क्या पिता की मौत के बाद बेटी की NOC के बिना मां बेटे को दे सकती है फ्लैट?
पति-पत्नी के संयुक्त नाम वाले फ्लैट में पति की मृत्यु के बाद संपत्ति के अधिकार कानूनी उत्तराधिकार और वसीयत पर निर्भर करते हैं. आइए जानते हैं क्या पत्नी बेटी की NOC बिना फ्लैट गिफ्ट कर सकती है.

Property Rules News: अगर कोई फ्लैट पति और पत्नी दोनों के नाम पर हैं और पति की मौत हो जाती है, तो पत्नी के नाम फ्लैट आने के बाद क्या वो अपनी बेटी की एनओसी के बिना फ्लैट बेटे को गिफ्ट कर सकती है. इस सवाल का जवाब जायदाद के हक और वसीयत की हालात पर डिपेंड करता है.
पति-पत्नी की बराबर हिस्सेदारी
जानकारी के हिसाब से , अगर फ्लैट पति और पत्नी दोनों के नाम है और बेचने के डॉक्यूमेंट्स में दोनों की हिस्सेदारी अलग-अलग नहीं बताई गई है, तो दोनों की हिस्सेदारी बराबर मानी जाएगी. पति की मौत के बाद हाउसिंग सोसायटी नाम के आधार पर शेयर सर्टिफिकेट से उनका नाम हटा सकती है और पत्नी का नाम दर्ज कर सकती है.
लेकिन, सिर्फ नॉमिनी बनने से पत्नी फ्लैट की पूरी मालिक नहीं बन जातीं. सोसायटी के पास वसीयत सही है या नहीं, ये फिक्स करने का अधिकार नहीं होता. नॉमिनी का काम आमतौर पर मरने वाले व्यक्ति के घर-मकान या पैसे को उसके वारिसों के लिए संभालना होता है.
वसीयत होने पर क्या होगा?
अगर पति ने वसीयत छोड़ी है, चाहे वो रजिस्टर्ड नहीं हो, तो वसीयत के आधार पर आगे की कानूनी प्रोसेस पूरी करनी होगी. वसीयत के प्रोसेस में बच्चों से सहमति का हलफनामा लिया जा सकता है. इसमें बच्चे बताते हैं कि उनके पिता ने सही वसीयत छोड़ी थी और उन्हें उस वसीयत या उसे मंजूरी देने की प्रोसेस पर कोई एतराज नहीं है.
वसीयत का आदेश मिलने के बाद पत्नी को सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में ट्रांसफर डीड रजिस्टर करानी होगी. इसके बाद वो फ्लैट की अकेली मालिक बन सकती हैं.एक बार पत्नी के नाम पूरा मालिकाना हक आ जाने के बाद वो फ्लैट बेचने या किसी को गिफ्ट करने का फैसला खुद ले सकती हैं.
बेटी की NOC जरूरी है या नहीं?
अगर पत्नी कानूनी प्रोसेस पूरी करके फ्लैट की अकेली मालिक बन जाती हैं, तो वो अपने बेटे के नाम गिफ्ट डीड कर सकती हैं.ऐसे हालात में बेटी की एनओसी की जरूरत नहीं होगी.यानी मां अपने बेटे को फ्लैट गिफ्ट कर सकती हैं, भले ही बेटी विदेश में रहती हो या उसने कोई एनओसी न दी हो.
दिसंबर 2025 से वसीयत को लेकर कानून में बदलाव किया गया है और इसे जरूरी बनाने वाले पुराने इंतजाम को हटाया गया है. लेकिन अपनी इच्छा से वसीयत को अदालत से मंजूरी दिलाना अभी भी अच्छा माना जाता है. इससे वसीयत सही हो जाती है और आगे घर-मकान को लेकर कोई झगड़ा होने पर कानूनी मदद मिलती है.





















