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डीजल से कैसी होती है सेब की खेती, जान लें किस काम में पड़ती है जरूरत?

Diesel Use In Apple Farming: पहाड़ों पर सेब उगाने में डीजल का रोल बहुत बड़ा है. बागों की जुताई से लेकर स्प्रे मशीनों को चलाने तक यह ईंधन हर कदम पर काम आता है. बिना इसके सेब की खेती नहीं हो सकती.

Diesel Use In Apple Farming Tips: पहाड़ों की ठंडी वादियों में सेब की खेती सुनने में जितनी सुकून भरी लगती है. इसका तरीका उतना ही पेचीदा है. अक्सर हमें लगता है कि सेब उगाने के लिए सिर्फ अच्छी मिट्टी और ठंडे मौसम की जरूरत होती है. लेकिन असलियत में और भी चीजें इसमें जरूरी होती हैं. सेब की खेती में डीजल भी बहुत जरूरी है.

डीजल सेब के बागों में यह एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है. खास तौर पर कीटों के हमले को रोकने और पेड़ों को स्वस्थ रखने के लिए डीजल का इस्तेमाल एक खास तकनीक के तहत किया जाता है. आधुनिक बागवानी में स्प्रे की प्रक्रिया इतनी जरूरी है कि बिना डीजल के सही समय पर कीट नियंत्रण करना लगभग नामुमकिन हो गया है. जान लें पूरी खबर.

कीटों के खात्मे के लिए डीजल का यूज

सेब के पेड़ों में सैं जोस स्केल जैसे जिद्दी कीटों का खतरा हमेशा बना रहता है जो पेड़ों का रस चूसकर उन्हें सुखा देते हैं. इन कीटों से निपटने के लिए बागवान हॉर्टिकल्चर मिनरल ऑयल के साथ या कभी-कभी इसके ऑप्शन के तौर पर डीजल का इस्तेमाल करते हैं.

डीजल कीटों की सांस नली को बंद कर देता है जिससे वे बिना किसी जहरीले रसायन के भी खत्म हो जाते हैं. यह विधि बागवानों के बीच काफी लोकप्रिय है क्योंकि यह न केवल प्रभावी है. बल्कि पारंपरिक कीटनाशकों के मुकाबले एक अलग और कारगर ऑप्शन के तौर पर काम आती है.

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डोरमेंसी स्प्रे में इस्तेमाल

सर्दियों के मौसम में जब सेब के पेड़ सुप्तावस्था में होते हैं तब डीजल स्प्रे का सबसे सही समय होता है. इस दौरान बागवान पानी, डीजल और इमल्सीफायर का एक सटीक मिश्रण तैयार करते हैं और इसे पूरे पेड़ पर छिड़कते हैं. यह स्प्रे पेड़ों की टहनियों पर छिपे कीटों के अंडों और लार्वा को पूरी तरह खत्म कर देता है.

जिससे वसंत के मौसम में नई कोपलें आने पर कीटों का हमला न हो सके. यह एक तरह का प्री-प्रिवेंशन स्टेप है. जिसमें डीजल का सही मिश्रण ही यह तय करता है कि आने वाले सीजन में फसल कितनी सुरक्षित रहेगी.

हाई-प्रेशर स्प्रे मशीनों के लिए भी जरूरी

सेब के ऊंचे और घने पेड़ों पर छिड़काव करना कोई आसान काम नहीं है इसके लिए पावरफुल स्प्रेयर मशीनों की जरूरत होती है. इन हाई-प्रेशर मशीनों और ऑटोमैटिक स्प्रे पंपों को चलाने के लिए डीजल ही जरूरी है. अगर स्प्रे के पीक सीजन में डीजल की किल्लत हो जाए. तो बागों में दवा छिड़कने का काम बीच में ही रुक सकता है. सही समय पर स्प्रे न होने का मतलब है कीटों को फैलने का मौका देना जिससे पूरी फसल तबाह हो सकती है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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