अन्ना आंदोलन रामलीला मैदान में हुआ, फिर जंतर-मंतर पर क्यों अड़े प्रदर्शनकारी?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर विपक्ष का प्रदर्शन फीका रहा, जहां नेता नहीं पहुंच सके. इसके साथ ही जंतर-मंतर के ऐतिहासिक महत्व, अन्ना आंदोलन के दौरान रामलीला मैदान शिफ्ट होने की कहानी के बारे में जानते हैं.

देश की राजधानी दिल्ली में सीजेपी के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान एक बार फिर जंतर-मंतर की राजनीतिक महत्ता चर्चा के केंद्र में आ गई है. शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर नागरिक न्याय मंच यानी CJP द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में हालात पूरी तरह उम्मीदों के विपरीत रहे. इस प्रदर्शन में विपक्षी दलों का कोई भी बड़ा नेता शामिल नहीं हो सका. तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के आवास से निकलने के बावजूद जंतर-मंतर तक नहीं पहुंच पाईं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी दिल्ली से सीधे चेन्नई के लिए रवाना हो गए, जबकि समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव दिल्ली आने के बजाय अपने पैतृक गांव सैफई चले गए.
विपक्षी दलों के इस तरह ऐन मौके पर किनारा कर लेने से उनकी एकजुटता के दावों की पोल खुल गई. इसके बावजूद कॉकरोच जनता पार्टी ने अगले दिन भी अपना विरोध-प्रदर्शन जारी रखने का ऐलान किया है, जिसके बाद से यह सवाल फिर से खड़ा हो गया है कि आखिर जंतर-मंतर ही राजनीतिक धरनों और प्रदर्शनों का सबसे प्रमुख केंद्र क्यों बना हुआ है.
CJP के विरोध प्रदर्शन में गायब रहे बड़े विपक्षी चेहरे
राजधानी दिल्ली की सिया उस समय और गरमा गई जब जंतर-मंतर पर आयोजित CJP के धरने में कोई भी नामी गिरामी विपक्षी नेता नजर नहीं आया. प्रदर्शन की घोषणा के बावजूद बड़े दिग्गजों की गैर-मौजूदगी ने सियासी गलियारों में कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं. ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल जैसे बड़े नेता तय कार्यक्रम के बावजूद मौके पर नहीं पहुंच पाए, जबकि राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने दिल्ली की इस सियासी हलचल से दूरी बनाते हुए दूसरे शहरों का रुख करना बेहतर समझा.
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अन्ना आंदोलन और रामलीला मैदान का ऐतिहासिक सफर
साल 2011 में देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ा 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' यानी जन लोकपाल विधेयक आंदोलन भारतीय राजनीति का एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ था. इस देशव्यापी जन-आंदोलन की शुरुआत सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल 2011 को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन करके की थी. इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य केंद्र सरकार पर एक मजबूत और प्रभावी जन लोकपाल कानून बनाने का दबाव बनाना था, ताकि देश के प्रशासनिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर नकेल कसकी जा सके. इस महा-अभियान में अन्ना हजारे के साथ अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और कुमार विश्वास जैसे जाने-माने चेहरे भी जुड़े, जिन्हें देश के मध्यम वर्ग और युवाओं का अभूतपूर्व समर्थन मिला था.
जंतर-मंतर से रामलीला मैदान तक का सफर
अन्ना हजारे का यह बहुचर्चित आंदोलन अपनी शुरुआत में जंतर-मंतर से ही शुरू हुआ था, लेकिन कुछ ही दिनों में वहां उमड़ने वाली भारी भीड़ के कारण जगह कम पड़ने लगी. स्थिति यह हो गई कि यातायात व्यवस्था चरमरा गई और आम जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा. ऐसे में प्रशासन और आंदोलन के आयोजकों के बीच आपसी सहमति बनी, जिसके बाद इस विशाल जनसमूह को और अधिक बड़े और सुरक्षित स्थान यानी रामलीला मैदान में शिफ्ट किया गया. प्रदर्शनकारियों का जंतर-मंतर पर अड़े रहने का मुख्य कारण यह है कि यह स्थान संसद भवन और तमाम अहम सरकारी दफ्तरों के बिल्कुल करीब है, जिससे सरकार तक अपनी बात बहुत कम समय में पहुंचाई जा सकती है.
एनजीटी की रोक और सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
जंतर-मंतर पर लगातार होने वाले धरना-प्रदर्शनों के कारण इलाके की व्यवस्था पर पड़ने वाले असर को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने साल 2017 में यहां विरोध-प्रदर्शन करने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी. एनजीटी का तर्क था कि इन प्रदर्शनों से आसपास की हरियाली नष्ट हो रही है और भारी गंदगी फैल रही है, इसलिए उसने प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान जाने की सलाह दी. हालांकि, इस आदेश के खिलाफ मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी के प्रतिबंध पर रोक लगाते हुए दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह प्रदर्शनों के लिए एक नई और संतुलित गाइडलाइन तैयार करे.
जंतर-मंतर से पहले कहां होते थे प्रदर्शन?
राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के इतिहास पर नजर डालें तो जंतर-मंतर से पहले बोट क्लब को धरनास्थलों का गढ़ माना जाता था. अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन ने सरकार के खिलाफ एक ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था, जिसमें हजारों किसान और मवेशी बोट क्लब पहुंच गए थे. इस भारी भीड़ और गंदगी के चलते सरकार हिल गई और उसने कानून बनाकर बोट क्लब पर प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसके बाद जंतर-मंतर को प्रदर्शनों के लिए आधिकारिक तौर पर तय कर दिया गया. वहीं, बोट क्लब से भी पहले के दौर में दिल्ली में बड़े विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से अकबर रोड के आसपास हुआ करते थे.

कब और किसने कराया जंतर-मंतर का निर्माण?
आज अपनी राजनीतिक और ऐतिहासिक पहचान के लिए मशहूर जंतर-मंतर का निर्माण विरोध प्रदर्शनों के लिए नहीं, बल्कि विज्ञान और खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए हुआ था. दिल्ली के दिल में स्थित इस अनूठी खगोलीय वेधशाला का निर्माण साल 1724 में आमेर के राजा महाराज जयसिंह द्वितीय ने करवाया था. मुगल बादशाह मोहम्मद शाह के शासनकाल के दौरान हिंदू और मुस्लिम खगोलशास्त्रियों के बीच ग्रहों की चाल और स्थिति को लेकर मतभेद पैदा हो गए थे, जिन्हें सुलझाने के लिए सवाई जय सिंह ने इस वेधशाला की नींव रखी थी. दिल्ली के अलावा उन्होंने जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में भी ऐसे निर्माण करवाए थे. माना जाता है कि दिल्ली का यह जंतर-मंतर मध्य एशिया की समरकंद वेधशाला की तर्ज पर तैयार किया गया था.
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