क्या होता है विधानसभा और विधान परिषद में अंतर, क्यों कराए जाते हैं MLC चुनाव?
Bihar MLC Election: अक्सर ही लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर विधानसभा और विधान परिषद के बीच क्या अंतर होता है. आइए जानते हैं क्या इस सवाल का जवाब.

- बिहार एनडीए ने विधान परिषद चुनावों की तैयारी शुरू की।
- विधानसभा सदस्य जनता चुनती, परिषद सदस्य अप्रत्यक्षतः चुने जाते।
- विधानसभा को वित्तीय शक्ति, परिषद केवल कानून समीक्षा करती।
Bihar MLC Election: बिहार में सत्ताधारी एनडीए ने आने वाले विधान परिषद चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है. चुनाव की रणनीति तय करने के लिए एनडीए विधायक दल की बैठक बुलाई गई. 7 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के आवास पर गठबंधन की बैठक के बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने यह जानकारी दी. इस घटनाक्रम के बीच आइए जानते हैं कि विधानसभा और विधान परिषद के बीच क्या अंतर होता है और एमएलसी की चुनाव की प्रक्रिया क्या है.
विधानसभा क्या है?
विधानसभा राज्य विधायिका का निचला सदन होता है. इसके सदस्यों को एमएलए कहा जाता है और उन्हें राज्य के मतदाता सीधे चुनते हैं. विधानसभा का कार्यकाल आम तौर पर 5 साल का होता है. हालांकि इसे समय से पहले भंग किया जा सकता है. मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह होते हैं. इसका मतलब है कि सत्ता में बने रहने के लिए सरकार को विधानसभा का विश्वास बनाए रखना होता है.

विधान परिषद क्या है?
विधान परिषद राज्य विधायिका का ऊपरी सदन होता है. इसके सदस्यों को एमएलसी यानी विधान परिषद के सदस्य कहा जाता है. विधानसभा के उलट विधान परिषद एक स्थायी सदन है और इसे भंग नहीं किया जा सकता. इसके एक तिहाई सदस्य हर 2 साल में रिटायर होते हैं. इससे सदन में निरंतरता बनी रहती है और नए सदस्यों के आने का मौका मिलता है. फिलहाल 6 राज्यों में विधान परिषदें हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना.
एमएलए और एमएलसी कैसे चुने जाते हैं?
सबसे बड़ा अंतर चुनाव प्रक्रिया में है. एमएलए को जनता सीरियल चुनती है और एमएलसी को अलग-अलग चुनावी समूह और नामांकन के जरिए चुना जाता है. विधान परिषद के लिए एक तिहाई सदस्यों को स्थानीय निकाय चुनते हैं, एक तिहाई को एमएलए चुनते हैं, एक बारहवें हिस्से को रजिस्टर्ड ग्रेजुएट चुनते हैं और एक बारहवें हिस्से को तय योग्यता पूरी करने वाले शिक्षक चुनते हैं. बाकी सदस्यों को राज्यपाल साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों से मनोनीत करते हैं.
कार्यकाल और उम्र में फर्क
एमएलए का कार्यकाल आमतौर पर 5 साल का होता है और एमएलसी का कार्यकाल 6 साल का होता है. एमएलए बनने के लिए कम से कम उम्र 25 साल होने चाहिए और एमएलसी बनने के लिए व्यक्ति की उम्र कम से कम 30 साल होनी चाहिए. उम्र और कार्यकाल की अलग-अलग जरूरत दोनों सदनों की अलग-अलग बनावट और भूमिका को दिखाती है.
वित्तीय शक्तियां क्या हैं?
विधानसभा के पास वित्तीय मामलों में ज्यादा शक्तियां होती हैं. मनी बिल सिर्फ विधानसभा में ही पेश किया जा सकता है. विधान परिषद मनी बिल को ना तो खारिज कर सकती है और ना ही उसमें कोई भी बदलाव कर सकती है. वह सिर्फ सुझाव दे सकती है और उसे 14 दिनों के अंदर बिल वापस करना होता है. अगर ऐसा नहीं होता तो बिल को परिषद द्वारा पारित मान लिया जाता है.

क्या विधान परिषद सरकार गिरा सकती है?
मंत्री परिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है ना कि विधान परिषद के प्रति. इस वजह से अगर सरकार अपना बहुमत खो देती है तो विधानसभा अविश्वास प्रस्ताव के जरिए सरकार को गिर सकती है. विधान परिषद के पास यह शक्ति नहीं होती है. इसकी भूमिका मुख्य रूप से विधानसभा द्वारा पारित कानून की समीक्षा, उन पर बहस और उनकी जांच पड़ताल करना है.
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एमएलसी चुनाव क्यों कराए जाते हैं?
एमएलसी चुनाव उन समूह को प्रतिनिधित्व देता है जिनका आम विधानसभा चुनाव के जरिए सीधे प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता. परिषद शिक्षक, ग्रेजुएट, स्थानीय निकाय के प्रतिनिधियों और अलग-अलग क्षेत्र के विशेषज्ञों को विधायी प्रक्रिया में शामिल कर सकती है. यह कानून की समीक्षा के लिए दूसरे सदन के तौर पर भी काम करती है. विधानसभा द्वारा पारित बिलों पर परिषद में अतिरिक्त बहस और जांच पड़ताल हो सकती है.
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