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Save Soil Save Life: 45 साल बाद फिर जीवित हुआ 'मिट्टी बचाओ आंदोलन', जानें इसकी खास बातें

Top Trending: मिट्टी की बिगड़ती सेहत के लिये मिट्टी बचाओ आंदोलन का दोबारा जीवित होना इंसान के बेहतर भविष्य के लिये बेहद जरूरी है.

Save Soil Movement: आज पूरी दुनिया पर्यावरण के प्रति बढ़ती चिंताओं को समझने और मिट्टी बचाने के उपाय खोजने के लिये विश्व पर्यावरण दिवस मना रहा है. इस मौके पर भारत की राजधानी दिल्ली में 'मिट्टी बचाओ आंदोलन' नामक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया. इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिट्टी के लिये जैविक खेती के महत्व और मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी योजनाओं पर भी बात की, मिट्टी बचाओ आंदोलन में गंगा नदी के किनारे गंगा की उपजाऊ मिट्टी  में खेती करने के लिये भी प्रोत्साहित किया. 

जाहिर है कि दुनियाभर में बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग ने मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को काफी हद तक प्रभावित किया है. रिसर्च के मुताबिक, आज दुनिया में सिर्फ 52%  मिट्टी ही खेती लायक बची है, जिसकी क्वालिटी भी बढ़ते रसायनों के प्रयोग से घटती जा रही है. ऐसे में किसानों को इस समस्या के प्रति जागरुक करने और जैविक खेती के जरिये और दूसरे जैव उपायों के जरिये मिट्टी बचाओ आंदोलन नामक कार्यक्रम चलाया जा रहा है. 

क्या है मिट्टी  बचाओ आंदोलन 
मिट्टी बचाओं आंदोलन को मिट्टी में बढ़ते प्रदूषण और रसायनों के प्रयोग उसी घटती क्लाविटी के प्रति किसानों के सजग करने के लिये चलाये जाना वाला जागरुकता कार्यक्रम है. लेकिन इसकी शुरूआत वर्ष 1977 में ही हो चुकी थी. दरअसल, ये कहानी मध्य प्रदेश के होशंगाबाद से शुरू हुई. यहां स्थित तवा बांध के पानी से कई गावों के लिये मुश्किल पैदा हो रही थी. जिसकी लवणता से कृषि योग्य मिट्टी दलदल होती जा रही थी. वहां अधिक जल भराव के कारण किसानों को खेती करने में भी समस्यायें आ रही थीं. इस समस्या को रोकने के लिये मिट्टी बचाओ आंदोलन की शुरूआत हुई. आज बेशक कारण अलग है, लेकिन मिट्टी की बिगड़ती सेहत के लिये इस कार्यक्रम का दोबारा जीवित होना इंसान के बेहतर भविष्य के लिये बेहद जरूरी है.


Save Soil Save Life: 45 साल बाद फिर जीवित हुआ 'मिट्टी बचाओ आंदोलन', जानें इसकी खास बातें

मिट्टी बचाओ आंदोलन का मकसद
आज पर्यावरण में बढ़ते प्रदूषण के कारण मिट्टी की घटती क्वालिटी को पुर्जीवित करना ही आंदोलन का एक मात्र उद्देश्य है. हालांकि इसके लिये सरकार कई नीतिगत सुधार कर रही है, जिसके तहत खेती करने के लिये मिट्टी में जैवित तत्वों की मात्रा को बढ़ाकर उसे फिर से कृषि योग्य बनाना है. हालांकि इस समस्या के समाधान के लिये सरकार ने साल 2015 में मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना की शुरूआत की. इस योजना के तहत किसान मिट्टी की जांच करवाके उसका हाल जान सकते हैं और जरूरत के अनुसार पोषक तत्वों से मिट्टी को फिर उपजाऊ बना सकते  हैं.

मिट्टी को बचाने के लिये वैश्विक अभियान
जानकारी के लिये बता दें कि मिट्टी बचाओ आंदोलन सिर्फ भारत के लिये नहीं बल्कि दुनियाभर के देशों के लिये जरूरी हो गयाा है. संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार खेती में बढ़ते रसायनों के उपयोग के कारण मिट्टी बंजर होती जा रही है. वैज्ञानिकों की मानें तो अब दुनियाभर में सिर्फ 52-60 प्रतिशत जमीन ही खेती योग्य बची है. ऐसे में अगर तुरंत रसायनिक उर्वरकों और कीटनशकों के इस्तेमाल को रोका नहीं गया तो मिट्टी की उर्वरता विलुप्ति की कगार पर आ जायेगी. इससे दुनियाभर में भोजन की कमी तो आयेगी ही, साथ ही इससे गृह युद्ध और विश्वयुद्ध जैसी संभावनायें छिड़ने के भी आसान बढ़ जायेगें.

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