TMC Political Crisis: पूरी TMC पर ही कैसे दावा करने लगे ऋतव्रत बनर्जी, संविधान का वो कौन सा सीक्रेट नियम?
TMC Political Crisis: ऋतब्रत बनर्जी समेत 58 बागी नेताओं को विधानसभा स्पीकर ने मंजूरी दे दी है. गुट का कहना है कि वे हीं असली टीएमसी पार्टी हैं. आइए जानते हैं इसके पीछे का संवैधानिक नियम.

- ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी में बड़ा राजनीतिक विद्रोह हुआ।
- 58 विधायकों ने दलबदल विरोधी कानून के अपवाद का उपयोग किया।
- विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी।
- पार्टी चिन्ह पर अंतिम निर्णय संवैधानिक संस्थाएं ही करती हैं।
TMC Political Crisis: ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में विधायकों के एक समूह द्वारा बड़े विद्रोह की खबरों के बाद टीएमसी के अंदर राजनीतिक उदल-पुथल तेज हो गई है. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार के बाद विद्रोही गुटों ने है दावा किया है कि वह असली टीएमसी है. पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी समेत 58 बागी नेताओं को विधानसभा स्पीकर ने मंजूरी दे दी है. स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दी है. इसी बीच आइए जानते हैं कि ऋतब्रत बनर्जी पूरी टीएमसी पर कैसे दावा कर रहे हैं? जानें क्या कहता है संविधान का नियम?
दलबदल विरोधी कानून में एक अपवाद
भारत का दलबदल विरोधी कानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है. आमतौर पर अगर कोई एक विधायक या फिर विधायकों का कोई छोटा समूह अपनी पार्टी के खिलाफ विद्रोह करता है तो उन्हें विधानसभा से अयोग्य घोषित किया जा सकता है. लेकिन इस कानून में एक बड़ा अपवाद है. अगर किसी पार्टी के कम से कम दो तिहाई निर्वाचित विधायक एक साथ अलग हो जाते हैं तो उन पर दलबदल विरोधी कानून लागू नहीं होता और उनकी सदस्यता सुरक्षित रहती है.
58 का आंकड़ा क्यों जरूरी?
विधानसभा में टीएमसी के 80 विधायक थे. संवैधानिक फार्मूले के तहत कानूनी रूप से दो तिहाई का आंकड़ा पार करने के लिए कम से कम 54 विधायकों की जरूरत थी. रिपोर्ट्स के मुताबिक ऋतब्रत बनर्जी के खेमे ने 58 विधायकों के हस्ताक्षर सौंपे. इस वजह से गुट को कानून के तहत सुरक्षा का दावा करने का मौका मिल गया.
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राजनीतिक दल और विधायी दल के बीच अंतर
भारतीय कानून एक राजनीतिक दल और उसके विधायी विंग के बीच अंतर करता है. राजनीतिक दल से मतलब उस संगठन से है जो पार्टी नेतृत्व द्वारा कंट्रोल होता है और विधायी दल से मतलब उस पार्टी के चुनाव चिन्ह पर निर्वाचित विधायकों या फिर सांसदों से है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने ऐसे दावों को मजबूती दी
शिवसेना में हुए राजनीतिक विभाजन से जुड़े पिछले फसलों में अदालत और संवैधानिक संस्थाओं ने इस बात की जांच की थी कि क्या चुने हुए ज्यादातर विधायक विधानसभा के अंदर किसी गुट के पार्टी की पहचान और चुनाव चिह्नों पर दावे को मजबूत कर सकते हैं. इन मिसालों की वजह से पार्टी में फूट पड़ने पर विधायकों की संख्याबल काफी ज्यादा अहम हो जाती है.
अंतिम फैसला संवैधानिक संस्थाओं पर निर्भर
भले ही बागी गुट बहुमत के समर्थन का दवा करें लेकिन पार्टी के चुनाव चिन्ह और आधिकारिक दर्जे को लेकर अंतिम मान्यता आम तौर पर विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं द्वारा ही दी जाती है.
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