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Explained: सोनिया गांधी जेल में मिलने पहुंची, कांग्रेस के 'ट्रबलशूटर' कहलाए! भारत के सबसे अमीर CM बने शिवकुमार के सामने चुनौतियां क्या?

D K Shivakumar Challenges: कर्नाटक चुनाव 2028 के लिए शिवकुमार को विकास पुरुष के रूप में प्रोजेक्ट किया जाएगा, जो हर विपरीत परिस्थिति में पार्टी के साथ रहा. वे कांग्रेस के सबसे बड़े 'ट्रबलशूटर' हैं.

कर्नाटक की राजनीति में डीके शिवकुमार का नाम किसी जादूगर से कम नहीं माना जाता. वो कांग्रेस के 'संकटमोचक' हैं, जिन्होंने पार्टी के विधायकों को टूटने से बचाने के लिए रिसॉर्ट की दीवारों में कैद होकर रात-रात भर जागना मंजूर किया. 2019 में जब वो तिहाड़ जेल में बंद थे, तब खुद सोनिया गांधी उनसे मिलने पहुंची थीं. अब 2026 में वो कर्नाटक के मुख्यमंत्री हैं और करीब 1,800 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ देश के सबसे अमीर CM बन गए हैं. लेकिन सत्ता की इस कुर्सी के साथ चुनौतियों का पहाड़ भी है...

डीके शिवकुमार को देश का सबसे अमीर मुख्यमंत्री क्यों कहा जा रहा है?

3 मई 2026 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ डीके शिवकुमार भारत के सबसे अमीर मुख्यमंत्री बन गए. उनकी घोषित कुल संपत्ति करीब 1,813 करोड़ रुपये है. इस मामले में उन्होंने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय को पीछे छोड़ दिया, जो अब तक इस लिस्ट में टॉप पर माने जाते थे.

डीके शिवकुमार की संपत्ति का बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट कारोबार, शिक्षण संस्थानों और विभिन्न ट्रस्टों में फैला हुआ है. एक साधारण किसान परिवार से आने वाले शिवकुमार ने राजनीति के साथ-साथ कारोबार में भी जबरदस्त बढ़त बनाई, जिसकी वजह से आज वो इस मुकाम पर पहुंचे हैं. हालांकि विपक्षी पार्टियां हमेशा उनकी संपत्ति पर सवाल उठाती रही हैं और इसे लेकर उनके खिलाफ कानूनी मामले भी चले, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच उनकी पकड़ इस वजह से कभी कमजोर नहीं हुई.

कांग्रेस ने डीके शिवकुमार को अभी मुख्यमंत्री क्यों बनाया?

इसकी कहानी 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव से शुरू होती है. उस चुनाव में कांग्रेस ने जबरदस्त जीत हासिल की थी, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर पार्टी के दो बड़े नेताओं सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच कड़ी खींचतान हुई. दोनों ही इस पद के प्रबल दावेदार थे. पार्टी हाईकमान ने एक अनौपचारिक फॉर्मूला निकाला, जिसके तहत सिद्धारमैया को पहले मुख्यमंत्री बनाया गया और यह तय हुआ कि कार्यकाल के ढाई से तीन साल बाद कमान डीके शिवकुमार को सौंप दी जाएगी.

ठीक उसी सहमति के मुताबिक, मई 2026 में सिद्धारमैया ने पद छोड़ा और डीके शिवकुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. इस पूरी प्रक्रिया ने यह साफ कर दिया कि पार्टी के लिए शिवकुमार की अहमियत कितनी बड़ी है.

डीके शिवकुमार का चुनावी सफर कैसा रहा है?

शिवकुमार का राजनीतिक करियर चार दशक से भी ज्यादा पुराना है. उन्होंने छात्र राजनीति से अपनी शुरुआत की और 1989 में पहली बार कनकपुरा विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे. इसके बाद वो लगातार कर्नाटक की राजनीति में अपनी ताकत बढ़ाते गए. हालांकि 2013 के चुनाव में उन्हें अपनी ही पारंपरिक सीट कनकपुरा पर JDS के उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 2018 और फिर 2023 के चुनाव में उन्होंने इसी सीट पर शानदार जीत दर्ज करके साबित कर दिया कि वोक्कालिगा समुदाय के बीच उनकी जड़ें कितनी गहरी हैं.

शिवकुमार की असली पहचान सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है. उन्हें कांग्रेस के सबसे बड़े 'ट्रबलशूटर' के तौर पर जाना जाता है. 2017 में जब गुजरात में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के विधायकों के टूटने का खतरा था, तब शिवकुमार ही थे जिन्होंने पार्टी के 44 विधायकों को बेंगलुरु के एक रिसॉर्ट में इकट्ठा रखा और पूरी रात जागकर उनकी निगरानी की. इसी घटना के बाद से वो 'कर्नाटक के चाणक्य' कहे जाने लगे.

क्या है सोनिया गांधी के तिहाड़ जेल जाने का किस्सा?

डीके शिवकुमार के राजनीतिक जीवन का सबसे भावनात्मक और निर्णायक मोड़ सितंबर 2019 में आया. प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया और दिल्ली की तिहाड़ जेल भेज दिया. कांग्रेस पार्टी ने इस कार्रवाई को पूरी तरह से बदले की राजनीति बताया. उस दौर का सबसे यादगार पल वो था जब अक्टूबर 2019 में खुद सोनिया गांधी तिहाड़ जेल पहुंचकर डीके शिवकुमार से मिलीं.

किसी राष्ट्रीय पार्टी के शीर्ष नेता का इस तरह जेल जाकर किसी क्षेत्रीय नेता से मिलना भारतीय राजनीति में बेहद दुर्लभ घटना थी. इस एक मुलाकात ने पूरे देश को यह संदेश दे दिया कि डीके शिवकुमार गांधी परिवार और कांग्रेस हाईकमान के लिए कितने खास और भरोसेमंद हैं. जेल से बाहर आने के बाद उनकी छवि एक ऐसे योद्धा की बन गई जिसने हर मुश्किल में पार्टी के प्रति अपनी वफादारी नहीं छोड़ी.

अगले दो साल में डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

मुख्यमंत्री बनने के बाद डीके शिवकुमार के सामने समय बहुत कम है और 3 बड़ी चुनौतियां हैं...

  • पहली चुनौती: 2028 के विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस को तैयार करना. 2023 में पार्टी ने पांच बड़ी 'गारंटी' योजनाओं के दम पर सत्ता हासिल की थी, लेकिन अब इन योजनाओं से जनता में एक तरह की थकान देखी जा रही है. बढ़ती महंगाई के कारण नाराजगी भी सामने आ रही है. शिवकुमार को इन योजनाओं को बिना किसी रुकावट के चलाते रहना है और साथ ही अपनी एक अलग छवि भी बनानी है ताकि सरकार के खिलाफ एंटी-इनकम्बेंसी की लहर से बचा जा सके.
  • दूसरी चुनौती: पार्टी के अंदर की गुटबाजी को संभालना है. सिद्धारमैया का समर्थक खेमा अभी भी काफी मजबूत है और शिवकुमार को बार-बार इस धारणा का सामना करना पड़ सकता है कि सरकार में दो सत्ता केंद्र काम कर रहे हैं. कैबिनेट में फेरबदल करना, अपने वफादारों को जगह देना और सिद्धारमैया के समर्थकों को संतुलित करना उनके लिए एक कड़ी परीक्षा होगी.
  • तीसरी चुनौती: जातीय समीकरणों को साधना है. शिवकुमार खुद वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं, लेकिन उन्हें लिंगायत समुदाय को भी अपने साथ जोड़कर रखना होगा, क्योंकि बीजेपी लगातार लिंगायत वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है.

इसके अलावा, बेंगलुरु शहर की बुनियादी समस्याएं जैसे बाढ़, ट्रैफिक और पानी की किल्लत भी उनकी सरकार के लिए बड़ी परीक्षा बन सकती हैं.

कांग्रेस का आगे का प्लान क्या है?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि कांग्रेस हाईकमान की नजर में डीके शिवकुमार सिर्फ कर्नाटक के मुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि वो पूरे दक्षिण भारत में पार्टी के पुनरुत्थान का सबसे बड़ा चेहरा हैं. पार्टी का प्लान उन्हें एक मजबूत वोक्कालिगा और किसान नेता के रूप में स्थापित करने का है, जो कर्नाटक के विकास मॉडल को पड़ोसी राज्यों में भी ले जा सके. इसके लिए सरकारी योजनाओं की बड़े पैमाने पर मार्केटिंग की जाएगी और शिवकुमार को एक ऐसे विकास पुरुष के रूप में प्रोजेक्ट किया जाएगा जिसने हर विपरीत परिस्थिति में पार्टी का साथ दिया.

आने वाले महीनों में कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी में बड़े संगठनात्मक बदलाव होने की उम्मीद है, ताकि पूरा संगठन शिवकुमार के नियंत्रण में आ सके. 2028 के चुनाव से पहले लिंगायत, SC/ST और अल्पसंख्यक समुदायों के साथ विशेष संवाद अभियान चलाने की योजना है. कांग्रेस का पूरा फोकस इस बात पर होगा कि शिवकुमार के नेतृत्व पर कोई सवाल न उठे और उन्हें उसी तरह से चुनावी चेहरा बनाया जाए जैसे 2023 में सिद्धारमैया को बनाया गया था. फर्क सिर्फ इतना होगा कि इस बार पार्टी की कमान पूरी तरह से एक हाथ में होगी और वो हाथ डीके शिवकुमार का होगा.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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