सही लोकेशन नहीं बता पा रहा नेविगेशन सिस्टम NavIC, आई ये दिक्कत
NavIC Navigation System: भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC इस समय नेविगेशन सर्विसेस प्रोवाइड नहीं करवा पा रहा है. इसके लिए जरूरी चार सैटेलाइट्स में से एक में खराबी आ गई है.

- NavIC फिलहाल तीन उपग्रहों से सीमित सेवाएं प्रदान कर रहा।
- सटीक नेविगेशन हेतु कम से कम चार उपग्रह आवश्यक होते हैं।
- इसरो नए NVS उपग्रहों से स्वदेशी नेविगेशन मजबूत करेगा।
NavIC Navigation System: भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC अपनी पूरी कैपेबिलिटी से काम नहीं कर रहा है. सरकार ने बताया है कि इसके ऑपरेशन के लिए जरूरी सैटेलाइट की संख्या कम हो गई है. अभी यह सिस्टम केवल तीन सैटेलाइट सिस्टम IRNSS-1B, IRNSS-1I और NVS-01 के साथ ही काम कर रहा है, जिसकी मदद से केवल पोजिशन, नेविगेशन और टाइमिंग सर्विसेस मिल सकती हैं. इसके चौथे सैटेलाइट IRNSS-1F की एटॉमिक क्लॉक में मार्च में खराबी आ गई थी, जिसके कारण यह अभी ठीक से काम नहीं कर रहा. इसका असर लोकेशन सर्विस पर पड़ेगा. इसका मतलब है कि यह सैटेलाइट यूजर की सटीक लोकेशन का पता नहीं लगा सकता. हालांकि, इससे स्मार्टफोन यूजर्स पर तुरंत कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन यह स्वदेशी नेविगेशन नेटवर्क के लिए एक चिंता का सबब जरूर बन गया है. आइए जानते हैं कि NavIC सिस्टम क्या है, इसके लिए कितने सैटेलाइट जरूरी है और अब आगे का रास्ता क्या है.
क्या है NavIC?
NavIC का पूरा नाम है नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन. यह पहले IRNSS नाम से जाना जाता था और इसे ISRO ने बनाया है. यह भारत का अपना सैटेलाइट बेस्ड सिस्टम है, जो लोकेशन, स्पीड और टाइम का पता लगाता है. यह वही काम करता है, जो अमेरिका का GPS, रूस का GLONASS, यूरोप का Galileo और चीन का BeiDou करता है. GPS की तरह ही NavIC यूजर की लोकेशन का पता लगा, उसकी मूवमेंट की ट्रैक और टाइम को सिंक्रोनाइज कर सकता है. इसे व्हीकल नेविगेशन से लेकर डिजास्टर मैनेजमेंट तक में इस्तेमाल किया जाता है. यह आर्म्ड फोर्सेस समेत ऑथोराइज्ड यूजर्स को एनक्रिप्टेड सर्विसेस भी प्रोवाइड करवाता है.
NavIC में कितने सैटेलाइट लगे हुए हैं?
NavIC को शुरुआत में 7 सैटेलाइट के कॉन्स्टेलेशन के तौर पर डिजाइन किया गया था. इनमें से तीन जियोस्टेशनरी ऑर्बिट और 4 को इन्क्लाइंड जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में प्लेस किया जाना है. इसे भारत और आसपास के इलाकों को लगातार कवरेज देने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया था. ISRO अब तक इसके लिए कुल 11 सैटेलाइट लॉन्च कर चुका है, जिनमें रिप्लेसमेंट भी शामिल है. इनमें से कई सैटेलाइट अपना जीवनकाल पूरा कर चुके हैं तो कुछ की एटॉमिट क्लॉक में गड़बड़ी आ गई. कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने टारगेटेड ऑर्बिट में नहीं पहुंच पाए हैं. इस कारण अब केवल तीन ही सैटेलाइट वर्किंग हैं, जो पोजिशन, टाइम और नेविगेशन सर्विसेस ऑफर कर पा रहे हैं, जबकि बाकियों को सिर्फ वन-वे मैसेजिंग सर्विसेस के लिए ही इस्तेमाल किया जा रहा है.
NavIC को कम से कम कितने सैटेलाइट की जरूरत?
NavIC को काम करने के लिए कम से कम 4 सैटेलाइट की जरूरत है. दरअसल, पृथ्वी पर किसी यूजर की लोकेशन का सटीक पता लगाने के लिए रिसीवर को एक साथ कम से कम चार सैटेलाइट से सिग्नल रिसीव करने होते हैं. तीन सैटेलाइट से पोजिशन का अंदाजा लग सकता है, लेकिन रिसीवर की घड़ी में टाइमिंग एरर को ठीक करने और भरोसेमंद 3D लोकेशन- Latitude, Longitude और Altitude का पता लगाने के लिए चौथा सैटेलाइट जरूरी होता है. इसलिए चार सैटेलाइट के बिना सिस्टम सटीक नेविगेशन भी नहीं दे पाएगा. इसलिए सरकार ने बताया है कि मार्च में एक सैटेलाइट में गड़बड़ी आने के बाद NavIC की स्टैंडअलोन नेविगेशन कैपेबिलिटी पर असर पड़ा है.
अब आगे क्या?
ISRO इस पूरे कॉन्स्टेलेशन को सेकंड जनरेशन NVS सैटेलाइट के साथ दोबारा बना रहा है. इन सैटेलाइट को बेहतर पेलोड, लंबे जीवनकाल और स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक से लैस किया जाएगा. ये सैटेलाइट पुराने हो रहे सिस्टम को रिप्लेस करेंगे और भविष्य में भरोसेमंद नेविगेशन सर्विसेस दे पाएंगे.
भारत के लिए क्यों जरूरी है NavIC?
नेविगेशन के मामले में विदेशों पर निर्भरता खत्म करने के लिए NavIC को डेवलप किया गया था. 1999 में हुए कारगिल युद्ध के बाद इसकी जरूरत महसूस हुई, जब इस इलाके के GPS डेटा को रेस्ट्रिक्ट कर दिया गया था. यह सिस्टम डिफेंस और स्ट्रैटेजिक एजेंसियों को एनक्रिप्टेड सर्विसेस मुहैया करवाता है और इसके लिए किसी विदेशी सैटेलाइट सिस्टम पर डिपेंड नहीं रहना पड़ता.
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