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Tech Explained: GPS Jamming क्या होती है और यह स्पूफिंग से कैसे अलग है? विस्तार से समझें

GPS Jamming: ईरान युद्ध के दौरान GPS सिग्नल को हथियार के तौर पर यूज किया जा रहा है. इस कारण नेविगेशन मुश्किल हो गया है और शिप्स के रास्ता भटकने का खतरा बढ़ गया है.

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GPS Jamming: अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध सिर्फ मिसाइलों और बमों से नहीं लड़ा जा रहा है. दोनों ही तरफ से फिजिकल वारफेयर के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर भी जारी है. ताजा मामला GPS Jamming का है, जिसके चलते समुद्री और हवाई जहाजों को नेविगेशन में चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. GPS Jamming के कारण समुद्री जहाज एयरपोर्ट, जमीन और न्यूक्लियर पावर प्लांट के पास दिखाई दे रहे हैं. दरअसल, इस युद्ध में GPS सिग्नल को एक हथियार के तौर पर यूज किया जा रहा है. हाल में आई एक रिपोर्ट में दिखाया गया था कि समुद्री जहाजों के GPS सिग्नल को रीड करने पर पता चलता है कि ये एक ही जगह गोल-गोल चक्कर लगा रहे हैं. इसी तरह हवाई जहाज भी एक ही जगह पर भटकते दिख रहे हैं. आखिर में यह सब कैसे हो रहा है. GPS Jamming क्या होती है और GPS स्पूफिंग से कैसे अलग है? आज के टेक एक्सप्लेनर में हम इन सवालों का जवाब लेकर आए हैं

GPS Jamming क्या है?

जब नेविगेशन और ट्रैकिंग को पटरी से उतारने के लिए GPS सिग्नल से जानबूझकर छेड़छाड़ की जाती है तो उसे GPS जैमिंग कहा जाता है. इससे समुद्री और हवाई जहाजों के लिए नेविगेट करना मुश्किल हो जाता है. अलग-अलग सिग्नल के कारण उनके लिए कंफ्यूजन की स्थिति पैदा हो जाती है. मूवमेंट रोकने, सेंसेटिव ऑपरेशन को प्रोटेक्ट करने और मिलिट्री के साथ-साथ सिविल नेविगेशन सिस्टम में खलल डालने के लिए GPS जैमिंग का सहारा लिया जाता है.

कैसे होती है GPS Jamming?

शिप और एयरक्राफ्ट दोनों ही पॉजिशन, नेविगेशन और टाइमिंग के लिए ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) पर निर्भर होते हैं. अमेरिका का ग्लोबल पॉजिशिनिंग सिस्टम (GPS) सबसे पॉपुलर GNSS है. इस सिस्टम में ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ सैटेलाइट भी काम करते हैं, जो लगातार जमीन पर सिग्नल भेजते रहते हैं. शिप्स और एयरक्राफ्ट में सिग्नल रिसीव करने के लिए रिसीवर लगे होते हैं. दूरी के कारण सैटेलाइट सिग्नल कमजोर होते हैं और इनमें छेड़छाड़ की जा सकती है. जैमर की मदद से इन्हें कमजोर कर ज्यादा पावर वाले सिग्नल रिसीवर के पास भेजे जाते हैं.

GPS स्फूफिंग क्या होती है और जैमिंग से कैसे अलग?

GPS जैमिंग और स्पूफिंग दोनों ही सिग्नल से छेड़छाड़ करने के तरीके हैं, लेकिन स्पूफिंग ज्यादा खतरनाक है. जैमिंग में जहां जैमर की मदद से सिग्नल से छेड़छाड़ की जाती है. इससे शिप या एयरक्राफ्ट के पास सटीक लोकेशन नहीं पहुंच पाती, जिससे नेविगेशन और ट्रैकिंग मुश्किल हो जाती है. वहीं स्पूफिंग में GPS सिग्नल की नकल कर एयरक्राफ्ट और शिप्स को उनकी लोकेशन के बारे में गलत जानकारी दी जाती है. इससे उन्हें लग सकता है कि वो किसी और लोकेशन पर है. जैमिंग में सिग्नल कमजोर होकर गायब हो जाता है, वहीं स्पूफिंग में गलत जानकारी देकर मिसलीड किया जाता है. 

ईरान युद्ध के बाद से बढ़ी जैमिंग की घटनाएं

मैरीटाइम कंपनी विंडवार्ड के अनुसार, ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से GPS सिग्नल से छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ चुकी हैं और इनमें कई गुना इजाफा देखा गया है. इस कंपनी ने सऊदी अरब, कुवैत, यूएई, कतर, ओमान और ईरान में जमीन और पानी पर 30 से ज्यादा जैमिंग कलस्टर देखे हैं. सैटेलाइट इमेज से पता चलता है कि ये शिप के सिग्नल को अलग-अलग लोकेशन में थ्रो कर रहे हैं, जिससे शिप्स को एक घेरे में घूमते हुए और एयरक्राफ्ट को जिग-जैग पैटर्न में उड़ते हुए देखा जा सकता है. हालांकि, अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि सिग्नल से छेड़छाड़ कौन कर रहा है, लेकिन कई रिपोर्ट्स में ईरान को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. ईरान ने यह धमकी भी दी थी कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाली समुद्री जहाजों को वह निशाना बनाएगा.

सिग्नल से छेड़छाड़ होने से क्या खतरे?

शिप या एयरक्राफ्ट को अगर गलत लोकेशन डेटा दिखाया जाए तो इनके रास्ते भटकने का खतरा रहता है. समुद्री जहाज एक-दूसरे से टकरा सकते हैं. साथ ही दुनिया के सबसे व्यस्त रास्तों पर फेक इमरजेंसी अलर्ट बढ़ सकते हैं. 

क्या यह पहली बार हो रहा है?

GPS सिग्नल को डिस्टर्ब करने का यह पहला मामला नहीं है. युद्ध वाले इलाकों में मिसाइलों और ड्रोन्स आदि के नेविगेशन सिस्टम को कंफ्यूज करने के लिए पहले भी ऐसी घटनाएं होती रही हैं. रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में पहली बार बड़े स्तर पर ड्रोन का यूज हुआ था. यहां भी GPS सिग्नल्स को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया था. ईरान युद्ध से पहले भी इजरायल के साथ संघर्ष में GPS सिग्नल से छेड़छाड़ के मामले सामने आए थे. 

क्या भारत में भी ऐसी कोई घटना हुई है?

भारत भी GPS स्पूफिंग की घटनाओं से अछूता नहीं है. पिछले साल नवंबर में दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से उड़ने वाली करीब 800 उड़ानें प्रभावित हुई थीं. इसके पीछे साइबर स्पूफिंग को जिम्मेदार माना गया था. इसके अलावा नवंबर, 2023 से लेकर फरवरी, 2025 के बीच अमृतसर और जम्मू सहित बॉर्डर एरिया पर GPS सिग्नल से छेड़छाड़ के 465 मामले सामने आए थे.

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