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क्या चांद पर मिली सुरंगों में जिंदा रह सकता है इंसान? वैज्ञानिकों ने क्या कहा

भारत, अमेरिका समेत कई अन्य देशों के अंतरिक्ष यात्री चांद तक पहुंच चुके हैं. लेकिन अब पहली बार चांद पर 100 मीटर लंबी सुरंग मिली है. माना जा रहा है कि इन सुरंग में इंसानी जीवन संभव है, खोज जारी है.

इंसान चांद तक पहुंच चुका है. लेकिन अभी तक इंसानों को चांद पर जीवन नहीं मिला है. चांद को जब आप धरती से देखते हैं, तो लगता है कि चांद पर पहुंचना और रहना संभव नहीं है. लेकिन आज भारत समेत दुनियाभर की कई स्पेस एजेंसी चांद तक पहुंच चुकी है. लेकिन अब पहली बार चांद पर वैज्ञानिकों को एक सुरंग दिखी है. माना जा रहा है इन सुरगों में इंसान जिंदा रह सकता है. आज हम आपको बताएंगे कि क्या सच में चांद पर इंसान जिंदा रह सकता है.   

चांद 

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा और भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो समेत कई अन्य देशों की स्पेस एजेंसी के वैज्ञानिक चांद तक पहुंच चुके हैं. लेकिन अब पहली बार वैज्ञानिकों ने चांद पर सुरंग खोजा है. बता दें कि दावा किया जा रहा है कि इन सुरंगों में इंसान लंबे समय तक जिंदा रह सकता है. आसान भाषा में वैज्ञानिकों का कहना है कि चांद पर मौजूद इन सुरंगों में जीवन है. वैज्ञानिकों के मुताबिक इस गुफा की गहराई करीब 100 मीटर से अधिक हो सकती है. बता दें कि यह भूमिगत गुफा चांद की सतह पर मौजूद सैकड़ों गुफाओं में से एक है. इन गुफाओं को लेकर वैज्ञानिक लगातार रिसर्च कर रहे हैं. जिससे ये पता किया जा सके कि गुफा के अंदर का स्‍ट्रक्‍चर कैसा है और वहां का तापमान और वातावरण कैसा है. 

चांद पर जीवन

चांद पर पहुंचने के बाद भी अभी तक चांद पर जीवन की संभावना नहीं दिख रही थी. लेकिन अब पहली बार गुफा दिखने के बाद फिर से वैज्ञानिक खोज कर रहे है कि वहां पर जीवन जीने की संभावना मिल सके. बीबीसी से बातचीत में अंतरिक्ष यात्री हेलेन शर्मन ने कहा कि यह गुफा देखने में तो काफी शानदार लगती है. मुझे लगता है क‍ि अगले 20-30 वर्षों में इंसान इन गड्ढों में आसानी से रह सकेंगे. यह गुफा इतनी गहरी है क‍ि अंतरिक्ष यात्रियों को इसमें उतरने के लिए जेट पैक या लिफ्ट का उपयोग करना पड़ सकता है. हालांकि अभी वैज्ञानिक ये पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि इन गुफाओं में इंसानी जीवन संभव है या नहीं. इसके लिए रिसर्च जारी है.

गुफा के अंदर क्या

अब सवाल ये है कि आखिर गुफा के अंदर क्या है. बता दें कि इटली की ट्रेंटो यूनिवर्सिटी के लोरेंजो ब्रुजोन और लियोनार्डो कैरर ने मैरे ट्रांक्विलिटिस नाम के चट्टानी मैदान पर इस गड्ढे को देखा और रडार की मदद से इसके अंदर भी गए थे. उनके मुताबिक इसे धरती से नंगी आंखों से देखा जा सकता है. यहीं पर 1969 में अपोलो 11 उतरा था. यह गुफा चांद की सतह पर एक रोशनदान की तरह नजर आती है. इसका निर्माण लाखों या अरबों वर्ष पहले हुआ था, जब चंद्रमा पर लावा बहकर आया था. जिस कारण तब चट्टान के बीच एक सुरंग बन गई थी. प्रोफेसर कैरर ने बताया क‍ि धरती पर इसके सबसे नजदीक स्‍पेन के लांजारोटे की ज्वालामुखीय गुफाएं होंगी.

वैज्ञानिकों का कहना है कि गुफा काफी बड़ी है. वैज्ञानिकों के मुताबिक यह इंसानों के रहने लायक सबसे अच्‍छी जगह हो सकती है. आख‍िरकार धरती पर भी तो जीवन गुफाओं से ही शुरू हुआ था. इसल‍िए हमें लगता है क‍ि चंद्रमा पर भी मनुष्‍य इन गुफाओं के अंदर रह सकते हैं. हालांकि अभी इसके अंदर जाना बाकी है. बता दें कि वैज्ञानिकों को लगभग 50 साल पहले पता लगा था क‍ि चंद्रमा पर गुफाएं हैं. फिर 2010 में लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर ने उन गड्ढों की तस्वीरें ली थी. 

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