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क्या मैदानों में भी हो सकती है पिस्ता और बादाम की खेती? तरीका जान लेंगे तो लखपति बनने में नहीं लगेगा टाइम

Pistachio And Almond Cultivation: अब मैदानी इलाकों में भी बादाम और पिस्ता की खेती मुमकिन है. खास हाइब्रिज वैरायटी और सही जल निकास वाली मिट्टी का इस्तेमाल करके किसान बंपर मुनाफा कमा सकते हैं.

Pistachio And Almond Cultivation: जब भी पिस्ता और बादाम का नाम आता है तो हमारे दिमाग में कश्मीर, हिमाचल या कैलिफोर्निया के ठंडे पहाड़ों की तस्वीरें घूमने लगती हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि अब बदलते वक्त और नई एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी के कारण इन महंगे ड्राई फ्रूट्स की खेती भारत के मैदानी इलाकों में भी मुमकिन हो चुकी है. 

मैदानी राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई प्रगतिशील किसान अब पिस्ता और बादाम की खेती का सफल ट्रायल कर चुके हैं. अगर आप भी अपनी खेती से तगड़ी कमाई करना चाहते हैं. तो चलिए आपको बताते हैं कि मैदानी इलाकों में यह खेती कैसे मुमकिन है.

मैदानी इलाकों के लिए बादाम की सही वैरायटी

मैदानी इलाकों में बादाम उगाने के लिए सबसे जरूरी है सही वैरायटी का चुनाव करना क्योंकि पहाड़ों वाले बादाम गर्म मौसम को बर्दाश्त नहीं कर पाते. कृषि वैज्ञानिकों ने मैदानी क्षेत्रों की गर्मी को झेलने के लिए गुरबंदी, कैलिफोर्निया पेपर शेल और प्लस अल्ट्रा जैसी खास वैरायटी तैयार की हैं. जो 40 से 45 डिग्री तापमान में भी बेहतरीन फल देती हैं. 

इस तरीके से उगाएं बादाम

इसकी खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी सबसे बेस्ट मानी जाती है. क्योंकि बादाम के पौधों की जड़ों में पानी जमा होना दुश्मन की तरह है. इसके पौधों को शुरुआत में थोड़ी केयर और ग्राफ्टिंग तकनीक की जरूरत होती है और रोपने के लगभग 3 से 4 साल बाद यह पेड़ आपको सालों साल छप्परफाड़ कमाई देने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं.

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पिस्ता की खेती  

पिस्ता की बात करें तो यह एक ऐसा ड्राई फ्रूट है जो बहुत ही सख्त जान होता है और इसे बढ़ने के लिए सर्दियों में हल्की ठंड और गर्मियों में तेज धूप की जरूरत होती है. भारत के मैदानी इलाकों का मौसम पिस्ता की कुछ खास हाइब्रिड वैरायटियों के लिए बिल्कुल परफेक्ट बैठता है. पिस्ता के पौधों को बहुत ही कम पानी की आवश्यकता होती है. जिससे यह कम सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए भी एक बेहतरीन और मुनाफेदार सौदा साबित होता है. 

मैदानी राज्यों में इसका स्कोप

इसके बाग लगाने के लिए आपको नर और मादा पौधों का सही अनुपात जैसे 10 मादा पौधों पर 1 नर पौधा रखना होता है जिससे पॉलिनेशन सही से हो सके. हालांकि इसके पेड़ फल देने में 5 से 6 साल का वक्त लेते हैं. लेकिन एक बार प्रोडक्शन शुरू होने पर मार्केट में इसकी भारी डिमांड आपको लाइफटाइम का तगड़ा रिटर्न देती है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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