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Bihar Election Result 2025: अगर बिहार में विपक्ष के सारे विधायक इस्तीफा दे दें तो क्या होगा, क्या तब भी चल सकता है सदन?

Bihar Election Result 2025: बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद एक सवाल यह उठ रहा है कि क्या हो अगर सभी विपक्ष विधायक इस्तीफा दे दें. क्या इसके बाद भी विधानसभा चलती रहेगी या नहीं. आइए जानते हैं.

Bihar Election Result 2025:  बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए ने 243 में से 202 सीटें हासिल की और महागठबंधन के पास मात्र 35 सीटें ही बचीं. इसी बीच एक सवाल खड़ा हो रहा है कि अगर सभी विपक्षी विधायक एक साथ इस्तीफा दे दें तो क्या होगा? क्या विधानसभा चलती रहेगी या फिर शासन पूरी तरह से ठप हो जाएगा? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

क्या सामूहिक इस्तीफों के बाद चल पाएगी विधानसभा 

जब विपक्षी विधायक इस्तीफा देते हैं तो अध्यक्ष द्वारा इस्तीफा स्वीकार करने के बाद उनकी सीटें खाली हो जाती हैं. इसके बाद सदन की कार्यकारी शक्ति उसी के मुताबिक कम हो जाती है, लेकिन विधानसभा रुकती नहीं और ना ही शासन रुकता है. अगर सदन की कुल संख्या कम भी हो जाती है तो उसका बहुमत आनुपातिक रूप से और भी ज्यादा मजबूत हो जाता है. 

इसी के साथ इस पूरी प्रक्रिया में कोरम एक बड़ी भूमिका निभाता है. इसके लिए सदन के कुल सदस्यों के केवल दसवें हिस्से की उपस्थिति जरूरी होती है. कम संख्या बल के बावजूद भी सरकार अपने आप ही इस जरूरत को आसानी से पूरा कर लेती है. इसका सीधा सा मतलब हुआ कि विधायी सत्र, बजट अनुमोदन और चर्चाएं बिना किसी बाधा के जारी रह सकती हैं.

उपचुनावों की भूमिका और संवैधानिक स्थिरता 

खाली सीट एक और संवैधानिक प्रक्रिया को शुरू करती है और उसे कहते हैं उपचुनाव. चुनाव आयोग को सभी नई खाली सीट को भरने के लिए 6 महीने के अंदर उपचुनाव करने होते हैं, जब तक की विधानसभा का पूरा कार्यकाल समाप्त न होने वाला हो. इससे यह पक्का होता है कि अंत में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व वापस आए भले ही विपक्ष अस्थाई रूप से मौजूद न हो. 

ध्यान देने योग्य बात यह है कि विपक्षी विधायकों के सामूहिक इस्तीफे से कोई भी संवैधानिक संकट पैदा नहीं होता. सरकार तब तक स्थिर रहती है जब तक की कम हुए सदन में उसके विधायकों की संख्या आधे से ऊपर रहती है. राष्ट्रपति शासन या फिर विधानसभा भंग होने की स्थिति अपने आप ही नहीं बनती. 

लोकतंत्र और शासन पर प्रभाव 

वैसे तो विधानसभा संवैधानिक रूप से काम करती रहती है लेकिन इसका राजनीतिक प्रभाव भी होता है. विपक्षी सदस्यों के बिना पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया एक तरफ हो जाती है. विधायकों की कोई भी जांच पड़ताल नहीं होती, सरकारी कार्यों पर कोई भी सवाल नहीं उठाता और साथ ही सत्तारूढ़ दल के प्रति कोई भी संतुलन नहीं होता.

ये भी पढ़ें: सबसे ज्यादा वोट मिलने पर भी क्यों कम रह जाती हैं किसी पार्टी की सीटें, क्या है इसका चुनावी गणित?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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