अकबर के दरबार का प्रिय रत्न, दर्दनाक था जिसका अंत; अंतिम संस्कार के लिए शव तक नहीं हुआ नसीब
एक गलत फैसला, एक असफल युद्ध और अकबर के सबसे प्रिय रत्न की रहस्यमयी मौत हो गई. आइए जानें कि वो आखिर कौन था और अंतिम संस्कार के लिए उनकी लाश भी क्यों नहीं मिल सकी.

मुगल दरबार में हंसी, समझदारी और तर्क का दूसरा नाम थे बीरबल. बादशाह अकबर जिन पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे, वही बीरबल एक दिन ऐसे हालात में मौत के मुंह में चले गए कि उनकी लाश तक वापस नहीं आ सकी. इतिहास में दर्ज यह घटना सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि अकबर के जीवन की सबसे बड़ी भूल और सबसे गहरे पछतावे की दास्तान भी है. आखिर क्या हुआ था उस दिन, जब दरबार का सबसे चमकता रत्न हमेशा के लिए बुझ गया?
अकबर और बीरबल का खास रिश्ता
बीरबल अकबर के नवरत्नों में से एक थे और दरबार में उनकी पहचान सिर्फ एक मंत्री की नहीं, बल्कि बादशाह के सबसे भरोसेमंद सलाहकार की थी. हाजिरजवाबी, बुद्धिमानी और साफ सोच के कारण अकबर उन्हें बेहद पसंद करते थे. कई ऐतिहासिक किताबों, खासकर इरा मुखोती की ‘द ग्रेट मुगल’ में अकबर-बीरबल के रिश्ते का जिक्र खुलकर मिलता है. अकबर कई बार बीरबल की राय को सबसे ऊपर रखते थे.
हाथी वाला किस्सा, जब अकबर ने खुद बचाई जान
साल 1583 में फतेहपुर सीकरी में हाथियों की लड़ाई का आयोजन हुआ. एक बेकाबू हाथी अचानक बीरबल की ओर बढ़ा और उन्हें सूंड में उठाकर हवा में लहरा दिया. दरबार में अफरा-तफरी मच गई. सैनिक कुछ समझ पाते, उससे पहले अकबर खुद घोड़े पर सवार होकर आगे बढ़े और हाथी का ध्यान भटकाया. हाथी ने बीरबल को छोड़ दिया और उनकी जान बच गई. यह घटना दिखाती है कि अकबर बीरबल को कितनी अहमियत देते थे.
तीन साल बाद बदला किस्मत का खेल
1586 में हालात पूरी तरह बदल गए. अफगानिस्तान के स्वात और बाजौर इलाके में युसूफजई कबीलों ने मुगल शासन के खिलाफ विद्रोह कर रखा था. लूट और हिंसा से लोग परेशान थे. अकबर ने अपने सिपहसालार जैन खान कोका को वहां भेजा, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. मदद की गुहार आई तो दरबार में दो नाम सामने थे- अबुल फजल और बीरबल.
अकबर की सबसे बड़ी भूल
अबुल फजल युद्ध और रणनीति में ज्यादा अनुभवी थे और खुद जाने को तैयार भी थे, लेकिन अकबर ने बीरबल को चुना और 8000 सैनिकों के साथ बाजौर भेज दिया. यहीं अकबर से बड़ी चूक हो गई. बीरबल बुद्धि और कूटनीति में माहिर थे, लेकिन युद्ध उनका मजबूत पक्ष नहीं था. बाद में यही फैसला अकबर को जीवन भर कचोटता रहा.
अंदरूनी कलह और घात
बीरबल और जैन खान कोका के रिश्ते पहले से अच्छे नहीं थे. बाजौर में भी दोनों की रणनीतियां टकराती रहीं. बीरबल ने पहाड़ी इलाकों को देखते हुए अलग योजना बनाई, लेकिन जैन खान इससे सहमत नहीं थे. इसी बीच अफगानी कबीलों ने मौका देखकर घात लगा ली. बलंदरी घाटी में, जहां मुगल सेना ने पड़ाव डाला था, वहां रात के अंधेरे में पत्थरों और तीरों से हमला कर दिया गया.
दर्दनाक अंत और गायब हुई लाश
अचानक हुए हमले में भारी तबाही मची. इतिहासकारों के मुताबिक, 8000 से ज्यादा मुगल सैनिक मारे गए. बीरबल भी इसी हमले में पत्थरों के नीचे दबकर मारे गए. पहाड़ी इलाका होने के कारण उनका शव कभी नहीं मिल सका. अकबर के शासनकाल की यह सबसे बड़ी सैन्य हार मानी जाती है.
अकबर का गहरा सदमा
अबुल फजल ने ‘अकबरनामा’ में लिखा है कि बीरबल की मौत ने अकबर को अंदर तक तोड़ दिया था. यहां तक कि बदायूंनी जैसे इतिहासकार, जो बीरबल से ईर्ष्या रखते थे, उन्होंने भी माना कि अकबर को किसी की मौत पर इतना टूटते नहीं देखा गया. बीरबल का अंतिम संस्कार तक न हो पाना अकबर के लिए सबसे बड़ा दुख था.
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