चूंकि कॉकरोच एक जीव है, इसलिए यह नियम इस पार्टी के मंसूबों पर पानी फेर सकता है. अब यह पूरी तरह चुनाव आयोग के विवेक पर निर्भर करेगा कि वह तिलचट्टे को जीव की श्रेणी में रखकर इसका आवेदन खारिज करता है या नहीं. 

किसलिए बना था यह सख्त नियम?

जीव-जंतुओं को चुनाव चिह्न न बनाने का यह कड़ा नियम देश में साल 1991 से पूरी तरह लागू है. उस दौर में पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने आयोग से शिकायत की थी कि राजनीतिक दल चुनाव प्रचार के दौरान असली जानवरों को सड़कों पर घुमाते हैं, जिससे उन पर गंभीर अत्याचार होता है. इसके बाद साल 2012 में चुनाव आयोग ने कड़े निर्देश जारी कर प्रचार में पशुओं के इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी थी. यही कारण है कि नए जानवरों वाले सिंबल देना बंद कर दिया गया, हालांकि हाथी और शेर जैसे पुराने प्रतीक पहले से आवंटित होने के कारण चलते आ रहे हैं.

मोबाइल फोन की मांग पर भी लग सकता है बड़ा झटका

इस इंटरनेट पार्टी ने डिजिटल माध्यम को देखते हुए अपने लिए मोबाइल फोन के चुनाव चिह्न की इच्छा जताई है. लेकिन, जमीनी हकीकत यह है कि चुनाव आयोग की मुफ्त प्रतीकों वाली आधिकारिक सूची में मोबाइल फोन का विकल्प दूर-दूर तक मौजूद ही नहीं है. इस सरकारी सूची के भीतर लैंडलाइन फोन और मोबाइल चार्जर जैसी चीजें तो शामिल की गई हैं, मगर मुख्य मोबाइल फोन का नाम इसमें कहीं दर्ज नहीं है. ऐसे में कॉकरोच जनता पार्टी के लिए सोशल मीडिया पर चमकना जितना आसान था, चुनाव की असल दुनिया में अपनी पसंद का सिंबल पाना उतना ही मुश्किल है.

यह भी पढ़ें: Cockroach Survival: डायनासोर मर गए, लेकिन आज भी जिंदा हैं कॉकरोच! जानें कितना जिद्दी होता है यह जीव?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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