कौन थे बरकतुल्ला खान भोपाली? जानिए किन बड़े कामों के लिए किया जाता है उन्हें याद
भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलकर अब 'मां वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय' करने का प्रस्ताव पास हुआ है. 1988 से यह यूनिवर्सिटी स्वतंत्रता सेनानी मौलाना बरकतउल्ला भोपाली के नाम पर थी.

- भोपाल विश्वविद्यालय का नाम 'मां वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय' होगा.
- राजा भोज के सम्मान में; बरकतउल्ला विदेशों में क्रांतिकारी थे.
- गदर पार्टी के सदस्य, 1915 में बने पहले प्रधानमंत्री.
- लेनिन से मिले, वैश्विक मंचों पर भारत का पक्ष रखा.
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से एक बेहद बड़ा और चौंकाने वाला फैसला सामने आया है, जिसने सूबे की सियासत और इतिहास प्रेमियों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है. शहर के सबसे प्रतिष्ठित बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने की पूरी तैयारी हो चुकी है. यूनिवर्सिटी की कार्यपरिषद ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर इस ऐतिहासिक संस्थान का नाम 'मां वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय' रखने का फैसला किया है. यह कदम जहां राजा भोज की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने के दावों के साथ उठाया गया है, वहीं इसने देश के महान क्रांतिकारी मौलाना बरकतउल्ला भोपाली के योगदानों को भी अचानक चर्चा के केंद्र में ला दिया है. आइए जानें कि ये कौन थे और उनको किन कामों के लिए याद किया जाता है.
नाम बदलने के पीछे की मुख्य वजह क्या है?
यूनिवर्सिटी प्रशासन का तर्क है कि यह बदलाव भारतीय ज्ञान परंपरा और भोपाल के वास्तविक इतिहास को सम्मान देने के लिए किया गया है. ज्ञान की देवी सरस्वती के स्वरूप 'वाग्देवी' और भोपाल शहर की नींव रखने वाले राजा भोज के नाम पर अब इस संस्थान को जाना जाएगा. कार्यपरिषद का कहना है कि मौलाना बरकतउल्ला भोपाली का अधिकांश जीवन विदेशों में बीता था, जबकि राजा भोज ने इस पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक और शैक्षिक पहचान को संवारा था. इस बदलाव का आधिकारिक प्रस्ताव अब राज्य के उच्च शिक्षा विभाग और राजभवन की अंतिम मंजूरी के लिए भेज दिया गया है.
कौन थे क्रांतिकारी बरकतउल्ला भोपाली?
इस ऐतिहासिक बदलाव के बीच यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर मौलाना बरकतउल्ला भोपाली कौन थे, जिनके नाम पर साल 1988 से यह यूनिवर्सिटी चल रही थी. मौलाना अब्दुल हाफिज मोहम्मद बरकतउल्ला भोपाली का जन्म साल 1854 में भोपाल की सरजमीं पर हुआ था. उन्होंने बचपन में पारंपरिक मजहबी तालीम हासिल करने के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा पर भी मजबूत पकड़ बनाई. अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों को देखकर उनका मन बगावत पर उतर आया और वे बहुत कम उम्र में ही ब्रिटिश विरोधी क्रांतिकारी गतिविधियों का एक सक्रिय हिस्सा बन गए.
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सात समंदर पार गदर पार्टी से जुड़ाव
मौलाना बरकतउल्ला देश के उन गिने-चुने स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल थे जिन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई घरेलू सरजमीं से दूर विदेशों में रहकर लड़ी. वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ माहौल बनाने वाली प्रसिद्ध 'गदर पार्टी' के बेहद प्रमुख और सक्रिय सदस्य थे. उन्होंने जापान, अमेरिका, जर्मनी और अफगानिस्तान जैसे शक्तिशाली देशों का दौरा किया. इन तमाम देशों में रहकर उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की क्रूरता को बेनकाब किया और भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के अधिकार के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का पुरजोर समर्थन हासिल करने में बड़ी भूमिका निभाई.
अफगानिस्तान में पहली निर्वासित सरकार का गठन
बरकतउल्ला भोपाली के जीवन का सबसे ऐतिहासिक और स्वर्णिम अध्याय साल 1915 में लिखा गया. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान दिसंबर 1915 में अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भारत की पहली अस्थायी और निर्वासित सरकार का गठन किया गया था. इस ऐतिहासिक सरकार में राजा महेंद्र प्रताप को राष्ट्रपति मनोनीत किया गया था, जबकि मौलाना बरकतउल्ला भोपाली को देश का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया था. इस सरकार का एकमात्र मकसद दुनिया भर के देशों से सैन्य और राजनीतिक मदद जुटाकर भारत से ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकना था.
जब हुई रूसी क्रांति के महानायक लेनिन से मुलाकात
वैश्विक स्तर पर भारत की आजादी की अलख जगाने के लिए मौलाना बरकतउल्ला ने उस दौर के सबसे कद्दावर और क्रांतिकारी नेता व्लादिमीर लेनिन से भी मुलाकात की थी. वे रूस की प्रसिद्ध बोल्शेविक क्रांति से बेहद प्रभावित थे और भारत में भी उसी तर्ज पर एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा करना चाहते थे. उन्होंने वैश्विक मंचों पर भारत का पक्ष इतनी मजबूती से रखा कि ब्रिटिश खुफिया एजेंसियां हमेशा उनके पीछे लगी रहती थीं. उनके इसी अदम्य साहस और देशप्रेम के कारण ही आजादी के बाद उनके गृह राज्य में इस बड़ी यूनिवर्सिटी का नाम उनके नाम पर समर्पित किया गया था.
























