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कृषि यंत्र खरीदने से बेहतर है किराये पर लेना? सरकार कैसे करती है मदद

Renting Farming Machines: महंगे कृषि यंत्र खरीदने के बजाय उन्हें किराये पर लेना छोटे और मध्यम किसानों के लिए एक किफायती विकल्प है. इससे मशीनों की भारी-भरकम खरीद और रखरखाव के खर्च से बचा जा सकता है.

Farming Machines: एक समय था जब खेती में किसानों को बहुत ज्यादा मेहनत करनी होती थी. तब मशीनों की इतनी मौजूदगी भी नहीं होती थी और ना ही डिमांड. लेकिन आज का वक्त खेती में आधुनिकता ले आया है और अब खेती के लिए ट्रैक्टर, हार्वेस्टर या कल्टीवेटर जैसी तरह-तरह की मशीनें भी आ चुकी है. लेकिन बहुत सी मशीनें काफी महंगी होती हैं जिन्हें खरीदना कई किसानों के बस में नहीं होता. या फिर किस खरीद भी ले तो उन मशीनों की लागत नहीं निकाल पाते.

ऐसे में किसान अब किराए पर मशीन लेकर भी खेती कर रहे हैं. और उन्हें इस काम के लिए भारत सरकार की ओर से मदद भी दी जा रही है. देश में एक बड़ा टपका छोटे और सीमांत किसानों का है जिनके लिए किराए पर मशीन लेना मशीन खरीदने के मुकाबले काफी सस्ता पड़ जाता है. चलिए आपको बताते हैं सरकार की ओर से किसानों को मशीन किराए पर लेने के लिए किस तरह से मदद दी जा रही है. 

कृषि यंत्र खरीदने के बजाय किराए पर लेना क्यों सही?

जब आप खुद का ट्रैक्टर या कोई आधुनिक मशीन खरीदते हैं तो सिर्फ उसकी खरीद कीमत ही नहीं बल्कि लोन की ईएमआई, ब्याज और मेंटेनेंस का खर्च भी साथ आता है. साल में कुछ ही दिन काम आने वाले इन मशीनों पर इतने पैसे लगाना छोटे किसानों के लिए नुकसान का सौदा साबित हो सकता है. इसलिए किराए पर मशीनरी लेने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपको सिर्फ उतने ही समय का पैसा देना होता है जितने समय आपने काम लिया. 

न ही मशीन खराब होने का डर और न ही उसे पूरे साल संभालकर रखने का झंझट. इसके अलावा हर साल खेती की तकनीक बदलती रहती है. किराए पर मशीन लेने से किसान हमेशा लेटेस्ट और अपडेटेड मशीनों का इस्तेमाल कर सकता है. इस तरह किसान अपनी मेहनत की बचत को अच्छी क्वालिटी के बीज, खाद और सही सिंचाई में लगा सकता है. जिससे सीधे तौर पर उसकी फसल की पैदावार और मुनाफा दोनों काफी बढ़ जाते हैं.


कृषि यंत्र खरीदने से बेहतर है किराये पर लेना? सरकार कैसे करती है मदद

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जानिए सरकार कैसे करती है आपकी मदद

छोटे और सीमांत किसानों तक आधुनिक कृषि यंत्रों की पहुंच आसान बनाने के लिए सरकार ने कस्टम हायरिंग सेंटर यानी सीएचसी (CHC) की व्यवस्था की है. सरकार हर पंचायत स्तर पर ऐसे सेंटर खोल रही है जहां बुआई से लेकर कटाई तक के सभी जरूरी मशीनें उपलब्ध रहती हैं. सरकार इन सेंटरों को बनाने के लिए किसानों, किसान समूहों या एफपीओ को 40 प्रतिशत तक की सब्सिडी भी देती है. 

इन सेंटरों के जरिए किसान बहुत ही किफायती और तय सरकारी दरों पर ट्रैक्टर, रोटावेटर, रीपर और थ्रेशर जैसी बड़ी मशीनें किराए पर ले सकते हैं. इससे किसानों को महंगे किराएदारों के चक्कर नहीं काटने पड़ते. सीएचसी के जरिए अब गांव का छोटा से छोटा किसान भी अपने ही इलाके में कम खर्च में बड़ी-बड़ी मशीनों की मदद ले पा रहा है. जिससे खेती की लागत में भारी गिरावट आई है और काम भी समय पर पूरा हो जाता है.


कृषि यंत्र खरीदने से बेहतर है किराये पर लेना? सरकार कैसे करती है मदद

FARMECH पोर्टल से ऐसे उठाएं लाभ

किराए पर कृषि मशीन लेने की पूरी प्रोसेस को आसान बनाने के लिए सरकार ने डिजिटल तकनीक का सहारा लिया है. किसान अब घर बैठे अपने मोबाइल फोन से ही सरकारी पोर्टल (जैसे farmech) या दूसरी मोबाइल ऐप के जरिए मनचाही मशीन बुक कर सकते हैं. इस ऑनलाइन सिस्टम से किसानों को यह फायदा हुआ है कि उन्हें तुरंत पता चल जाता है कि नजदीकी कस्टम हायरिंग सेंटर में कौन सी मशीन खाली मौजूद है. 

ऐप के जरिए किराए की जानकारी मिलती है जिससे कोई भी आपसे ज्यादा पैसे नहीं वसूल सकता. अगर कोई किसान समूह खुद का कस्टम हायरिंग सेंटर खोलना चाहता है. तो वह भी राज्य कृषि विभाग की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकता है. इस पूरी डिजिटल पहल से किसानों को बिना किसी भागदौड़ के सीधे उनके खेत तक आधुनिक तकनीक बहुत ही कम दाम में आसानी से मिल पा रही है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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