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UP Elections: अखिलेश यादव के करहल सीट से चुनाव लड़ने के क्या मायने हैं, क्या है जातीय समीकरण और क्यों चुनी सेफ सीट

UP Elections: करहल विधानसभा सैफई के करीब है. यहां मुलायम सिंह के परिवार का काफी प्रभाव है. इस सीट पर 2007 से समाजवादी पार्टी का कब्जा है.

UP Assembly Elections: देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है. पहले चरण के चुनाव के लिए लगभग सभी पार्टियों के उम्मीदवारों के नाम तय हो गए हैं. इस बार सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी चुनाव मैदान में हैं, जिससे यूपी में सत्ता की लड़ाई बेहद दिलचस्प हो गई है. बड़ी बात यह है कि दोनों ही नेता सीएम पद के दावेदार हैं और पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए कमर कस रहे हैं.   

अखिलेश के इस फैसले के पीछे क्या है बड़ी वजह

अभी तक आजमगढ़ के सांसद रहे अखिलेश यादव ने इस पद को छोड़ने का फैसला किया है. अखिलेश मैनपुरी की करहल सीट से किस्मत आजमाएंगे. इस सीट पर मुहर मैनपुरी के विधायक, एमएलसी, जिला अध्यक्ष और कई स्थानीय नेताओं की सलाह के बाद लगी. करहल समाजवादी पार्टी का गढ़ है और यादव बाहुल्य ये सीट अखिलेश के लिए बेहद सुरक्षित मानी जा रही है.

अखिलेश यादव ने चुनाव लड़ने से तो पर्दा तो बुधवार को ही हटा दिया था, लेकिन सीट का सस्पेंस बना हुआ था. कल जब अखिलेश मीडिया के सामने आए तब भी उन्होंने सीट का ऐलान नहीं किया. हालांकि उनके बयान से ये इशारा जरूर मिल गया कि वो एक ऐसी सीट से मैदान में उतरने वाले हैं, जहां जीत की 100 फीसदी गारंटी हो.


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अखिलेश पर बीजेपी का तंज

अखिलेश की सीट का एलान होते ही बीजेपी ठीक वैसे ही हमलावर हो गई जैसे योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर सीट से लड़ने के बाद अखिलेश थे. डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने ट्वीट किया, ‘’मैनपुरी जनपद में करहल सहित सभी सीटों पर 2022 में खिलेगा कमल का फूल. लगेगा जीत का चौका. अखिलेश यादव जी ने विकास किया होता तो किसी शहरी सीट से लड़ते चुनाव. सुरक्षित सीट तलाशने के लिए गए मैनपुरी.’’

विपक्ष भले ही अखिलेश पर दबाव में चुनाव लड़ने का तंज कसे, लेकिन अखिलेश के मैदान पर उतरने से यूपी के चुनाव में कई और समीकरण भी तैयार होंगे, जो 10 मार्च के नतीजों को प्रभावित करने वाले होंगे. अखिलेश को लग रहा है कि चुनाव में एसपी बीजेपी को सीधी टक्कर दे रही है. सभी ओपिनियन पोल भी ऐसा दिखा रहे हैं, इसलिए सीधे रण में उतरकर अखिलेश गैर बीजेपी वोट का बंटवारा रोकने की कोशिश कर रहे हैं. अखिलेश के खुद मैदान में उतरने से पार्टी का मनोबल भी ऊपर जाएगा.

ABP न्यूज़- सी वोटर सर्वे में लोगों ने क्या कहा?

ABP न्यूज़ पर दिखाए गए सी वोटर के सर्वे भी ये सामने आया था, योगी के ऐलान के बाद अखिलश पर चुनाव लड़ने का प्रेशर बढ गया था. हमारे सर्वे में सवाल था कि क्या योगी के चुनाव लड़ने से अखिलेश यादव पर भी चुनाव लड़ने का दबाव बनेगा? इसके जवाब में-

  • 48 फीसदी ने माना कि दबाव बढ़ेगा.
  • जबकि 33 फीसदी लोग ऐसा नहीं मानते थे.
  • सिर्फ 19 फीसदी ने पता नहीं के ऑप्शन को चुना.

इसके अलावा सी वोटर के सर्वे में ये भी सामने आया था कि लोग भी अखिलेश को चुनावी के मैदान में देखना चाहते हैं. सर्वे में सवाल किया गया कि क्या अखिलेश यादव को भी विधानसभा चुनाव लड़ना चाहिए? इसके जवाब में-

  • 53 फीसदी लोगों ने हां कहा.
  • जबकि 29 फीसदी ने ना में जवाब दिया.
  • सिर्फ 18 फीसदी ने पता नहीं ऑप्शन चुना.


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करहल विधानसभा सीट के बारे में जानिए

करहल विधानसभा सैफई के करीब है. यहां मुलायम सिंह के परिवार का काफी प्रभाव है. इस सीट पर 2007 से समाजवादी पार्टी का कब्जा है. पिछले तीन बार से यहां से समाजवादी पार्टी के सोबरन यादव विधायक हैं. 2017 के चुनाव में मोदी-योगी की लहर के बावजूद करहल सीट पर समाजवादी पार्टी को लगभग आधे वोट यानी कुल पोल वोट का 49.81 फीसदी वोट मिला, जबकि बीजेपी के खाते में सिर्फ 31.45 फीसदी वोट गए थे और बीएसपी ने 14.18 फीसदी वोट ही हासिल किए थे.

साल 1957 से अब तक के चुनावी इतिहास की बात करें तो करहल की सीट भगवाधारियों को कभी रास नहीं आई है. यहां सिर्फ एक बार 2002 में ही बीजेपी को जीत नसीब हुई है.

अखिलेश ने करहल सीट पर मुहर क्यों लगाई?

करहल सीट पर तीसरे चरण में मतदान होगा, जबकि सीएम योगी की सीट पर छठें चरण में होना है. अखिलेश तीसरे चरण में फ्री होकर पूर्वांचल में ताकत झोकेंगें. दूसरी बड़ी वजह ये कि अगर सेफ सीट न होती तो प्रचार के लिए वक्त देना पड़ता. ऐसे में अपनी सीट के कारण दूसरे इलाकों की अनदेखी हो सकती थी.

करहल सीट का जातीय गणित कैसे अखिलेश यादव के लिए जीत की गारंटी माना जा रहा है?

चुनाव आयोग के मुताबिक करहल में कुल वोट 3.71 लाख हैं, जिसमें यादव करीब 1.44 लाख, शाक्य 35 हजार, क्षत्रिय 25 हजार, लोधी 11 हजार, मुस्लिम 14 हजार, ब्राह्मण 14 हजार और जाटव वोटों की संख्या 34 हजार है.

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