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10 दिन में 200 टारगेट! क्या है Gospel, इजरायल का वो AI हथियार जो बदल रहा है युद्ध का तरीका?

Gospel AI: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और संघर्ष के बीच आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है.

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  • AI युद्ध में नैतिकता और जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।

Gospel AI: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और संघर्ष के बीच आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. जहां पहले खुफिया जानकारी जुटाने और संभावित टारगेट पहचानने में इंसानों को महीनों लग जाते थे वहीं अब यह काम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए बेहद तेजी से किया जा रहा है. इसी तकनीक का एक अहम उदाहरण इजरायल की सेना द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा AI सिस्टम Unit 8200 और उससे जुड़ा टूल Habsora (The Gospel) है. यह सिस्टम बड़ी मात्रा में डेटा को कुछ ही समय में प्रोसेस कर युद्ध से जुड़े संभावित ठिकानों और गतिविधियों की पहचान करने में मदद करता है.

क्या है Gospel AI सिस्टम

Gospel दरअसल एक एडवांस डेटा-एनालिसिस प्लेटफॉर्म है जिसे Israel Defense Forces के लिए विकसित किया गया है. इसका मुख्य काम अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाली सूचनाओं का विश्लेषण करके संभावित सैन्य टारगेट की पहचान करना है.

इस तकनीक की खासियत इसकी स्पीड और डेटा प्रोसेसिंग क्षमता है. जहां पारंपरिक तरीके से खुफिया टीम को किसी लक्ष्य की पुष्टि करने में काफी समय लगता था वहीं यह सिस्टम कुछ ही दिनों में सैकड़ों संभावित ठिकानों की पहचान कर सकता है.

अलग-अलग स्रोतों से डेटा इकट्ठा करता है सिस्टम

Gospel कई प्रकार की जानकारी को एक साथ जोड़कर विश्लेषण करता है. इसमें सैटेलाइट तस्वीरों से लेकर ड्रोन से मिलने वाले लाइव वीडियो तक शामिल होते हैं. इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल, फोन या रेडियो कम्युनिकेशन से जुड़े संकेत और पहले से मौजूद खुफिया डेटाबेस भी इसमें जोड़े जाते हैं.

इन सभी जानकारियों को मिलाकर सिस्टम यह अनुमान लगाने की कोशिश करता है कि किसी इलाके में कमांड सेंटर, हथियारों का भंडार या रॉकेट लॉन्चर जैसी सैन्य गतिविधियां मौजूद हैं या नहीं.

बेहद तेजी से तैयार होते हैं टारगेट

पारंपरिक सैन्य खुफिया प्रक्रिया में कई विशेषज्ञों की टीम सालभर में सीमित संख्या में टारगेट पहचान पाती थी. लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक Gospel सिस्टम कुछ ही दिनों में बड़ी संख्या में संभावित लक्ष्य सामने ला सकता है. इसी वजह से इसे कई बार टारगेट फैक्ट्री भी कहा जाता है, क्योंकि यह लगातार डेटा का विश्लेषण कर नए-नए संभावित टारगेट सुझाता रहता है.

Lavender सिस्टम से भी जुड़ा है यह नेटवर्क

यह AI तकनीक अकेले काम नहीं करती. इसके साथ एक अन्य सिस्टम Lavender का भी जिक्र किया जाता है जो लोगों से जुड़े डेटा का विश्लेषण करके यह अनुमान लगाने की कोशिश करता है कि किसी व्यक्ति का संबंध संदिग्ध गतिविधियों से है या नहीं. इस तरह AI आधारित अलग-अलग सिस्टम मिलकर युद्ध में जानकारी जुटाने और निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज बनाते हैं.

AI आधारित युद्ध पर उठ रहे हैं सवाल

हालांकि इस तकनीक ने सैन्य रणनीति को पहले से ज्यादा तेज और प्रभावी बनाया है लेकिन इसके साथ कई नैतिक और कानूनी सवाल भी उठ रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि AI सिस्टम डेटा के आधार पर निर्णय लेते हैं लेकिन वे हमेशा जमीन पर मौजूद जटिल परिस्थितियों को पूरी तरह समझ नहीं पाते.

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि अगर किसी एल्गोरिदम की वजह से गलत टारगेट चुना जाता है या किसी नागरिक को नुकसान पहुंचता है तो इसकी जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो सकता है.

बदल रहा है आधुनिक युद्ध का चेहरा

AI तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल यह दिखाता है कि भविष्य के युद्ध पहले से कहीं ज्यादा डिजिटल और डेटा-आधारित हो सकते हैं. Gospel जैसे सिस्टम यह साबित करते हैं कि तकनीक की मदद से सैन्य रणनीति तेज हो सकती है, लेकिन इसके साथ जुड़े नैतिक और सुरक्षा सवालों पर भी दुनिया भर में चर्चा जारी है.

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