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क्या रोबोट का भी होता है पेटेंट, इसमें कितना लगता है पैसा और कहां करना होता है अप्लाई?

AI Impact Summit के दौरान एक रोबोट डॉग छाया है. गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने इसे प्रदर्शित किया था, लेकिन यह दरअसल चीन में बना मॉडल है. इसी क्रम में चलिए जानें कि क्या रोबोट का भी पेटेंट कराया जाता है?

दिल्ली में हुए एक बड़े टेक इवेंट में अचानक भीड़ एक चार पैरों वाले रोबोट के पीछे जुट गई. लोग रुक-रुककर वीडियो बना रहे थे, बच्चे उसे छूने की कोशिश कर रहे थे और सोशल मीडिया पर उसका नाम ट्रेंड करने लगा. तब सवाल उठा कि क्या ऐसा रोबोट सिर्फ दिखावे की चीज है या इसके पीछे बड़ी टेक्नोलॉजी और कानूनी तैयारी छिपी है? क्या रोबोट का भी पेटेंट होता है? और अगर हां, तो इसकी कीमत कितनी पड़ती है? चलिए यह जानने की कोशिश करते हैं. 

क्या है गलगोटिया विवाद और कहां से शुरू हुई रोबोट डॉग की चर्चा?

दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित भारत मंडपम में इन दिनों India AI Impact Summit 2026 चल रहा है, जहां देश-विदेश से आए टेक विशेषज्ञ अपनी नई तकनीक और इनोवेशन पेश कर रहे हैं. इसी कार्यक्रम में ग्रेटर नोएडा की गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एक रोबोटिक डॉग को अपने संस्थान की उपलब्धि बताकर प्रदर्शित किया. इस रोबोट को ‘ओरियन’ नाम से पेश किया गया था. शुरुआत में इसे यूनिवर्सिटी की बड़ी उपलब्धि के तौर पर दिखाया गया, लेकिन कुछ ही समय में मामला पलट गया.

सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें और वीडियो वायरल होते ही लोगों ने इसकी पड़ताल शुरू कर दी. ऑनलाइन रिसर्च में सामने आया कि यह रोबोट दरअसल चीन में बना मॉडल है. इसके बाद विवाद खड़ा हो गया. एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर चीन पल्स नाम के हैंडल ने भी पोस्ट कर दावा किया कि भारतीय यूनिवर्सिटी ने चीनी रोबोट को अपना बताकर पेश किया है. इसके बाद मीम्स और आलोचनाओं की बाढ़ आ गई. 

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस घटनाक्रम के बाद यूनिवर्सिटी को समिट एक्सपो में लगे अपने स्टॉल को खाली करने के लिए कहा गया है. देखते ही देखते यह मुद्दा राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया. ऐसे में एक सवाल यह है कि आखिर क्या रोबोट को पेटेंट कराया जा सकता है, अगर हां, तो इसका खर्चा कितना आएगा. 

क्या रोबोट का पेटेंट संभव है?

इसका जवाब है हां. अगर कोई रोबोट नया है, पहले से मौजूद तकनीक से अलग है और उसका व्यावसायिक इस्तेमाल संभव है, तो उसे पेटेंट कराया जा सकता है. पेटेंट का मूल सिद्धांत यह है कि आविष्कार नया हो, स्पष्ट न हो और औद्योगिक उपयोग में आ सके. 

रोबोट के मामले में सिर्फ उसका हार्डवेयर ही नहीं, बल्कि उसका सॉफ्टवेयर, कंट्रोल एल्गोरिद्म, एआई मॉडल, मशीन लर्निंग सिस्टम और सेंसर तकनीक भी पेटेंट के दायरे में आ सकती है. उदाहरण के तौर पर, मैन्युफैक्चरिंग में इस्तेमाल होने वाले रोबोटिक आर्म, मेडिकल सर्जरी रोबोट, डिलीवरी ड्रोन और यहां तक कि घरेलू रोबोट भी पेटेंट कराए जाते हैं. 

इंसान ही होता है आविष्कारक

एक अहम बात यह है कि ज्यादातर देशों में पेटेंट के लिए इंसान का नाम आविष्कारक के रूप में जरूरी है. चाहे रोबोट या एआई ने कोई डिजाइन सुझाया हो, लेकिन कानूनी रूप से आविष्कारक इंसान ही माना जाएगा. अमेरिका, यूरोप और भारत जैसे देशों में एआई सिस्टम को खुद आविष्कारक का दर्जा नहीं दिया जाता है.

कितनी आती है लागत?

भारत में अगर कोई स्टार्टअप या व्यक्ति रोबोट का पेटेंट कराना चाहता है, तो सरकारी फीस, ड्राफ्टिंग और वकील की फीस मिलाकर कुल खर्च करीब 25 हजार रुपये से लेकर 1 लाख रुपये या उससे ज्यादा तक जा सकता है. बड़ी कंपनियों के लिए यह लागत और अधिक हो सकती है, क्योंकि उनका ड्राफ्टिंग और कानूनी प्रक्रिया ज्यादा जटिल होती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, खासकर अमेरिका में, जटिल रोबोटिक सिस्टम का पेटेंट कराने की लागत 5,000 डॉलर से लेकर 16,000 डॉलर या उससे ज्यादा तक जा सकती है. इसके अलावा पेटेंट को सक्रिय रखने के लिए समय-समय पर मेंटेनेंस फीस भी देनी पड़ती है. 

कहां करना होता है अप्लाई?

भारत में पेटेंट के लिए आवेदन भारतीय पेटेंट कार्यालय में किया जाता है, जो उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के तहत काम करता है. अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कंपनियां WIPO यानी World Intellectual Property Organization के जरिए पीसीटी (Patent Cooperation Treaty) मार्ग से आवेदन करती हैं. इससे एक साथ कई देशों में सुरक्षा पाने का रास्ता खुलता है. 

दुनिया में किसका दबदबा?

रोबोटिक्स पेटेंट के मामले में चीन सबसे आगे माना जाता है, खासकर इंडस्ट्रियल और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में. अमेरिका एआई आधारित रोबोट और मेडिकल डिवाइस में मजबूत है, जबकि जापान और दक्षिण कोरिया इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन में अग्रणी हैं. भारत में भी एआई आधारित और औद्योगिक रोबोटिक्स पेटेंट तेजी से बढ़ रहे हैं. आज रोबोट सिर्फ फैक्ट्री तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हेल्थकेयर, लॉजिस्टिक्स, कृषि, सुरक्षा और घरेलू कामों तक उनका दायरा फैल चुका है. ऐसे में पेटेंट सिर्फ कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि बिजनेस की सुरक्षा कवच बन चुका है.

यह भी पढ़ें: Chicken Neck Tunnel: चिकन नेक में सुरंग क्यों बना रहा भारत, इससे क्या होगा फायदा?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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