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मिडिल ईस्ट तनाव से भारत लगाएगा अमेरिका की लंका! अगर बंद कर दिया एक्सपोर्ट तो भूखे मरेंगे गोरे

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भारत की खाद्य निर्यात शक्ति अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है. यदि भारत ने अपने कृषि उत्पादों और खाद्यान्न की सप्लाई रोकी, तो अमेरिकी में हाहाकार मच सकता है.

मिडिल ईस्ट यानी मध्य पूर्व में बढ़ता हुआ भू-राजनीतिक तनाव पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है. इस अशांति के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों से लेकर वैश्विक व्यापारिक समुद्री रास्तों तक सब कुछ बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. लेकिन इस पूरे संकट के बीच एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है, जो सीधे तौर पर भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों से जुड़ा हुआ है. अगर खाड़ी देशों का यह तनाव और अधिक गहराता है, तो भारत के पास एक ऐसा मजबूत दांव आ जाएगा जिससे वह सुपरपावर अमेरिका की मुश्किलें बढ़ा सकता है.

खाड़ी संकट और वैश्विक व्यापार पर असर

मध्य पूर्व के देशों में जारी मौजूदा संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन को हिलाकर रख दिया है. लाल सागर और स्वेज नहर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक रास्तों पर लगातार बढ़ते खतरों के कारण जहाजों का आना-जाना बेहद मुश्किल और जोखिम भरा हो गया है. इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच अमेरिका और ईरान जैसे देशों के आपसी तनाव ने आग में घी डालने का काम किया है. इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर उन देशों पर पड़ रहा है जो अपनी रोजमर्रा की जरूरी चीजों के आयात के लिए पूरी तरह से दूसरे देशों पर निर्भर हैं.

भारत की कृषि और खाद्य निर्यात में ताकत

भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि प्रधान और खाद्य उत्पादक देशों में गिना जाता है. आज के समय में भारत न केवल अपने विशाल देश की खाद्य जरूरतों को पूरा करता है, बल्कि अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों सहित पूरी दुनिया को भारी मात्रा में खाद्यान्न का निर्यात करता है. भारत से जाने वाले चावल, गेहूं, मसाले, चीनी और अन्य जरूरी प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स पर पश्चिमी देश बहुत बड़े पैमाने पर निर्भर करते हैं. भारत की इस कृषि शक्ति को वैश्विक कूटनीति में एक बड़े हथियार के तौर पर देखा जा रहा है.

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अमेरिकी बाजारों पर भारतीय खाद्य पदार्थों का कब्जा

महाशक्ति अमेरिका कहने को तो तकनीक और हथियारों के मामले में दुनिया का नेतृत्व करता है, लेकिन जब बात बुनियादी खाद्य सुरक्षा की आती है, तो वह पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है. अमेरिकी बाजारों और वहां के सुपरमार्केट्स में बिकने वाले अधिकांश कृषि उत्पाद और विशेष प्रकार के खाद्यान्न सीधे तौर पर भारत से आयात किए जाते हैं. वहां रहने वाली एक बड़ी आबादी अपने दैनिक भोजन के लिए भारतीय चावल और मसालों का इस्तेमाल करती है. ऐसे में भारतीय खाद्य सामग्री की वहां भारी और नियमित मांग बनी रहती है.

एक्सपोर्ट रोकने का अमेरिकी थाली पर सीधा असर

अगर मिडिल ईस्ट का तनाव और अधिक बेकाबू होता है और भारत अपनी रणनीतिक सुरक्षा या घरेलू जरूरतों का हवाला देकर अमेरिका को किए जाने वाले खाद्य निर्यात (Export) पर आंशिक या पूर्ण प्रतिबंध लगा देता है, तो इसके बेहद गंभीर परिणाम होंगे. भारत की तरफ से सप्लाई बंद होते ही अमेरिकी बाजारों में हाहाकार मच जाएगा. वहां बुनियादी खाद्य वस्तुओं की भारी किल्लत हो जाएगी और देखते ही देखते महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएगी. भोजन की इस कमी का सीधा असर वहां के आम नागरिकों की थाली पर पड़ेगा.

वैश्विक मंच पर भारत का बढ़ता हुआ रसूख

मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के समीकरण बहुत तेजी से बदल रहे हैं. अब युद्ध सिर्फ सीमाओं पर हथियारों से नहीं, बल्कि व्यापार और खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर भी लड़े जाते हैं. भारत अच्छी तरह जानता है कि वैश्विक खाद्य बाजार में उसकी हिस्सेदारी कितनी महत्वपूर्ण है. अपनी इसी ताकत के दम पर भारत पश्चिमी देशों के सामने अपनी शर्तें रखने और वैश्विक फैसलों को प्रभावित करने की स्थिति में आ चुका है. खाड़ी देशों के इस तनाव के बीच भारत की यह रणनीति अमेरिका जैसे देशों को झुकने पर मजबूर कर सकती है.

पश्चिमी देशों की खाद्य निर्भरता की पोल खुली

इस पूरे संकट ने पश्चिमी देशों और विशेषकर अमेरिका के उस खोखले दावे की पोल खोलकर रख दी है जिसमें वे खुद को हर मामले में सर्वोच्च बताते हैं. असलियत यह है कि बुनियादी खाद्यान्न संकट के सामने बड़े से बड़े आधुनिक हथियार भी बेअसर साबित होते हैं. भारत अगर अपने कड़े आर्थिक फैसले लागू करता है, तो अमेरिका जैसे विकसित देशों के लिए अपनी जनता का पेट भरना एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाएगा. यही वजह है कि भारत की व्यापारिक नीतियों में थोड़ा सा भी बदलाव सीधे तौर पर वाशिंगटन को परेशान कर देता है.

आत्मनिर्भरता बनाम रणनीतिक कूटनीति का दौर

भारत सरकार फिलहाल अपनी घरेलू खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कदम उठा रही है. देश के भीतर जमा स्टॉक और बढ़ती कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए समय-समय पर निर्यात नीतियों की समीक्षा की जाती है. यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव के कारण भारत ने अपने कदम पीछे खींचे, तो अमेरिका के पास इसका कोई तत्काल दूसरा विकल्प मौजूद नहीं होगा. इस प्रकार, मध्य पूर्व का यह संकट अप्रत्यक्ष रूप से भारत को एक ऐसी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है जो पूरी दुनिया की खाद्य व्यवस्था को नियंत्रित कर सकती है.

यह भी पढ़ें: US iran Conflict History: 1979 से अब तक... कैसे बढ़ी अमेरिका–ईरान की दुश्मनी, किस देश को हो रहा सबसे ज्यादा नुकसान?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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