Solar Panel खराब होने के बाद कहां जाते हैं? सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई
Solar Panel: सोलर पैनलों की औसतन उम्र करीब 25 से 30 साल होती है.

- पेरोव्स्काइट सेल्स से सीसा गर्म पानी से आसानी से मिलेगा।
Solar Panel: आज सोलर एनर्जी को साफ और टिकाऊ ऑप्शन के रूप में देखा जा रहा है. आज ज्यादातर घरों की छतों से लेकर बड़े-बड़े सोलर पार्क तक, हर जगह सोलर पैनल बिजली बनाने का काम कर रहे हैं. लेकिन सोलर पैनल के बढ़ते क्रेज के साथ एक सवाल भी पैदा हो रहा है कि जब ये पैनल अपनी उम्र पूरी कर लेते हैं, तब उनका क्या होता है? आइए जानते हैं क्या है इसकी पूरी सच्चाई.
सोलर पैनल बनने के बाद कहां जाते हैं
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सोलर पैनलों की औसतन उम्र करीब 25 से 30 साल होती है. इसके बाद उनकी बिजली बनाने की ताकत धीरे-धीरे कम होने लगती है और आखिरकार उन्हें बदलना पड़ता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक साल 2050 तक दुनिया में 8 करोड़ मीट्रिक टन से ज्यादा पुराने और बेकार सोलर पैनलों का कचरा जमा हो सकता है.
अगर इनको सही तरीके से खत्म या रीसाइक्लि नहीं किया गया तो ये लैंडफिल में पहुंचकर पर्यावरण के लिए नई समस्या बन सकते हैं. साथ ही इनमें मौजूद कई कीमती धातुएं भी हमेशा के लिए बेकार हो जाएंगी.

अभी कैसे होती है रीसाइक्लिंग
आपको बता दें कि ज्यादातर रीसाइक्लिंग सेंटर सोलर पैनलों से एल्यूमिनियम फ्रेम, कांच और तांबे जैसी आसानी से अलग होने वाली चीजों को निकाल लेते हैं. लेकिन अंदर मौजूद कीमती धातुओं को निकालना अभी भी काफी मुश्किल और महंगा काम है. यही वजह है कि पैनल का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह दोबारा इस्तेमाल में नहीं आ पाता है.
सोलर पैनलों में छिपे होते हैं कई कीमती चीजें
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि सोलर पैनल सिर्फ कांच और धातु से बने होते हैं लेकिन असल में इनके अंदर कई जरूरी चीजें मौजूद होती हैं. इनमें चांदी (Silver), इंडियम (Indium), गैलियम (Gallium), टेल्यूरियम (Tellurium), सीसा (Lead), तांबा (Copper), एल्यूमिनियम (Aluminum) और कांच जैसे मटेरियल शामिल हैं.
इन चीजों को निकालने के लिए खनन में काफी बिजली और रिसोर्सेज खर्च होते हैं. इसलिए अगर इन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जाए तो नैचुरल रिसोर्सेज की बचत के साथ लागत भी कम हो सकती है.
क्या होता है प्रोसेस
फिलहाल कई जगहों पर रीसाइक्लिंग के लिए पायरोमेटलर्जी (Pyrometallurgy) टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें लगभग 2,000 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान पैदा करके अलग-अलग पदार्थों को पिघलाया जाता है. हालांकि ये तरीका काफी कारगर है लेकिन इसमें भारी मात्रा में बिजली खर्च होती है. साथ ही कई बार अलग-अलग धातुओं को सहरी तरीके से अलग करना भी काफी मुश्किल हो जाता है.
नई टेक्नोलॉजी दे सकती है बेहतर सॉल्यूशन
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी टैन्डन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग के वैज्ञानिकों का मानना है कि हाइड्रोमेटलर्जी (Hydrometallurgy) आने वाले समय में एक बेहतर ऑप्शन बन सकती है. इस टेक्नोलॉजी में बहुत ज्यादा गर्मी की बजाय स्पेशल कैमिकल का इस्तेमाल किया जाता है जो केवल चुनिंदा धातुओं को घोल देता है. बाद में इन धातुओं को प्योर करके दोबारा नए प्रोडक्ट को बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है.

कम तापमान पर होने के कारण इस प्रोसेस में बिजली की खपत भी कम होती है और कीमती धातुओं की रिकवरी बेहतर तरीके से होती है.
नई जनरेशन के पैनल आसान बना सकते हैं काम
आपको बता दें कि वैज्ञानिकों का ध्यान अभी फिलहाल पेरोव्स्काइट (Perovskite) सोलर सेल्स पर है. ये टेक्नोलॉजी कम लागत और बेहतर एफिशिएंसी के कारण तेजी से फेमश हो रही है. रिसर्च में पाया गया है कि इन सेल्स में मौजूद सीसा (Lead) जैसी धातु को कई मामलों में केवल गर्म पानी की मदद से भी अलग किया जा सकता है. पानी ठंडा होने पर सीसा क्रिस्टल के रूप में वापस मिल जाता है जिसे नए पेरोव्स्काइट सोलर सेल बनाने में दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है.
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