Delhi Jantar Mantar protest: छात्रों पर पर 'पैलेट गन' का इस्तेमाल! जानें क्या है इसको लेकर नियम, कब और कहां हो सकता है इस्तेमाल?
Delhi Jantar Mantar protest: दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप है, जबकि पुलिस ने इसे नकार दिया है. चलिए जानें कि पैलेट गन चलाने के क्या नियम हैं.

- जम्मू-कश्मीर में इसका व्यापक, विवादास्पद उपयोग पहले हो चुका।
Delhi Jantar Mantar protest: नीट पेपर लीक के मामले को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का मांग को लेकर दिल्ली में सीजेपी और पुलिस में जोरदार झड़प देखने को मिली. इसके कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं. इस झड़प के दौरान प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप लगाया है. हालांकि दिल्ली पुलिस प्रशासन ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि स्थिति को संभालने के लिए किसी भी घातक हथियार का इस्तेमाल नहीं किया गया है. इस विवाद के सामने आने के बाद एक बार फिर से पैलेट गन से इस्तेमाल करने के नियम को लेकर बहस तेज हो गई है. आइए इस बारे में विस्तार से समझ लेते हैं.
क्या होती है पैलेट गन और यह कैसे करती है काम?
पैलेट एक विशेष प्रकार की पंप-एक्शन गन होती है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से अनियंत्रित भीड़ को रोकने के लिए किया जाता है. इसके कारतूसों की श्रेणी 5 से 12 नंबर तक होती है. इसमें से 5 नंबर के कारतूस को सबसे ज्यादा असरदार और खतरनाक माना जाता है. इस बंदूक के एक ही कारतूस के अंदर लोहे के लगभग 500 छोटे-छोटे छर्रे भरे होते हैं. जब भी इसे फायर किया जाता है तो कारतूस हवा में छूटते ही फट जाता है और उसके अंदर मौजूद सैकड़ों छर्रे बेहद तेज रफ्तार से अलग-अलग दिशाओं में फैल जाते हैं.
छर्रों से आम लोगों को कितना खतरा?
पैलेट गन का सबसे घातक पहलू इसका अनियंत्रित बिखराव है. निशाना साधकर फायर करने के बाद भी इसके छर्रे एक निश्चित दिशा की बजाय चारों ओर फैल जाते हैं. इस कारण न केवल प्रदर्शन में शामिल उग्र लोग बल्कि आसपास से गुजर रहे निर्दोष नागरिक या फिर दूर खड़े लोग भी इसकी चपेट में आ जाते हैं. मूल रूप से इस तरीके के हथियारों का इस्तेमाल जंगल में शिकार के लिए किया जाता था, क्योंकि छर्रों के फैलने से भागते हुए जानवरों पर निशाना लगाना आसान हो जाता था, लेकिन इंसानी भीड़ पर इसका असर जानलेवा साबित होता है.
पैलेट गन चलाने को लेकर बेहद सख्त हैं दिशा-निर्देश
भारत में भीड़ पर पैलेट गन चलाने को लेकर गृह मंत्रालय द्वारा बेहद सख्त और स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए गए हैं. साल 2017 में लोकसभा के दौरान तत्कालीन गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने एक सवाल के लिखित जवाब में इसके इस्तेमाल की पूरी प्रक्रिया समझाई थी. उन्होंने बताया था सुरक्षा बल अपनी मर्जी से किसी भी स्थिति में सीधे पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं. इसके इस्तेमाल से पहले कई तरह के वैधानिक चरणों और सुरक्षा मानकों का पालन करना बेहद अनिवार्य होता है, ताकि जान-माल का नुकसान न हो.
भीड़ तो तितर-बितर करने के अन्य विकल्पों की खोज
पैलेट गन के घातक इस्तेमाल को देखते हुए भारत सरकार ने 26 जुलाई 2016 को एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया था. इस कमेटी का मुख्य उद्देश्य भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ऐसे गैर घातक विकल्पों की पहचान करना था, जिससे लोगों को गंभीर चोट न पहुंचे. समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने यह तय किया कि किसी भी हिंसक स्थिति में सुरक्षा बल सीधे इस हथियार का सहारा नहीं लेंगे, बल्कि पहले अन्य कम नुकसान पहुंचाने वाले साधनों का इस्तेमाल करके भीड़ तो इधर-उधर करने का प्रयास किया जाएगा.
पैलेट गन के अलावा भीड़ हटाने के सरकारी नियम
सरकार के नियमों की मानें तो किसी भी उग्र प्रदर्शन या फिर दंगे जैसी स्थिति में सबसे पहले पावा-चिली यानी मिर्च वाले गोले और ग्रेनेड, स्टन-लैक यानी ध्वनि और रोशनी पैदा करने वाले गोले और मानक आंसू गैस के गोले का उपयोग किया जाना चाहिए. इन सभी साधन को भीड़ को बिना किसी स्थाई नुकसान पहुंचाए पीछे हटने के लिए मजबूर करते हैं. जब तक ये शुरुआती उपाय पूरी तरह से नाकाम न हो जाएं, तब तक सुरक्षा बलों को किसी भी स्थिति में पैलेट गन का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाती है.
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कब और क्यों किया जाता है पैलेट गन का इस्तेमाल?
कानून के मुताबिक पैलेट गन का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ तभी संभव है, जब स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर हो जाए और बाकी सभी शुरुआती उपाय जैसे मिर्च के गोले या आंसू गैस के गोले पूरी तरह से बेअसर साबित हों. जब सुरक्षा बलों या आम नागरिकों की जान पर सीधा खतरा मंडराने लगे तभी बहुत विशेष परिस्थितियों में बेहद सावधानी के साथ अंतिम विकल्प के तौर पर पैलेट गन चलाने की अनुमति दी जाती है. इसका मुख्य उद्देश्य भीड़ को पीछे की तरफ धकेलना होता है, न की गंभीर रूप से घायल करना.
पहले कब-कब इस्तेमाल की गई पैलेट गन?
भारत के विभिन्न हिस्सों में पहले पैलेट गन का इस्तेमाल हो चुका है, जो कि विवादों का कारण भी बना. साल 2024 में किसान आंदोलन के दौरान पंजाब-हरियाणा के खनौरी बॉर्डर और शंभू बॉर्डर पर किसानों ने पुलिस पर इसके इस्तेमाल का आरोप लगाया था. हालांकि उस वक्त भी पुलिस प्रशासन ने इन दावों को खारिज कर दिया था, लेकिन कई प्रदर्शनकारियों को छर्रे लगने की खबरें आई थीं. इसी तरह से 2023 में जातीय हिंसा से जूझ रहे मणिपुर में भी इसका इस्तेमाल देखा गया था.
जम्मू कश्मीर में इसका इस्तेमाल और शुरुआत
भारत में पैलेट गन का सबसे व्यापक और विवादित इस्तेमाल 2016 में जम्मू-कश्मीर में अशांति के दौरान देखने को मिला था. उस वक्त सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए छर्रों के कारण सैकड़ों युवा और बच्चों की आंखों की रोशनी आंशिक या पूरी तरह से चली गई थी. इस घाटी में पैलेट गन का इस्तेमाल सबसे पहले 2010 में शुरू किया गया था. इस कार्रवाई से हुए भारी नुकसान और मानवाधिकारों के मुद्दे के बाद ही केंद्र सरकार को इसके सुरक्षित विकल्पों पर गंभीतरा से विचार करना पड़ा था.
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