Assembly Elections 2026: आचार संहिता लागू होने के कितने दिन बाद होते हैं मतदान, देख लीजिए चुनाव का पूरा कैलकुलेशन
Assembly Elections 2026: चुनाव आयोग द्वारा विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता प्रभावी हो जाती है. यह नियम सभी दलों को समान अवसर देने के लिए बनाए गए हैं.

Assembly Elections 2026: भारत में चुनाव किसी उत्सव से कम नहीं होते, लेकिन इस उत्सव को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए चुनाव आयोग आदर्श आचार संहिता का कवच तैयार करता है. 15 मार्च यानि आज 5 राज्यों के चुनावी कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही यह विशेष नियम लागू हो गए हैं. आखिर चुनाव की तारीखों के ऐलान और पहले वोट के बीच कितना वक्त मिलता है? आचार संहिता की वे कौन सी पाबंदियां हैं जो रातों-रात नेताओं के हाथ बांध देती हैं? आइए, चुनावी गणित और इसके नियमों को गहराई से समझते हैं.
तारीखों के ऐलान से मतदान तक का समय अंतराल
चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जैसे ही तारीखों का ऐलान हुआ, उसी क्षण से आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू मानी जाती है. चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, तारीखों की घोषणा और मतदान के पहले चरण के बीच आमतौर पर 3 से 6 हफ्तों का अंतर रखा जाता है. यह समय उम्मीदवारों को नामांकन पत्र भरने, उनकी जांच करने और नाम वापस लेने के लिए दिया जाता है. इस अंतराल का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दलों को प्रचार के लिए पर्याप्त समय देना और सुरक्षा बलों की तैनाती सुनिश्चित करना होता है.
क्या है आचार संहिता और इसके लागू होने का उद्देश्य?
आदर्श आचार संहिता उन नियमों का एक समूह है, जिसे सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को चुनाव के दौरान मानना पड़ता है. इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सत्ता पक्ष अपनी ताकत और सरकारी संसाधनों का गलत इस्तेमाल कर चुनाव को प्रभावित न कर सके. आचार संहिता यह तय करती है कि चुनाव के दौरान सभी दलों के बीच समानता रहे और मतदाता किसी भी तरह के दबाव या लालच के बिना अपना वोट दे सकें. यह नियम मतदान प्रक्रिया के अंत और परिणाम आने तक प्रभावी रहते हैं.
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नेताओं और पार्टियों के लिए लागू होने वाली प्रमुख पाबंदियां
आचार संहिता लागू होते ही सरकारी तंत्र पर नेताओं का नियंत्रण सीमित हो जाता है. कोई भी मंत्री या नेता आधिकारिक यात्रा के दौरान सरकारी गाड़ियों, विमानों या मशीनरी का इस्तेमाल चुनावी प्रचार के लिए नहीं कर सकता है. सार्वजनिक धन (सरकारी खजाने) का उपयोग किसी विशेष दल या सरकार की उपलब्धियों के विज्ञापन के लिए नहीं किया जा सकता है. यहां तक कि सरकारी आवासों और बंगलों का उपयोग भी चुनावी गतिविधियों के लिए प्रतिबंधित होता है. उल्लंघन की स्थिति में चुनाव आयोग उम्मीदवार का नामांकन तक रद्द कर सकता है.
नई घोषणाओं और शिलान्यास पर पूर्ण प्रतिबंध
आचार संहिता का सबसे बड़ा असर सरकार की नई योजनाओं पर पड़ता है. एक बार चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो जाने के बाद, सरकार किसी भी नई वित्तीय योजना, सड़क निर्माण, या विकास कार्य का शिलान्यास और उद्घाटन नहीं कर सकती है. कोई भी ऐसा निर्णय जो मतदाताओं को सीधे प्रभावित या आकर्षित कर सकता हो, उस पर रोक लगा दी जाती है. हालांकि, जो काम पहले से ही चालू हैं या पुरानी योजनाओं के तहत आ रहे हैं, वे जारी रह सकते हैं, लेकिन उनमें किसी नए वित्तीय वादे की अनुमति नहीं होती है.
रैलियों और धार्मिक आधार पर प्रचार के कड़े नियम
चुनावी रैलियों और सभाओं को लेकर भी आचार संहिता में स्पष्ट निर्देश हैं. किसी भी रैली या जुलूस के लिए संबंधित क्षेत्र की पुलिस और प्रशासन से पहले अनुमति लेना अनिवार्य है. इसके अलावा, आचार संहिता के तहत धर्म, जाति या संप्रदाय के आधार पर वोट मांगना सख्त मना है. मंदिरों, मस्जिदों या अन्य धार्मिक स्थलों का उपयोग चुनावी प्रचार के मंच के रूप में नहीं किया जा सकता है. कोई भी ऐसा बयान जो समुदायों के बीच नफरत फैलाए, वह आचार संहिता का सीधा उल्लंघन माना जाता है और कड़ी कार्रवाई का आधार बनता है.
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